<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102</id><updated>2012-02-15T18:01:06.226+05:30</updated><category term='लेबल -  साउथाल(उपन्यास)- हरजीत अटवाल'/><category term='साउथाल(उपन्यास)- हरजीत अटवाल'/><category term='धृतराष्ट्र (आत्मकथा) - डॉ. एस. तरसेम'/><title type='text'>अनुवाद घर</title><subtitle type='html'>अंतर्जाल पर पंजाबी साहित्य की कृतियों का हिन्दी में प्रकाशन</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धृतराष्ट्र (आत्मकथा) - डॉ. एस. तरसेम'/><title type='text'>आत्मकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-FLBvwyanUPo/TzukcDYCMQI/AAAAAAAAASA/mUjcgEet6gA/s1600/imagesCATYF5VJ.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5709337754471641346" style="WIDTH: 130px; CURSOR: hand; HEIGHT: 86px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-FLBvwyanUPo/TzukcDYCMQI/AAAAAAAAASA/mUjcgEet6gA/s320/imagesCATYF5VJ.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ffff00;"&gt;धृतराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;डॉ. एस. तरसेम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc00;"&gt;चैप्टर-26&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ffff00;"&gt;जेल यात्रा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि नक्सली आंदोलन का हथियारबंद जोश तो मद्धम पड़ गया था, पर पंजाब के बेरोज़गार अध्यापकों में उनका अच्छा-खासा प्रभाव बन गया था। नक्सलियों के ग्रुप तो भारत स्तर पर मुख्य तौर पर तीन थे, पर पंजाब के अध्यापकों में रामपुराफूल वाले यशपाल और विद्यार्थियों में पिरथीपाल सिंह रंधावा का प्रभाव अधिक था। तीनों के अलग-अलग पैंतरे थे, पर 1978 में पंजाब के बेरोज़गार अध्यापकों में जो लहर चली, उसमें शीघ्र यह जान पाना कठिन था कि इनमें कौन अध्यापक किस धड़े के साथ है। उन्होंने रोज़गार के मसले को लेकर 'जेल भरो आंदोलन' शुरू कर दिया। राणा ग्रुप अर्थात् सी.पी.एम. ने समय की नब्ज़ को पहचानते हुए इस लहर में भी अपने पैर पसार लिए थे लेकिन नक्सलियों से कुछ कम। इस आंदोलन में ढिल्लों ग्रुप सबसे पीछे था। जब इस ग्रुप की नींद टूटी तो पूरा आंदोलन नक्सलियों और राणा धड़े की पकड़ में आ चुका था। अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए रणबीर ढिल्लों ने भी इस 'जेल भरो आंदोलन' में शामिल होने की घोषणा कर दी, पर समस्या यह थी कि ढिल्लों की छतरी पर बेरोज़गार कबूतर कोई कोई था। इसलिए बेरोज़गारों के साथ-साथ नौकरी पर स्थायी तौर पर लगे हुए ढिल्लों ग्रुप के समर्थकों को गिरफ्तारी देने के लिए हुक्म दे दिया गया। ज्ञान चंद शर्मा उन दिनों संगरूर ज़िले में ढिल्लों ग्रुप का लीडर था। छह अध्यापकों को गिरफ्तारी के लिए ले जाने का उसे हुक्म हुआ था। बरनाला से साधू राम बांसल और राम मूरत वर्मा, मालेरकोटला से कृष्ण कुमार शास्त्री और तपा मंडी से ज्ञानी रघवीर सिंह को उसने तैयार कर लिया था। पाँचवा वह स्वयं था। छठा व्यक्ति उसे नहीं मिल रहा था। ज्ञानी रघवीर सिंह की मेरे संग दोस्ती होने के कारण शर्मा जी को इस काम के लिए मेरे पास आना सहज हो गया। वैसे मेरी नेत्रहीनता के कारण वे मेरी गिरफ्तारी दिलाना नहीं चाहते थे। दफ़ा 144 तोड़ना, वारंटों की धमकियाँ, पुलिस और धाकड़ किस्म के सियासी लीडरों के साथ मैं पहले भी कई बार टकराव में आ चुका था। पता नहीं क्यों मैं अपनी आँखों की कमज़ोरी के बावजूद किसी से डरता-झेंपता नहीं था। असल में, मैं पूरे सिस्टम के ही ख़िलाफ़ था। लाल पार्टी, मुजारा लहर और प्रजा मंडल तहरीक, आज़ादी से पहले के आंदोलन और स्वतंत्रता संघर्ष में लड़ने वाले योद्धाओं के बारे में मैं बहुत कुछ पढ़ चुका था। वैसे भी, हर पक्ष से मैं वाम लहर से जुड़ा हुआ था। इसलिए में किसी भी संघर्ष में शामिल होते समय किसी असमंजसता का शिकार नहीं हुआ था। मेरे लिए यह भी बड़े हौसले वाली बात थी कि मेरी पत्नी सुदर्शना देवी ने मुझे विदा करते समय जिस तरह की बातें कीं, उससे मेरे अन्दर गिरफ्तारी देने का साहस और अधिक बढ़ गया।&lt;br /&gt;चंडीगढ़ पहुँचने के बाद काफ़ी समय तक 'ज़िदाबाद-मुर्दाबाद' होती रही। जिस नेता की अगुवाई में गिरफ्तारी देनी थी, वह राणा ग्रुप का एक बेरोज़गार अध्यापक था। उसका नाम शायद मलकीत सिंह था। नक्सली और राणा ग्रुप के हाथ में बागडोर होने के कारण गिरफ्तारी देने वाले दल का नेता इनमें से ही कोई अध्यापक होता। आख़िर करीब चार बजे पुलिस हरकत में आ गई। हमसे कुछ दूर एक नक्सली अध्यापक ने किसी थानेदार की नाक में अपनी उंगुलियाँ चढ़ा दीं। फिर क्या था, लाठीचार्ज शुरू हो गया। जितने आसपास के अध्यापक गिरफ्तारी देने आए थे, वे नारे लगाते हुए पुलिस की लाई हुई बसों में दगड़-दगड़ करके चढ़ गए। ज्ञानी रघवीर सिंह ने पहले मुझे चढ़ाया और बाद में स्वयं चढ़ा। मेरे लिए तसल्ली वाली एक बात और थी कि बठिंडा वाले अध्यापकों का प्रिय नेता जगमोहन कौशल भी हमारे संग था। सी.पी.आई. का पक्का कार्ड-होल्डर बलबीर सिंह मंदरां भी हमारे साथ ही गिरफ्तार हुआ। इस प्रकार ढिल्लों ग्रुप के गिनती के करीब पन्द्रह नेता इस गिरफ्तारी में शामिल थे। हमारे ग्रुप में बहुत से अध्यापक संगरूर, बठिंडा और फ़रीदकोट ज़िलों में से आए थे और थे भी सब स्थायी अध्यापक।&lt;br /&gt;बस 17 सेक्टर के थाने में पहुँच गई थी। इस थाने में पहले भी मैं दो बार आ चुका था, पर तब बात इस तरह हुई थी कि पुलिस दफ़ा 144 तोड़ने वालों को हिरासत में लेकर 17 सेक्टर के थाने में ले जाती और दिन छिपने के कुछ देर बाद छोड़ दिया करती। एक बार ट्रक में बिठाकर कहीं बाहर भी उतार आई थी। आसपास कोई गाँव भी नहीं था। अध्यापक तंग-परेशान होते हुए आख़िर अगले दिन अपने अपने घर पहुँच गए थे। पर इस बार तो पता था कि यह गिरफ्तारी पकड़कर दिन छिपने के बाद छोड़ने वाली नहीं है, क्योंकि पहले जितने भी दल गिरफ्तार हुए थे, सबको सींखचों के पीछे कर दिया गया था।&lt;br /&gt;हमारी संख्या दो सौ के करीब थी। काग़ज़-पत्र तैयार करने में काफ़ी समय लग गया था। अभी तक यह भी पता नहीं चला था कि हमें किस जेल में भेजना है। काग़ज़-पत्र तैयार होने के बाद कहीं दस बजे जाकर हमें बसों में बैठने के लिए कहा गया। इस दल को संगरूर जेल में भेजने का हुक्म मिला था, तपा से 50-55 और मालेरकोटला से सिर्फ़ 35 किलोमीटर दूर। जेल में रहने के बावजूद घर की निकटता का अहसास-सा पता नहीं क्यों मन को तसल्ली दे रहा था।&lt;br /&gt;गिरफ्तारी के बाद शायद कुछ भी खाने-पीने को नहीं दिया गया था। चाहिए तो यह था कि चंडीगढ़ से ही रोटी खिलाकर भेजा जाता, जिसके बारे में राम मूरत वर्मा कई बार कह चुका था। पर ज्ञानी रघवीर सिंह के यह कहने पर कि 'हम कौन सा ननिहाल आए हैं वर्मा जी' हम सब हँस पड़े थे। सच्ची बात तो यह है कि मुझे भूख तो लगी हुई थी पर भूखा-भूखा करना मुझे अच्छा नहीं लगता था। इसलिए मैं शांत होकर बैठा रहा। हमारे वाली बस राह में एक बार रोकी भी गई थी, अन्य बसें भी रुकी होंगी, पर संगरूर जेल के अन्दरवाले दरवाजे तक पहुँचने के बाद ही यह अहसास हुआ कि हम जेल में आ गए हैं। आधी रात हो चुकी थी और चंडीगढ़ से आई वायरलैस या फोन के कारण जेल मैनुअल के अनुसार हमें रोटी खिलानी ज़रूरी थी।&lt;br /&gt;सर्दियों का मौसम था। गिरफ्तारी आधे अक्तूबर के बाद किसी तारीख़ को हुई थी। हालाँकि मैं ज़रूरत के अनुसार कपड़े ले आया था और एक लोई भी मेरे पास थी, पर ज़र्दा खाने वाले दो-तीन अध्यापक मेरे वाली बस में भी थे। ज़र्दा लगाने और थूक की पिचकारियाँ छोड़ने के कारण उन्होंने खिड़कियों के शीशे बन्द न करने दिए। मैं ऐसे मौसम में ठंडी हवा से बचकर रहना चाहता था, पर हवा की ज़र्दे की पुड़िया से दुश्मनी है। इसलिए गरम दिमाग ज़र्दे के शौकीनों की हरकतों के कारण पहले ही दिन उनसे भिड़ना मैं अच्छा नहीं समझता था। नतीजा यह निकला कि ठंडी हवा खिड़कियों के रास्ते फर्र-फर्र अन्दर आती रही और मुझे जुकाम हो गया। उन दिनों अक्सर ठंडी हवा लगने से मुझे जुकाम हो जाता था। जाड़े में जुकाम से बचने के लिए मेरी माँ और मेरी पत्नी सुदर्शना देवी मेरे लिए कोई न कोई देसी दवाई बनाकर रखती थीं- खसखस की पिन्नियाँ या सौंफ, बादाम, खसखस और मिसरी की फंकी। जुकाम के भय के कारण मैंने कई चीज़ें खाना छोड़ दी थीं। डॉक्टर इस बीमारी को एलर्जी कहते थे और इस एलर्जी का ज़ोर सितम्बर से शुरू होकर फरवरी माह तक चलता। एक तो उस एलर्जी की मार और दूसरा, ठंडी हवा के कारण मेरी नाक और आँखों में से पानी बहने लग पड़ा। कई बार तो चार-पाँच से लेकर सात-आठ छीकें एकसाथ आतीं और मैं बेहाल हो जाता। मेरी इन छींकों पर कई मनचले जवान 'ही-ही, हू-हू' भी करते। मुझे अन्दर ही अन्दर गुस्सा आता और मेरे अन्दर ट्रेड यूनियन लहर के कई नकारात्मक नुक्तों की झड़ी सी लग जाती। सोचता कि जिन लोगों के वास्ते जेल आया हूँ, उन्हें यह तमीज़ भी नहीं कि किसी के बीमार हो जाने पर यदि हमदर्दी प्रकट नहीं हो सकती तो उस पर हँसना भी नहीं चाहिए। मुझे उनके कम्युनिस्ट होने पर शक था। अब जब मैं उन बेरोज़गार अध्यापकों को नौकरी पर लगा हुआ देखता हूँ और उनमें से बहुत से वे सब गलत काम करते हैं जो समाज विरोधी तत्व किया करते हैं तो मुझे उस वक्त उनके लिए बनाई गई अपनी राय उचित लगती है। मैं यहाँ पर सभी को एक ही रस्सी से नहीं बाँधता। कुछ अध्यापक अभी भी वामपंथी लहर से उसी तरह वचनबद्ध हैं, ईमानदार हैं और किसी न किसी तरह लोकहित चेतना से जुड़े हुए हैं पर उस संघर्ष में शामिल वे अध्यापक भी मेरे सामने हैं जो इस संघर्ष में अपनी नौकरी निकाल कर शेर बने फिरते हैं। दस-दस रुपये सैकड़े पर ब्याज में पैसे देते हैं, नशे करते हैं और नौकरी को सिर्फ़ पेंशन समझते हैं। काम तो उन्होंने कोई दूसरा चला रखा है।&lt;br /&gt;हाँ, मैं बात कर रहा था कि आधी रात के बाद हम संगरूर जेल में पहुँचने के बाद जेल की रोटी की प्रतीक्षा कर रहे थे। बैरकों में हमारे समाने के लिए जगह नहीं थी। एक एक बैरक में सीमेंट के थड़े-से बनाए हुए थे। बदबू मार रहे कम्बल जिनमें खटमल बादशाह भी साथ ही आ बिराजे थे, हमारे द्वारा ऊपर ओढ़ने और नीचे बिछाने के लिए आ रहे थे। कहीं पिछले पहर जाकर रोटी आई। पैरों से गूंधे गए आटे की छाबों जैसी बड़ी-बड़ी रोटियों का तो मुझे पहले ही पता था, पर जो सब्ज़ी संग में भेजी गई, उस तरह की सब्ज़ी के दर्शन पहले कभी नहीं किए थे। सब्ज़ी थी- तरी वाली भिंडियाँ। एक कटोरी सब्ज़ी में दो-तिहाई तरी और एक तिहाई भिंडियों के टुकड़े। भिंडियों के टुकड़ों का लेस इस तरह था मानो बच्चे के मुँह से रालें गिर रही हों। मैंने इसके विरुद्ध आवाज़ उठाई। सबने रोटी खानी बन्द कर दी। हमारे जत्थे का नेता भी हरकत में आ गया। अपने आप को नेता कहलाने वाली नौजवानों की टोली को शायद यह पूरा पता नहीं था कि जेल में आकर भी सरकारी जुल्म के विरुद्ध रोष प्रकट किया जा सकता है। नारेबाजी शुरू हो गई। जेल सुपरिटेंडेंट के कानों तक जब आवाज़ पहुँची, वह तुरन्त हरकत में आया। मुझे ज्ञानी गुरमुख सिंह की कहानी याद आ गई। कहानी का नाम था - 'सब अच्छा'। जेल सुपरिटेंडेंट की ड्यूटी है कि वह अपने ऊपर वाले सभी अफ़सरों को 'सब अच्छा' की रिपोर्ट दे। दो सौ से अधिक जेल में बन्द किए अध्यापक यदि रात में रोटी न खाएँ और वे जेल में ही विद्रोह पर उतर आएँ और जेल सुपरिटेंडेंट रिपोर्ट में भेज बैठे - सब अच्छा तो जेल प्रबंध की ढीली चूल का पता तो सरकार को लगना ही था और लोगों की आँखें पोंछने के लिए सरकार को कुछ न कुछ करने जैसा तो नाटक रचना ही होता है। अध्यापकों के रोष को जेल अधिकारी शांत करने में सफल हो गए। रोटी में देरी तो हो गई, पर सब्ज़ी बदलकर भेजी गई। मैंने आधी-पौनी रोटी ही खाई होगी। लगता था जैसे हल्का-सा बुखार भी हो। जब मुझे इस तरह का अचानक जुकाम हो जाता, मेरी देह भी तपने लग पड़ती। मैं अपनी दवाई संग लेकर आया था। रोटी के बाद दो अलग-अलग तरह की गोलियाँ पानी के संग ले लीं। इस दवाई से जुकाम में भी कुछ टिकाव आया और कुछ नींद-सी भी आ गई। दोनों गोलियों में से एक गोली का संबंध नींद से था। मैं यदि यह कहूँ कि मुझे वहाँ किसी ने पूछा ही नहीं, तो यह गलत होगा। सबको मेरी सेहत को लेकर फिक्र थी। सबसे अधिक ज्ञानी रघवीर सिंह चिंतित था। फिर ज्ञान चंद शर्मा। दरवेश साधू, राम बांसल शर्मा जी से इस बात पर बहस रहा था कि तरसेम को हमें अपने संग नहीं लाना चाहिए था। राम मूरत के शुगल की टोन लगभग आधी तो ठंडी पड़ चुकी थी लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। मुझे उसकी यह टोन कोई बुरी भी नहीं लगी थी। देशभक्तों की जेल यात्राओं की कठिनाइयाँ और उत्पीड़न मेरे जेहन को कायम रखने में मेरी मदद कर रहे थे। पता नहीं किस समय मुझे नींद आ गई थी। सुबह उठा तो मैं कुछ ठीक था।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;संगरूर जेल में लगभग दो महीने रहना पड़ा क्योंकि पंजाब सरकार से कोई कच्चा-पक्का समझौता होने के पश्चात ही रिहाई हो सकती थी और सरकार से बातचीत करने का काम नक्सली लीडरशिप के हाथ में था। यह लीडरशिप किसी सम्मानजनक समझौते से एजिटेशन वापस लेना चाहती थी। पंजाब के साथ-साथ अन्य प्रांतों और केन्द्र की सरकारों का यह व्यवहार रहता है कि वे आंदोलनकारियों को थका-उबा कर आंदोलन की पटरी से उतारने के लिए हर तजुर्बा इस्तेमाल किया करती हैं और अब भी वही हालत बनी हुई थी।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;जितने आंदोलनकारी संगरूर जेल में पहुँचे थे, बैरकों में उतने व्यक्तियों को खपाने लायक जगह नहीं थी। गरम विचारवाले कामरेडों ने अपनी मर्जी से या हो सकता है सुपरिंटेंडेंट से बात करके अपने लिए बैरकें अलॉट करवा ली थीं, जिसकी वजह से हमारे हिस्से तम्बू ही आए थे। हम संगरूर, बठिंडा और फ़रीदकोट के स्थायी अध्यापक एक ही सोच के थे और कइयों ने तो जेल का स्वाद पहले भी चखा हुआ था। इसलिए हमारे हिस्से जो तम्बू आए, हम संगरूर वाले सारे एक तम्बू में थे। नीचे दरियों के ऊपर गद्दे बिछ गए। कम्बलों के स्थान पर रजाइयाँ मिल गईं। ठंड दौड़े आ रही थी। इसलिए तम्बुओं में रजाइयाँ मिल जाने से कुछ राहत मिल गई थी।&lt;br /&gt;हमारे संग गिरफ्तार हुए साथियों में ही एक कमेटी बन गई थी। यह कमेटी ही जेल अधिकारियों से बातचीत करती। कमेटी का कर्ताधर्ता वही नौजवान मलकीत सिंह था जिसे हमारे दल का नेता बनाया गया था और कमेटी भी शायद उसने अपनी मर्जी से ही बनाई थी। जिस तरह हम सहयोगी धड़े के तौर पर आंदोलन में शामिल हुए थे, उसी तरह जेल में हमारी इज्ज़त थी। जेल में राजनीतिक नेताओं या आंदोलनकारियों वाली सुविधाएँ कभी भी सरकार या जेल अधिकारी थाली में परोस कर नहीं देती। इसलिए रैलियों और ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद के कई दिनों के हो-हल्ले के बाद छतरी जैसी बड़ी बड़ी किरक वाली रोटियाँ और बेस्वाद घटिया-सी दाल-सब्ज़ी का सिलसिला बन्द करके जेल अधिकारियों ने हमारी कमेटी की देखरेख में सवेरे के नाश्ते से लेकर दोपहर बाद के भुने चनों की एक एक मुट्ठी तक और फिर शाम के समय की रोटी से लेकर रात के दूध तक का सारा प्रबंध कमेटी को सौंप दिया और सेवा के लिए कुछ सेवादार लगा दिए। सेवादार भी खुश थे और आंदोलनकारी भी। कुछ दिनों पश्चात हमारे में से काफ़ी साथियों को बी-क्लास मिल जाने के कारण दूध, अंडे और मीट आदि मिलने का भी प्रबंध हो गया। इस बी-क्लास वाले राशन को हम सब मिलकर ही उपयोग करते, पर इसके बावजूद विचारात्मक भिन्नता के कारण प्राय: गरमा-गरमी हो ही जाती। दूसरा यह कि इन नौजवानों में से कई बीड़ी-सिगरेट से लेकर ज़र्दे तक के शौकीन थे और एक मित्र तो नशे की गोलियाँ भी खाता था, था यह हमारे गरम धड़े के नेताओं और बेरोज़गार अध्यापकों में से। हम पन्द्रह साथी थे ढिल्लों ग्रुप अर्थात् सी.पी.आई. के, छह जने थे सी.पी.एम. के, एक था बी.जे.पी. का गुरदासपुर से और एक ओम प्रकाश करकरा अमलौह से था, पक्का गांधीवादी। बाकी सभी बन्दूक की नली में से इंकलाब लाने की बात को छोड़ते-छुड़ाते 1978 तक लोक चेतना के गरम राह पर चलने वाले। शुरू शुरू में हम दोहरे दबाव के अधीन जेल में विचर रहे थे- एक सरकार का दबाव और दूसरा, जेल के अन्दर की गरम लीडरशिप का।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;जहाँ तक मेरे निज का प्रश्न है, शायद मेरी नेत्रहीनता के कारण सब साथी मुझे बड़े आदर से मिलते। फ्लश और बाथरूम जाने से लेकर पूरी जेल में इधर-उधर जाने तक सब साथी मेरी सहायता के लिए तत्पर होते, यद्यपि असली जिम्मेदारी तो ज्ञानी रघवीर की थी और निभाता भी वही रहा था, पर शेष साथियों ने भी नेत्रहीनता की चुभन मुझे महसूस नहीं होने दी थी।&lt;br /&gt;अव्वल तो शाम को या सवेरे रोज़ ही रैली होती, नहीं तो एक दिन छोड़कर रैली पक्की थी। बाहर से आने वाले सियासी और ट्रेड यूनियन नेताओं अथवा नाटक मंडलियों और कवियों के आने पर भी जमावड़ा कर लिया जाता। गुरशरण सिंह भाजी, संतराम उदासी और महिंदर पाल भट्ठल के आने पर नाटकों का भी मंचन हुआ और लोकगीतों का गायन भी। नक्सली लीडरों में से पी.एम.यू. का पिरथीपाल सिंह रंधावा, रणबीर ढिल्लों, बी.जे.पी. वाला पंगोतरा और कांग्रेस का एक मुलाजिम नेता भी आया। सी.पी.आई. का भान सिंह भौरा, मास्टर बाबू सिंह एम.एल.ए. और कम्युनिस्टों की कद्दावार शख्सियत सतपाल डांग भी पहुँचे। जितना प्रभावित गुरशरण सिंह भाजी ने किया, बौध्दिक स्तर पर उससे अधिक प्रभावशाली भाषण कामरेड डांग ने दिया। लेकिन जेल में नौजवान साथी दूध में उबाल की भाँति वक्ती तौर पर जोश में आ जाते और बाद में जब हमारे संग बातें करते, उनके हर शब्द में उदासी झलकती। एक तो वक्ता होने के कारण और दूसरा लेखक होने के नाते सभी साथियों में ढिल्लों ग्रुप के साथ संबंधित होने के बावजूद मेरा अच्छा-खासा मान-सम्मान बन गया था। मेरे इम्तिहान का दौर तो रैलियों के पहले एक-दो भाषणों में खत्म हो गया था। अब सैद्धान्तिक बहसों में भी स्पष्टीकरण के लिए हर धड़े के साथी मेरे पास ही आते। हमारे अपने धड़े के किसी साथी द्वारा डाले गए उलझाव को मैं अपनी तुच्छ-सी बुद्धि के अनुसार हल करता। उस समय मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि मैं किस धड़े के संग हूँ। मैं तो मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सीमित-से ज्ञान के सहारे गुंझल खोलने की कोशिश करता और प्राय: वह खुल भी जाती। मुझे लगता है कि अपार ज्ञान के स्थान पर पंजाबी भाषा पर पकड़ मेरे काम में अधिक सहायक होती होगी। रैलियों में ग़ज़लों और कविताओं के सुनाने के ढंग और जलसों में किस्म किस्म के भाषणों के अभ्यास के कारण ही मेरा साथियों के बीच अच्छा-खासा प्रभाव बन गया था। कुछ मांगों को मनवाने के लिए भूख-हड़ताल का भी सहारा लेना पड़ा, पर गलत मांगों को मनवाने के लिए तो जेल अधिकारियों के संग प्यार से ही बात की जा सकती थी। जेल में जो डिप्टी सुपरिंटेंडेंट अमरीक सिंह था, वह मेरी बड़ी बहन शीला के ससुराल वाले गाँव सल्हीणे(जी.टी. रोड पर मोगा से आठ-नौ किलोमीटर दूर) का था और था भी बिलकुल उनका पड़ोसी। मेरे गिरफ्तार होने के हफ्ते बाद ही सल्हीणे में यह बात पहुँच गई थी। जब मेरी बहन और मेरा भान्जा सुरिंदर मुझे मिलने आए तो उस दिन से अमरीक सिंह मेरा ज़रूरत से ज्यादा सम्मान करने लग पड़ा था।&lt;br /&gt;बीड़ी-सिगरेट तो किसी न किसी तरह से जेल में आ ही जाती थी और ज़र्दा भी। एक साथी जो नशे की गोलियाँ खाने का आदी था, बड़ी समस्या तो उसकी थी। एक दिन उसकी पत्नी मुलाकात के लिए आई और वह अपने पति की समस्या को जानती थी। वह कपड़ों में गोलियों के कई पत्ते लपेट कर ले आई। द्वार पर तलाशी के समय ही गोलियाँ पकड़ी गईं। दो तीन नक्सली साथी मेरे पास दौड़े आए और बोले कि डिप्टी सुपरिंटेंडेंट को कहकर गोलियाँ दिलवा दो, क्योंकि इस दवाई के बग़ैर वह साथी रह नहीं सकता था। लेकिन मुझे उनकी इस बात ने कायल नहीं किया था। फिर भी, अपने मुँह-मुलाहजे के लिए मैं उनके संग चला गया। गोलियाँ न मिलनी थीं, न मिलीं। बस यह फायदा हो गया कि साथी की पत्नी और वो साथी जेल अधिकारियों के कोप से बच गए और मेरी विनती के कारण मियाँ-बीबी की मुलाकात भी हो गई।&lt;br /&gt;मुझे यह घटना कुछ दिन पश्चात बहुत ही महत्वपूर्ण लगी जब किसी कैदी की अफीम लाने के बदले जेल के एक स्वीपर की हवलदार बेरहमी से कुटाई कर रहा था। इस घटना को देखने के लिए हमारे में से कई साथी गोल चक्कर का किसी न किसी बहाने से चक्कर लगा आए थे। शायद गोलियों वाला वह साथी और उसके साथ के साथी भी शाम को मेरे पास आए थे, मानो उस घटना में मेरी भूमिका के प्रति वे किसी न किसी तरह धन्यवाद करना चाहते हों।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;चूँकि हम ज़िला संगरूर के थे इसलिए सबसे अधिक मुलाकाती हमारे पास आते। मुलाकातियों में अध्यापक साथी, राजनीतिक नेता और अपने रिश्तेदार होते। उन दिनों में बड़ा बेटा क्रांति नौ वर्ष का था और छोटा बॉबी सात साल का। जब मेरी पत्नी मुलाकात के लिए आती, दोनों बच्चे भी संग आते। मेरी पत्नी सुदर्शना देवी के संग बरनाला से उसका कोई न कोई भाई अवश्य होता या ज्ञानी रघवीर सिंह की पत्नी दयावंती होती। पता नहीं कैसे प्रोग्राम बनता, कृष्ण शास्त्री की पत्नी राम मूरती भी साथ पहुँच जाती। जब वे आते, वे फल भी लाते और घर की रोटी भी। राम मूरती कढ़ी-चावल बनाकर लाती। हमें तो खाने के लिए थोड़ा-बहुत ही मिलता। हम दोनों टैंटों में आया सामान भोग की तरह बाँट देते। कई बार बैरकों वाला कोई साथी भी संग आ जाता। जिस दिन ज्ञानी रघवीर सिंह, कृष्ण शास्त्री और मेरे परिवार वाले आते, वह दिन विवाह जैसा व्यतीत होता। हमारी मुलाकात ड्यौढ़ी में नहीं होती थी, वे बिलकुल हमारे टैंट तक पहुँच जाते। मेरे बच्चों के लिए जेल की रोटियाँ खाना भी पिकनिक मनाने जैसा होता। एक दो बार राम मूरत की पत्नी भी आई थी और ज्ञान चंद शर्मा की पत्नी भी। मुझे अन्दर ही अन्दर बेहद गुस्सा था कि मालेरकोटला से मेरी बहन या मेरा भान्जा कोई भी मिलने नहीं आया था। तपा से न मेरा भाई आया और न ही उसके परिवार में से कोई अन्य। शायद सब मेरी गिरफ्तारी के विरुद्ध थे। मेरा भाई तो शायद इसलिए भी न आया हो कि प्राइवेट स्कूल अध्यापकों के आन्दोलन के समय अम्बाला जेल में मैं उससे मुलाकात करने नहीं गया था। मैं उन दिनों हाई स्कूल, धौला में था और दो बार आकर घर का सारा राशन अपनी भाभी को लेकर दे गया था। थोड़ी तनख्वाह में से एक महीने का राशन लेकर अपने भाई के परिवार को देना, मेरा उनके प्रति सत्कार और सद्भावना का ही सुबूत तो था। जब भाई रिहा होकर आया, तब मैंने उसके संग राशन देकर जाने वाली बात ही नहीं की थी। शायद भाभी ने भी न बताया हो। इसलिए संगरूर जेल में मुझसे न मिलने आने का कारण मेरा अम्बाला जेल में न जाना भी हो सकता है। चलो, यह तो छोटी बात है। रिश्ते-नाते सब लेन-देन से जुड़े हुए हैं। सब गरजों से बँधे हुए हैं। पर दुख की बात तो यह थी कि मेरी पत्नी के बहुत बीमार हो जाने के बावजूद मेरे भाई के घर से किसी के द्वारा दवा-बूटी दिलाना तो एक तरफ रहा, दो महीने किसी ने उस गली की ओर मुँह ही नहीं किया था। बेचारा रमेशर दास आकर पूछताछ कर जाता या बाबू पुरुषोत्तम दास।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;एक दिन मैंने अमरीक सिंह से चक्कियाँ, फांसी वाली कोठरियाँ और फांसी वाला तख्ता देखने की इच्छा प्रकट की। यह इच्छा अन्य साथियों की भी थी। जब मेरे जैसे व्यक्ति को जो देख नहीं सकता, उन चक्कियों की हुमस और बदबू परेशान कर सकती है तो नेत्रवान दर्शकों का क्या हाल होगा ? फांसी वाला तख्ता और फांसी चढ़ाने की प्रक्रिया की कहानी सुनकर कोई साथी डरा नहीं था। स्वतंत्रता आंदोलन के समय फांसी चढ़े शहीदों की कहानियाँ वहाँ जाते समय और वहाँ से लौटते समय सब एक-दूजे को आगे बढ़कर सुना रहे थे।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;राजनैतिक कैदियों और आन्दोलनकारियों और भाँति-भाँति के जरायम पेशा कैदियों की ज़िन्दगी में जितना फ़र्क़ देश की आज़ादी से पहले था, अब उससे भी कहीं अधिक था। उन दिनों राजनैतिक कैदियों और आन्दोलकारियों को कई बार उत्पीड़ित भी किया जाता और मशक्कत भी करवाई जाती। इख़लाकी कैदियों की तो ज़िन्दगी होती ही नर्क से बदतर थी। लेकिन अब हमारे जैसे आन्दोलनकारियों को उत्पीड़न तो एक तरफ, कोई अबे-तबे भी नहीं कह सकता था। पर इसके बावजूद नये लड़कों को महीनेभर बाद सचमुच बेआरामी महसूस होने लगी थी। मीठे स्वभाव वाला साधू राम बांसल और बड़े हौसले वाला जगमोहन कौशल अपने अपने ढंग से नौजवानों का दिल मज़बूत करते, पर ज्ञानी रघवीर सिंह इस गंभीरता को ऐसे तोड़ता कि बेआरामी महसूस करने वाले नौजवान न हँस सकते, न रो सकते। कइयों के लिए तो एक दिन भी पहाड़ जैसा था, पर जिन्होंने 'थैंक यू मि. ग्लैड' जैसा मराठी उपन्यास पढ़ा हुआ था, वे उपन्यास की कहानी में से दिल मजबूत करने वाले कुछ अंश सुनाते। यह तो पता नहीं, यह सुनकर उनका मन टिकता या नहीं, मुझे एक बात का बड़ी शिद्दत से अहसास हुआ कि जेल में यदि कोई तकलीफ़ न भी हो तो भी अकेलापन झेलना हर व्यक्ति के वश की बात नहीं।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;दो बार तो हम चण्डीगढ़ में पेशी भी भुगत आए थे। लेकिन आन्दोलन खत्म होने की कोई रूप-रेखा नहीं बन रही थी, अपितु अम्बाला वाले कुछ साथियों में से अधिकांश के दिल में, इस जेल में शिफ्ट होने के कारण यह बात घर कर गई थी कि पता नहीं रिहाई होगी भी कि नहीं। पता नहीं, मैं किस मिट्टी का बना हुआ था, मेरे लिए जेल में रहना कभी असुविधाजनक नहीं लगा था और मेरी तरह ही बहुत सारे वरिष्ठ साथियों का भी हाल था। अब जबकि जेल से रिहाई होने के पच्चीस साल बाद मित्र सेन मीत का उपन्यास 'सुधार घर' पढ़ा तो महसूस हुआ कि हम तो मानो हॉस्टल में दो महीने बिता कर आए हों। असली नरक जैसी ज़िन्दगी तो इख़लाकी या जरायम पेशा कैदी अभी भी भोग रहे हैं, जैसी अंग्रेजो के राज में कैदी भोगा करते थे। 'सुधार घर' में भिन्न-भिन्न बैरकों के दृश्यों के बारे में पढ़कर आम पाठक तो हिल जाता है। जैसा भ्रष्टाचार बाहर है, वैसा भ्रष्टाचार जेल के अन्दर भी है। पैसे से सब सुविधाएँ जेल में खरीदी जा सकती हैं।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;दिसम्बर के जिस दिन रिहाई के आदेश आए, उस दिन सभी एक-दूसरे को अपने पते देते घूम रहे थे। पतों की एक साझी सूची भी तैयार हुई थी। जेल सुपरिंटेंडेंट से रिहाई संबंधी पत्र लेकर धीरे-धीरे सब बाहर जा रहे थे। आज डयौढ़ी के बाहर पहली बार नौजवानों के हँसी-ठहाकों की खनक और खुशी की कूकें सुन रहा था और मेरे जैसे सब साथी चुपचाप बाहर जा रहे थे। सच बात तो यह है कि मेरे जैसे आन्दोलनकारियों के लिए तो यह जेल नहीं थी, एक हॉस्टल था। हाँ, एक घटिया-सा हॉस्टल, जैस तरह के मध्यम वर्ग से हम संबंध रखते हैं।&lt;br /&gt;(जारी…)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-4319332498462679183?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/4319332498462679183/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=4319332498462679183&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/4319332498462679183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/4319332498462679183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='आत्मकथा'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-FLBvwyanUPo/TzukcDYCMQI/AAAAAAAAASA/mUjcgEet6gA/s72-c/imagesCATYF5VJ.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-2743133218064737727</id><published>2012-01-28T16:20:00.000+05:30</published><updated>2012-02-02T16:31:34.730+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साउथाल(उपन्यास)- हरजीत अटवाल'/><title type='text'>पंजाबी उपन्यास</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-3DXefutEpGI/TyprfjvOUCI/AAAAAAAAARc/IfGZFrb2WC4/s1600/sneeze.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5704490067931582498" style="WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 126px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-3DXefutEpGI/TyprfjvOUCI/AAAAAAAAARc/IfGZFrb2WC4/s320/sneeze.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-vNhpfEEb0Sg/TyprtWtLdDI/AAAAAAAAARo/6a8Vqfn8_LA/s1600/Southall.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5704490304951514162" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 135px; CURSOR: hand; HEIGHT: 214px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-vNhpfEEb0Sg/TyprtWtLdDI/AAAAAAAAARo/6a8Vqfn8_LA/s320/Southall.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़ कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ffff00;"&gt;साउथाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;हरजीत अटवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff66;"&gt;।। इकतीस ॥&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक दिन जगमोहन किंग मार्केट में जाता है। आई.डब्ल्यू.ए. के दफ्तर में उसको कोई काम है। काम से फुसरत पाकर वह कार पार्क की ओर जा रहा है कि उसको सामने से प्रीती जाती हुई दिखाई देती है। वह उसकी ओर बढ़ने लगता है। नज़दीक पहुँचकर उसको लगता है कि यह प्रीती नहीं है। वह और अधिक करीब होता है। उसके एकदम करीब पहुँच जाता है। वह औरत भी उसकी ओर देखे जा रही है। जगमोहन पूछता है-&lt;br /&gt;''इज इट यू प्रीती ?''&lt;br /&gt;वह औरत कुछ नहीं बोलती और तेज़ तेज़ चलने लगती है। जगमोहन धीमा हो जाता है बल्कि खड़ा हो जाता है कि किसी औरत के पीछे-पीछे चलते देखकर लोग क्या कहेंगे। औरत प्रीती की तरह ही चल रही है। जगमोहन देखता जा रहा है। वह औरत कुछ आगे जाकर मोड़ पर रुक जाती है और जगमोहन की ओर देखने लगती है। जगमोहन फिर उसके पास पहुँच जाता है। पूछता है-&lt;br /&gt;''प्रीती, तुझे क्या हो गया ?''&lt;br /&gt;''कुछ भी नहीं।''&lt;br /&gt;''तेरी खाली आँखें, खुश्क बाल, चेहरे की चमड़ी भी अजीब सी लगती है। तू ठीक तो है ?''&lt;br /&gt;''मैं बिलकुल ठीक हूँ, तू कैसा है ?''&lt;br /&gt;''मैंने तो तुझसे कई बार मिलना चाहा।''&lt;br /&gt;''यदि चाहा होता तो तुझे पता ही था कि मैं कहाँ रहती हूँ।''&lt;br /&gt;''पर तेरा हसबैंड !... मैं नहीं चाहता था कि तेरे लिए कोई संकट पैदा हो।''&lt;br /&gt;जगमोहन कह रहा है। प्रीती कुछ नहीं बोलती। फिर वह पूछता है-&lt;br /&gt;''घर में तो सब ठीक है न ? तेरे बच्चे ? तेरा पति ?''&lt;br /&gt;''हाँ, सब ठीक है।''&lt;br /&gt;''तेरी एक्टिंग कैसी चल रही है ?''&lt;br /&gt;''एक्टिंग तो मैंने छोड़ दी।''&lt;br /&gt;''क्यों ?''&lt;br /&gt;''एक्टिंग से आदमी की नैचुरल फीलिंग्स फेड-आउट हो जाती हैं।''&lt;br /&gt;''व्हट ?''&lt;br /&gt;''एक्टिंग करते करते आदमी को असल और नकल के फर्क की समझ कम हो जाती है।''&lt;br /&gt;''प्रीती, कैसी बातें कर रही है। एक्टिंग करते हुए तो असल और नकल की पहचान होती है।''&lt;br /&gt;''नहीं, जो असल और नकल में महीन-सा पर्दा होता है, उसकी खासियत खत्म हो जाती है एक्टिंग से।''&lt;br /&gt;''अजीब से विचार बनाए बैठी है तू।''&lt;br /&gt;''नहीं जगमोहन, यह सच है। स्टेज पर एक्टिंग करके घर पहुँचें तो फीलिंग्स में वो आरिजनैल्टी नहीं रहती।''&lt;br /&gt;''कौन बताता है यह सब तुझे ?''&lt;br /&gt;''मेरा हसबैंड।''&lt;br /&gt;''और तू सुनती है ?''&lt;br /&gt;''हाँ, मेरे बच्चे भी उसी की सुनते हैं।''&lt;br /&gt;''तू सब गलत सुने जाती है प्रीती, क्या तू अपने दिल की बात सुननी भूल गई है ?''&lt;br /&gt;''ओ.के. जगमोहन, मैं चलती हूँ। कोई देख लेगा, मेरा हसबैंड गुस्सा होगा, मेरा मजाक उड़ाएगा। मेरे बच्चे मुझ पर हँसेंगे।''&lt;br /&gt;कहती हुई प्रीती चली जाती है। जगमोहन हैरान-सा खड़ा उसको जाते हुए देखता रहता है। उसको याद आता है कि एक बार पहले भी प्रीती को उसने उसी मोड़ पर उतारा था। वह कार पॉर्क में आ जाता है। अपनी कार में बैठ जाता है। कार स्टार्ट भी कर लेता है पर उससे कार आगे बढ़ाई नहीं जाती। वह सोचता जा रहा है कि क्या हो गया प्रीती को। इसका जवाब किसके पास होगा। सिस्टर्स इनहैंड्ज के दफ्तर तो वह जाती ही नहीं। और कौन होगा प्रीती का परिचित जिससे यह सब मालूम कर सके। उसको भूपिंदर का ख़याल आता है। पिछली बार उसने भूपिंदर के साथ फोन पर बात की थी जब उसने उसकी एक हिंदी फिल्म देखी थी। अब भूपिंदर को फिल्मों में छोटे-मोटे रोल मिलने लग पड़े हैं। कारण यह है कि बम्बई के प्रोडयूसर अपनी फिल्मों की शूटिंग लंदन में करने आते हैं और लोकल कलाकारों को भी काम दे देते हैं। भूपिंदर का नाम चल पड़ा है। वह सोचता है कि भूपिंदर को फोन करके देखे और फोन पर ही सबकुछ पूछ ले। परन्तु उसके पास तो जैसे फोन करने का समय ही नहीं है। वह कार को भूपिंदर के घर की तरफ दौड़ा लेता है। भूपिंदर के घर की डोर बेल बजाता है। भूपिंदर ही दरवाज़ा खोलता है। वह उसको अचानक आया देख हैरान होता हुआ पूछता है-&lt;br /&gt;''जग्गे, क्या बात है ? तेरा चेहरा ऐसे क्यों हुआ पड़ा है ?''&lt;br /&gt;''मैं तुझसे कुछ पूछने आया हूँ।''&lt;br /&gt;''क्या ?''&lt;br /&gt;''प्रीती को मिला कभी ?''&lt;br /&gt;''पिछले दिनों एक दिन टैस्को में मिला था, उसका हसबैंड साथ था पर बात क्या है ?''&lt;br /&gt;''तू बता कि प्रीती को क्या हुआ ?''&lt;br /&gt;''अन्दर आ पहले।''&lt;br /&gt;वे दोनों अन्दर जाते हैं। फ्रंट रूम में बैठते हैं। यही वह कमरा है जहाँ कभी रिहर्असलें हुआ करती थीं। जगमोहन बताने लगता है-&lt;br /&gt;''मैं प्रीती की हालत देखकर घबरा गया हूँ, वह तो जैसे मेंटल हो गई है।''&lt;br /&gt;''इतनी बुरी तो मुझे नहीं लगी। हाँ, ऑड-सी ज़रूर हो प्रतीत हुई थी। टैस्को में मैं शॉपिंग करने गया था, उसका पति संग था। उसका पति नहीं चाहता था कि वह ड्रामों में काम करे। उसने एक बार मुझे भी फोन पर गालियाँ निकाली थीं और सूरज आर्ट्स वालों को भी, पर फिर भी मैंने उन्हें बुला लिया। मैंने जितने सवाल पूछे, गुरनाम ने ही उत्तर दिए। प्रीती मेरी ओर टकटकी लगाकर देखती रही थी।''&lt;br /&gt;''भूपिंदर, मेरी तरफ आज वह ऐसे देखती थी जैसे मेरे से कोई गिला कर रही हो।''&lt;br /&gt;''मेरी ओर भी ऐसे ही देखती थी। उसका पति एक्टरों और एक्टिंग को बुरा भला बोलता रहा। उसने एक दो बार हाँ में सिर हिलाया बस।''&lt;br /&gt;''इसका मतलब कि उसका पति उसको लीड कर रहा है, किसी न किसी तरह उसके मन में यह सब डाल रहा है। इसका अर्थ, उसको मिलने की ज़रूरत है। वी शुड मीट हर।''&lt;br /&gt;''यॅस, यू कैन। पर इसके नतीजे उसके लिए बहुत बुरे होंगे। लेकिन तू उसको लेकर चिंता क्यों कर रहा है। तुझे पता है, शी इज़ ए स्ट्रांग वुमैन। वह खुद ही हालात के साथ डील कर लेगी।''&lt;br /&gt;''मुझे तो नहीं लगता कि स्ट्रांग है, मुझे तो हारी हुई लगती है।''&lt;br /&gt;''देख जैग, हम कुछ नहीं कर सकते। हम मसले को उलझा ही सकते हैं।''&lt;br /&gt;भूपिंदर कह रहा है। जगमोहन कहता है -&lt;br /&gt;''सिस्टर्स इनहैंड्ज तो जा सकते हैं उनके पास। मैं अभी उनके दफ्तर जाता हूँ।''&lt;br /&gt;वह ग्रीन रोड पर आता है। सिस्टर्स इनहैंड्ज के दफ्तर में कोई नहीं है। शाम को फिर चक्कर लगाने के बारे में सोचता है, पर उसका चित्त स्थिर नहीं है। वह वहीं कार में बैठकर प्रतीक्षा करने लगता है कि कोई तो आएगा इस दफ्तर में। वह सिगरेट पर सिगरेट फूंक रहा है। इतनी सिगरेटें उसने कभी नहीं पीं। काफ़ी समय तक कार में बैठा रहता है। कोई नहीं आता। विवश होकर वह घर लौट आता है। दोनों बेटे उसके दायें-बायें बैठ जाते हैं जैसे नित्य बैठा करते हैं। उसका उखड़ा हुआ मूड देखकर मनदीप कहती है -&lt;br /&gt;''जाओ, जॉगिंग कर आओ।''&lt;br /&gt;उसकी बात पर जगमोहन हँस पड़ता है। वह जानती है कि यदि कुछ दिन वह जॉगिंग न करें तो उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाया करता है। इसलिए मनदीप ने कहा है। वह कहने लगता है-&lt;br /&gt;''यह बात नहीं, यह तो प्रीती का मसला है।''&lt;br /&gt;''कौन-सी प्रीती का ?''&lt;br /&gt;वह पूछती है और जगमोहन पूरी कहानी सुनाता है। मनदीप कहती है-&lt;br /&gt;''तुम्हें तो चुड़ैलें ही चिपटी रहती हैं। ये प्रीती जीते जी आ चिपटी।''&lt;br /&gt;''यह नहीं चिपटती, मैं सारा केस बड़ी चुड़ैलों को दे दूँगा।''&lt;br /&gt;कहकर हँसता है। मनदीप फिर कहती है-&lt;br /&gt;''अगर उसका हसबैंड चाहता है कि वह ड्रामे न खेले तो तुमको ज़रूरी खिलाने हैं। यह तो दूसरे का घर बर्बाद करने वाली बात हुई।''&lt;br /&gt;''यहाँ बात ड्रामों की नहीं है, उसकी हालत की है। वह ऐसी क्यों हो गई, यह है प्रॉब्लम।''&lt;br /&gt;''मैं तो यह जानती हूँ कि तुम कोई न कोई राह जाती मुसीबत ले बैठते हो।''&lt;br /&gt;''मैंने तुझे कहा न कि मुझे प्रीती के बारे में सिस्टर्स इनहैंड्ज के साथ बात करनी है, वे खुद देखेंगी।''&lt;br /&gt;वह ग्रेवाल को फोन घुमाता है। सारी बात उससे करता है। ग्रेवाल कहने लगता है-&lt;br /&gt;''मुझे लगता है कि उसका पति सॉयक्लॉजीकली उसको डोमीनेट करने की कोशिश कर रहा है। हो सकता है, उसके मन में हर वक्त हीन भावना भरने का यत्न करता रहता हो। उसको हर वक्त तुच्छ दिखा रहा हो और उसको यकीन भी दिला दिया हो। और किसी तरह से बच्चे भी अपनी तरफ कर लिए हों।''&lt;br /&gt;(जारी…)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-2743133218064737727?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/2743133218064737727/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=2743133218064737727&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/2743133218064737727'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/2743133218064737727'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2012/01/blog-post_28.html' title='पंजाबी उपन्यास'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-3DXefutEpGI/TyprfjvOUCI/AAAAAAAAARc/IfGZFrb2WC4/s72-c/sneeze.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-844662928725979884</id><published>2012-01-15T17:58:00.001+05:30</published><updated>2012-01-25T18:04:40.701+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धृतराष्ट्र (आत्मकथा) - डॉ. एस. तरसेम'/><title type='text'>आत्मकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-QOKjOhOgMVs/Tx_2NsfyuYI/AAAAAAAAARQ/edvqke7xmIA/s1600/Birds%2Band%2BTrees3.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 128px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-QOKjOhOgMVs/Tx_2NsfyuYI/AAAAAAAAARQ/edvqke7xmIA/s320/Birds%2Band%2BTrees3.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701546368417577346" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;!--[if gte mso 9]&gt;&lt;xml&gt;  &lt;w:worddocument&gt;   &lt;w:view&gt;Normal&lt;/w:View&gt;   &lt;w:zoom&gt;0&lt;/w:Zoom&gt;   &lt;w:punctuationkerning/&gt;   &lt;w:validateagainstschemas/&gt;   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lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; color: rgb(255, 0, 0);" lang="HI"&gt;डॉ. एस. तरसेम&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="line-height:150%"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="line-height:150%"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; color: rgb(255, 204, 51);" lang="HI"&gt;चैप्टर-&lt;/span&gt;&lt;span style="color: rgb(255, 204, 51);"&gt;25&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; color: rgb(255, 204, 51);" lang="HI"&gt;( दूसरा भाग)&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;b style="color: rgb(255, 255, 102);"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal" lang="AR-SA"&gt;चूल्हे के साथ स्कूल&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;    &lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;सरकारी हाई स्कूल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;तपा शहिणा ब्लॉक में आता था। शहिणा ब्लॉक में राणा ग्रुप का अकाली पक्षधर और आर.एस.एस. से संबंधित अध्यापकों से समझौता था। इसलिए इस ब्लॉक में से आर.एस.एस. पक्षधर अध्यापक दो बार चुनाव जीता। मगर समझौता तो आख़िर समझौता होता है। राणा ग्रुप को इस समझौते का बहुत फायदा था। लुधियाना ज़िले में ज़िला प्रधान के चुनाव के लिए राणा ग्रुप जिस उम्मीदवार को खड़ा करता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;वह भी पूरा आर.एस.एस. का स्वयं सेवक था। दोनों पार्टियों का विचाराधारात्मक स्तर पर कतई कोई मेल नहीं था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;अपितु दोनों एक दूसरे के विरोध में खड़ी थीं। इस ज़िले में राणा ग्रुप का उम्मीदवार दो-तीन बार विजयी भी रहा था। गुरदासपुर के एक या दो ब्लॉक-प्रधानों की सीट भी राणा ग्रुप आर.एस.एस. वालों के लिए ही छोड़ता। इससे राणा ग्रुप को एक बड़ा लाभ यह मिलता कि सी.पी.एम. बक्से में पंजाब के सारे आर.एस.एस. पक्षधर अध्यापकों के वोट पड़ जाते। सी.पी.आई. अर्थात ढिल्लों ग्रुप को पहले पहले तो कुछ कांग्रेस पक्षधर अथवा गोल-मोल अध्यापकों की वोटें मिलती रहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;पर प्रांतीय स्तर पर गवर्नमेंट टीचर्ज़ यूनियन पर राणा ग्रुप का कब्ज़ा हो जाने के कारण वे गोलमोल अध्यापक भी अब राणा ग्रुप की ओर कदम बढ़ाने लग पड़े थे। नक्सली धड़ा जिसका प्रमुख नेता यशपाल था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;उसके पास ज़िले की अध्यक्षता तो नहीं थी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पर कई ब्लॉकों पर उनका कब्ज़ा हो गया था। यशपाल रामपुरा फूल से संबंधित होने के कारण शहिणा ब्लॉक और शहिणा ब्लॉक ही नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पूरे संगरूर ज़िले को प्रभावित करता था। इस स्कूल में काम करने वाला पी.टी.आई. हरकीरत सिंह भी यशपाल का ही श्रद्धालू था। एक चुनाव में सुरजीत सिंह डी.पी.ई भी राणा ग्रुप की ओर से खड़ा हुआ था। एक बार शहिणा ब्लॉक में तिकोनी टक्कर में यश ग्रुप का उम्मीदवार जीता था। ऐसे माहौल में मुझे सरकारी हाई स्कूल तपा में एक अध्यापक के तौर पर ही नहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;वरन एक कर्मचारी नेता के तौर पर भी विचरना था। मेरे लिए अच्छी बात यह हुई कि ड्राइंग मास्टर मेरे कारण ढिल्लों ग्रुप में आ शामिल हुआ था। वह बड़ा धड़ल्लेदार मास्टर था। लड़कों पर भी उसका बहुत दबदबा था। अपने आप को नेता समझने वाले तपा मंडी के चौधरी भी उसके प्रभाव के अधीन थे। हाज़िरी रजिस्टर में हाज़िरी लगवाने से लेकर अन्य छोटे-मोटे कामों में बहुत से अध्यापक मेरी सहायता करते। यहाँ तक कि ज्ञानी हमीर सिंह&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;सुरजीत सिंह डी.पी.ई. और हरकीरत सिंह - सबसे मेरा प्यार भी था और आपसदारी भी। हम कई बार बहस करते करते अध्यापक गुटों से आगे वामपंथी राजनैतिक पार्टियों की सारी राजनीति खंगाल मारते। एक दूसरे पर दोष भी मढ़ने लग जाते। पर जब हल्ला-गुल्ला खत्म हो जाता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;हम फिर से घी-खिचड़ी हो जाते। मज़े की बात तो यह थी कि सुरजीत सिंह और हरकीरत सिंह स्कूल के हर काम के लिए मुझे अपना अग्रणी मानते। हमारी इस तिकड़ी की दोस्ती और प्यार की खुशबू विद्यार्थियों में भी फैल गई थी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;अध्यापकों में भी और लोगों में भी। सरकार की हर गलत बात पर हम तीनों ही मिलकर स्टैंड लेते। राणा ग्रुप के सही सोच वाले कई अध्यापक भी दिल से हमारी तरफ होते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;लेकिन ग्रुप के अनुशासन के कारण चुप रहते। डी.ई.ओ. के साथ ढिल्लों ग्रुप की अनबन कोई बहुत बढ़िया रूझान नहीं था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;क्योंकि आम तौर पर अधिकांश अफ़सरों की अपेक्षा डी.ई.ओ. एक अच्छा अफ़सर था। वह एक लम्बे समय तक सरकारी हाई स्कूल&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;रामपुरा फूल का हैड मास्टर रहा था और यह कस्बा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;ब्लॉक शहिणा के बिलकुल साथ लगता होने के कारण बहुत सारे अध्यापकों के उसके संग निजी संबंध भी थे। पर राणा ग्रुप के लीडर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;डी.ई.ओ. और ढिल्लों ग्रुप में बीच इस दरार को बनाये रखने के लिए कोई न कोई जुगत लड़ाते रहते। लेकिन हमारे स्कूल के अध्यापक इस षडयंत्र में शरीक नहीं होते थे।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align:center" align="center"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;..&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span style="font-family:&amp;quot;Kruti Dev 010&amp;quot;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;स्कूल में विद्यार्थियों के पढ़ाने के काम में अध्यापक भी मेरे सहायक होते। उनकी इतनी सहायता ही काफ़ी थी कि किसी भी अध्यापक ने न लोगों में और न ही विद्यार्थियों में मेरे विरुद्ध कोई बात की थी। यदि कोई मेरे पढ़ाने के विषय में पूछता भी तो अक्सर मास्टर न केवल मेरे हक में बोलते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;अपितु मेरे पढ़ाने के तौर-तरीके की बहुत प्रशंसा भी करते। इस स्कूल में हर कक्षा में से मैंने एक या दो होशियार विद्यार्थियों को अपने संग जोड़ लिया था। अधिक समय तो सुखानंद बस्ती में रहने वाले रिफ्यूजी लक्ष्मण दास का लड़का हुकम चंद मेरे पास रहता। उससे बड़ी उसकी बहन थी जमना। वह दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। वह भी हमारे घर आती। घर में वह ऐसे घुलमिल गई थी मानो घर की ही लड़की हो। ये दोनों बहन-भाई मुझको पढ़ने-लिखने का काम भी देते। एक विद्यार्थी बेअंत सिंह था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;वह भी क्लास में मेरे संग छाया की तरह रहता। हर शरारती लड़के की हरकत नोट करता और मुझे बता देता। वह दो वर्ष मुझसे पढ़ा था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;नौंवी और दसवीं कक्षा में। एक था मेरी साली शीला का बेटा पाली&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पढ़ने में वह बहुत होशियार था। उसका असली नाम तो कुछ और ही था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;लेकिन सभी उसे पाली कहकर ही बुलाते थे। पाली भी मेरे लिखने-पढ़ने के काम में मदद करता। मेरी किसी कहानी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;कविता या ग़ज़ल की नकल भी कर देता। कक्षा में तो वह किसी की आवाज़ भी न निकलने देता था। एक लड़का घडैली से था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;ज़रा ठिगना-सा। रंग भी उसका सांवला था। पढ़ने में वह बहुत होशियार था और मैंने उसको कक्षा का मॉनीटर बना रखा था। वह भी मेरे लिए बहुत सहायक सिद्ध हुआ। सहायक तो अन्य विद्यार्थी भी सिद्ध हुए होंगे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;पर सबकी सूची देना और उनके मेरे प्रति लगाव की कहानियों का वृतांत पेश करना यहाँ संभव नहीं। इस बात को यदि मैं इन शब्दों में खत्म करूँ कि जो भी कक्षा मुझे पढ़ाने के लिए मिलती&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;उनमें से आरंभ में ही एक-दो होशियार और सीधे-सरल विद्यार्थी मैं दस-पाँच दिन के निरीक्षण के पश्चात् अपने अधीन कर लेता और उन्हें अपना विश्वासपात्र बनाकर रखता। यह एक किस्म का स्कूल में मेरा गुप्तचर विभाग या यह कह लो कि सी.आई.डी. का महकमा होता जो विद्यार्थियों की गलत हरकतों को मेरे नोटिस में लाता। विद्यार्थियों को मेरी इस जुगत का पता चल गया था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;जिसकी वजह से कोई भी मेरी कक्षा में शरारत करने या मुझे धोखा देने की कोशिश नहीं करता था। हुकम चंद तो समझो मेरे इतना करीब हो गया था कि वह स्कूल की हर अच्छी-बुरी बात का ख़याल रखता और उसके बारे में मुझे बताता रहता। इस प्रकार&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पूरी तरह नेत्रहीन हो जाने के बावजूद स्कूल में पढ़ाने में कभी मुझे कोई कठिनाई पेश नहीं आई थी। हैड मास्टर साहब भी हमेशा मेरा ख़याल रखते और उन्होंने कभी भी मेरी इज्ज़त में फ़र्क़ नहीं पड़ने दिया था।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-family:&amp;quot;Kruti Dev 010&amp;quot;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;तपा मंडी में आने से मुझे कुछ आर्थिक लाभ भी हुआ। मैंने सरकारी नौकरी के दौरान कभी भी अपने स्कूल के विद्यार्थियों की ट्यूशन नहीं की थी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पर ज्ञानी करने वाले विद्यार्थी मेरे पास हर सैशन में आते रहते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;विशेष तौर पर लड़कियाँ। बाकी स्कूल के कुछ अध्यापक स्कूल के विद्यार्थियों की भी ट्यूशन करते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;पर मैंने कभी एक भी स्कूल विद्यार्थी को ट्यूशन नहीं पढ़ाई थी। शायद&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;इस कारण भी साथी अध्यापकों से मेरी आत्मीयता बनी रही&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;क्योंकि ट्यूशन के मामले में मैं उनका प्रतिस्पर्धी नहीं था। ज्ञानी की कक्षा बाकायदा पढ़ाते रहने के कारण मुझे दो लाभ हुए - एक तो चार पैसे आने से हाथ खुला रहता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;दूसरा मैं पंजाबी साहित्य से जुड़ता रहता। इसके अतिरिक्त&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;एक अन्य लाभ भी था। मैं किसी न किसी लड़की या लड़के को अपनी कहानी डिक्टेट करवाने के लिए बुला लिया करता। मेरा यह काम करने के लिए उन विद्यार्थियों ने कभी माथे पर बल नहीं डाला था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;क्योंकि कई विद्यार्थियों से मैं ट्यूशन फीस लेता ही नहीं था। दस-बीस दिन यदि महीने से ऊपर हो जाते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;मैंने किसी से पैसे नहीं मांगे थे। इस तरह विद्यार्थियों से मेरा संबंध उस तरह के अध्यापकों वाला नहीं था जो ट्यूशन के मामले में बड़े सख्त थे। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;इस स्कूल में मैं &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;30&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt; दिसम्बर &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;1981&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt; तक रहा। यहीं से मैं लेक्चरर बनकर सरकारी कालेज&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;मालेरकोटला गया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-family:&amp;quot;Kruti Dev 010&amp;quot;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;यदि हैड मास्टर सिंगला साहब ने मेरे प्रति इतना मोह-प्यार रखा तो मैं भी उसके लिए जान कुर्बान करने तक गया। यहाँ संक्षेप में एक घटना का उल्लेख करना ज़रूरी है। हुआ इस तरह कि &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;31&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt; मार्च को जब स्कूल का परिणाम निकाला गया तो नौंवी के बहुत से विद्यार्थी फेल हो गए। जो छात्र फेल हुए थे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;वे थे भी समझो झंडे के नीचे। अपने फेल होने कारण वे हैड मास्टर को ही समझते थे। नतीजा सुनाने वाले दिन दोपहर के समय जब हैड मास्टर साहब बाहर निकले&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;उन छात्रों में से दो-तीन छात्रों ने हैड मास्टर पर लाठियों से हमला कर दिया। हैड मास्टर को काफ़ी चोटें आईं। हैड मास्टर पर हुआ यह हमला समूचे अध्यापक वर्ग पर हुआ हमला था। सारे स्टाफ ने उन विद्यार्थियों की गिरफ्तारी के लिए संघर्ष आरंभ कर दिया। इस संघर्ष में मैं सबसे आगे थे। पुलिसवाले लड़कों को पकड़ नहीं रहे थे। उन लड़कों में से एक लड़का पुलिसवाले का बेटा था। वैसे भी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;तपा मंडी में जब कर्मचारियों का कभी भी टकराव पैदा होता तो मंडी के लाला लोग मास्टरों के पक्ष में कम ही खड़े होते। आम भोले-भाले लोगों में यह प्रचार किया जाता कि मास्टर तो कामरेड हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;मास्टरों की तनख्वाहें बहुत हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;मास्टर पढ़ाते नहीं हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;मास्टर ट्यूशनें करते हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;आदि-आदि।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;      &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;जब विद्यार्थियों पर पुलिस ने हाथ न डाला तो हमने इलाके के अन्य अध्यापकों को शहर में प्रदर्शन करने के लिए आमंत्रण भेज दिया। बहुत बड़ी संख्या में अध्यापक विद्यार्थियों की इस हरकत और सरकार की अध्यापक विरोधी भूमिका के कारण शामिल हुए। इस अनहोनी के विरुद्ध पूरे शहर में से जुलूस निकाला गया और भरपूर रैली की गई। विद्यार्थियों के माता-पिता विद्यार्थियों से माफ़ी मंगवाने के लिए तो तैयार थे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पर उन्हें कोई और सख्त सजा दिलाने के लिए यूँ ही लीपापोती वाली बातें से ही काम निबटाना चाहते थे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;जिसके कारण हमने अपने संघर्ष को तहसील स्तर पर शुरू करने के लिए मन बना लिया। उस समय कोई खान साहब बरनाला में ए.एस.पी. था और था भी बहुत ईमानदार अफ़सर। सुना था कि यह ए.एस.पी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;डॉ. ज़ाकिर हुसैन का रिश्तेदार है। अध्यापकों से वह बड़े आदर से मिला। मैं उस डेपुटेशन में शामिल था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal; mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;पर हमारे बैठे-बैठे ही विद्यार्थियों के हक में अकाली नेता करतार सिंह जोशीला आ गया। उन दिनों जोशीला साहब सुरजीत सिंह बरनाला का दाहिना हाथ समझे जाते थे। लेकिन खान साहब की दिलेरी की दाद देना बनता है कि उन्होंने जोशीला साहब को इस तरह शर्मिन्दा किया कि वह पुन: बात करने के लायक नहीं रहा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पर पता नहीं क्या हुआ&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;सिंगला साहब विद्यार्थियों के माता-पिता से समझौता कर बैठे। सिंगला साहब का भाई प्यारा लाल एस.डी.एम. का रीडर था&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;संभव है कि उस कारण ही हैड मास्टर को समझौता करना पड़ा हो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;लेकिन हम अध्यापकों को इस बात का गर्व है कि सब अध्यापक सिंगला साहब के पीछे थे।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family: Mangal;mso-hansi-font-family:Mangal"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align:justify;tab-stops:42.85pt 122.35pt"&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-ascii-font-family:Mangal;mso-hansi-font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-844662928725979884?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/844662928725979884/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=844662928725979884&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/844662928725979884'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/844662928725979884'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2012/01/blog-post_15.html' title='आत्मकथा'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-QOKjOhOgMVs/Tx_2NsfyuYI/AAAAAAAAARQ/edvqke7xmIA/s72-c/Birds%2Band%2BTrees3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-1336653512938236332</id><published>2012-01-08T16:35:00.002+05:30</published><updated>2012-01-11T16:43:35.201+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेबल -  साउथाल(उपन्यास)- हरजीत अटवाल'/><title type='text'>पंजाबी उपन्यास</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-CLWyVrx1Zlw/Tw1tguXeUXI/AAAAAAAAAQ4/S_2kL2qa6zs/s1600/102.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696329512663273842" style="WIDTH: 193px; CURSOR: hand; HEIGHT: 153px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-CLWyVrx1Zlw/Tw1tguXeUXI/AAAAAAAAAQ4/S_2kL2qa6zs/s320/102.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ffff66;"&gt;''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे &lt;span class=""&gt;पूर्व&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-bR2ZNj8ZOo0/Tw1tyP1nyAI/AAAAAAAAARE/FXUL3-lWOfc/s1600/Southall.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696329813705869314" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 121px; CURSOR: hand; HEIGHT: 192px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-bR2ZNj8ZOo0/Tw1tyP1nyAI/AAAAAAAAARE/FXUL3-lWOfc/s320/Southall.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc00;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;साउथाल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;हरजीत अटवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc9933;"&gt;।। तीस ॥&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एक शाम ज्ञान कौर कहती है-&lt;br /&gt;''जी, मैं छुट्टी न कर लूँ सवेरे ?''&lt;br /&gt;''क्यों ? सेहत ठीक नहीं ?''&lt;br /&gt;''नहीं, सेहत तो ठीक है। लड़कियों को छुट्टियाँ है अब। मैंने सोचा, उनके साथ बैठकर देख लूँ। उनको घर के कामकाज के बारे में बताऊँ।''&lt;br /&gt;''इन्हें अपने संग ही ले जा फैक्टरी में ही, जो बताना है, वहीं बताती रहना।''&lt;br /&gt;''वहाँ कौन सा घर का काम होता है।''&lt;br /&gt;''चल फिर कर ले छुट्टी, आज मैं भी कहीं नहीं जाऊँगा।''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह कहता है। वैसे वह नहीं चाहता कि लड़कियाँ फैक्टरी में जाएँ क्योंकि यदि लड़कियाँ वहाँ हों तो उसको स्वयं भी गम्भीर रहना पड़ता है, नहीं तो वह पर्दे में रहकर किसी न किसी औरत से मजाक कर लेता है। दूसरा, मीका और गुरमीत जो ड्राइवर हैं, फैक्टरी में होते हैं और लड़कियों की तरफ आँखें फाड़-फाड़कर देखते रहते हैं। अब वह यह भी नहीं चाहता कि ज्ञान कौर घर में रहे, क्योंकि ज्ञान कौर की अनुपस्थिति में औरतें काम पूरा नहीं करतीं। वह काम करने वालों के संग सख्ती नहीं बरत पाता। कुछेक औरतों के साथ तो उसने वक्त-बेवक्त सम्बन्ध भी बना रखे हैं इसलिए भी सख्ती नहीं बरत पाता।&lt;br /&gt;सम्बन्ध रखने में वह बहुत गहरे नहीं उतरता अब। कुलजीत उसको ब्लैकमेल करना चाहती थी। उसके बाद वह सतर्क हो जाता है। अब वह सम्बन्ध सिर्फ़ विवाहित औरतों के साथ ही जोड़ता है। विवाहित औरतों की भी ज़रूरत अस्थायी होती है, प्रदुमण की ज़रूरत की तरह ही। अब फरीदा उसको बहुत उपयुक्त औरत प्रतीत हो रही है। वह छलांग लगाकर आगे नहीं बढ़ना चाहता। आहिस्ता-आहिस्ता वक्त लगाकर फरीदा के करीब जाना चाहता है। फिर वह ज्ञान कौर को भी किसी प्रकार का शक नहीं पड़ने देना चाहता।&lt;br /&gt;ज्ञान कौर का घर में रहकर भी ध्यान फैक्टरी की तरफ ही है। लेकिन वह अपनी बेटियों के बीच बैठकर खुश है। उनसे रोटी और सब्ज़ी बनवानी है। दोपहर को प्रदुमण सिंह भी रोटी खाने के लिए घर ही आ जाता है। जैसे जैसे बेटियाँ बड़ी हो रही हैं, ज्ञान कौर का मन उनमें ही रहने लगता है। वे घर पर हों तो फोन करके उनका हालचाल पूछती रहती है। बलराम की उसे अधिक चिन्ता नहीं होती। राजविंदर को लेकर सोचने लगती है। लेकिन जब से यह बात तय हुई है कि उसका विवाह कर दिया जाए, तब से उसको कुछ तसल्ली है और लड़के को ब्याहने का चाव-सा चढ़ा हुआ है। उसके इंडिया जाने के बारे में घर में बातें होने लगी हैं।&lt;br /&gt;एक दिन वह प्रदुमण सिंह से पूछती है-&lt;br /&gt;''फिर कितनी देर के लिए इंडिया जाऊँ ?''&lt;br /&gt;''चार हफ्ते के लिए।''&lt;br /&gt;''राजविंदर को साथ ले जाऊँ ?''&lt;br /&gt;''ले जाना, अगर मान जाए तो विवाह भी कर ही देना।''&lt;br /&gt;''तुम्हारे बिना ही ?''&lt;br /&gt;''बाकी सब वहीं हैं। तेरे भाई हैं, देख लेना, जैसे तुझे अच्छा लगे।''&lt;br /&gt;''फिर मेरे बगैर यहाँ काम कैसे चलेगा ?''&lt;br /&gt;''इसका तरीका यह है कि एक औरत को फोरलेडी बना दे। सारी जिम्मेदारी उसको दे दे। उसकी थोड़ी पैनी बढ़ा दे, देखना खुद काम करेगी। बड़ी फैक्टरियों में ऐसा ही होता है।''&lt;br /&gt;उस रात राजविंदर घर आता है तो ज्ञान कौर बैठी उसका इंतज़ार कर रही होती है। वह पूछता है-&lt;br /&gt;''क्यों मॉम, तू सोई नहीं अभी ?''&lt;br /&gt;''जिसका बेटा यूँ घूमता फिर रहा हो, माँ कैसे हो जाएगी ?''&lt;br /&gt;''माँ, तू रोज सोती है, आज क्या हो गया ?''&lt;br /&gt;''मुझे तेरी चिन्ता है।''&lt;br /&gt;''आई डोंट थिंक सो। अगर मेरी चिन्ता हो तो मुझे मनी क्यों नहीं देती ?''&lt;br /&gt;''मनी तू जितनी चाहे ले ले, पर फिजूल खर्च के लिए नहीं।''&lt;br /&gt;''खर्च तो खर्च होता है मॉम, फिजूल का मुझे नहीं पता।''&lt;br /&gt;''चल, हम इंडिया चलें क्रिसमस पर।''&lt;br /&gt;''इंडिया ? नो, नैवर।''&lt;br /&gt;''क्यों ? अपना मुल्क है।''&lt;br /&gt;''नहीं, मेरा कंट्री ये है। आय'एम ब्रिटिश।''&lt;br /&gt;''पर तेरे डैडी का और मेरा देश इंडिया ही है।''&lt;br /&gt;''तभी तो डैडी को किल करना चाहते थे वहाँ के लोग। मैं नहीं जाता इंडिया।''&lt;br /&gt;''पर वो टाइम बीत गया, अब वहाँ सब ठीक है।''&lt;br /&gt;''नहीं, मुझे नहीं जाना, तू जाना है तो जा। डैडी जाए, नॉट मी।''&lt;br /&gt;''फिर तेरा विवाह कैसे करेंगे ?''&lt;br /&gt;''व्हट विवाह ?''&lt;br /&gt;''तू विवाह नहीं करवाएगा ?''&lt;br /&gt;''वॉय ?''&lt;br /&gt;''तेरी उम्र हो गई है, तू अकेला घूमता फिरता है, तेरी वाइफ़ होगी तो तेरी फिक्र करेगी, तू उसका फिक्र करेगा।''&lt;br /&gt;''लुक मॉम, पहले डैड भी ऐसी रबिश बातें करता था, मैं विवाह लाइक नहीं करता। मेरे पर प्रैशर नहीं डालना, नहीं तो मैं घर से चला जाऊँगा। किसी फ्रैंड के साथ रहने लग पड़ूँगा।'' राजविंदर कहता है।&lt;br /&gt;ज्ञान कौर के हाथ-पैर फूलने लगते हैं कि लड़का कहीं सचमुच ही घर से न चला जाए और कहीं बाहर रहने लग पड़े। वह प्यार से उसको समझाते हुए कहती है-&lt;br /&gt;''न बाबा, मत करवा विवाह। मैं तो तेरे फायदे के लिए ही कहती थी।''&lt;br /&gt;राजविंदर अपने कमरे में चला जाता है। ज्ञान कौर भी थकी टांगों से सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे में जा पड़ती है। प्रदुमण सिंह अभी जाग रहा है। ज्ञान कौर कहती है-&lt;br /&gt;''लड़का नहीं मानता, कहता है घर से चला जाऊँगा।''&lt;br /&gt;''जाने दे अगर जाता है।''&lt;br /&gt;''लोग क्या कहेंगे कि इन्होंने लड़का घर से निकाल दिया।''&lt;br /&gt;''लड़का ही है, कौन सा लड़की है।''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह कहता है और सोने की कोशिश करता है। उसको नींद नहीं आती। बहुत देर तक करवटें बदलता रहता है। ज्ञान कौर को भी बड़ी मुश्किल से नींद आती है। सवेरे उठते ही प्रदुमण सिंह पत्नी से कहता है-&lt;br /&gt;''देख, इसको लेकर सोचने में टाइम खराब न कर, बलराम के बारे में सोच। उसको ब्याह दें, फिर लड़कियों की तरफ ध्यान दें।''&lt;br /&gt;''पहले भी यह बात कितनी बार सोच चुके हैं, पर करना आसान नहीं।''&lt;br /&gt;''छोड़ इस बात को, सारा दिन मूड खराब रहेगा।''&lt;br /&gt;कहते हुए प्रदुमण सिंह फरीदा के बारे में सोचने लगता है। फरीदा काम पर आती है। उसने रोज़ नया सूट पहना होता है। बालों में चिड़ियाँ बना रखी होती हैं। वह प्रदुमण सिंह के पास से गुजरते समय धीमी चाल में हो जाती है ताकि अच्छी तरह देख सके। प्रदुमण सिंह भी थोड़ा बन ठनकर रहने लग पड़ा है। वह सवेरे ही ज्ञान कौर से कह देता है-&lt;br /&gt;''कपड़े ज़रा अच्छी तरह से प्रैस कर देना, आज बैंक मैनेजर से मिलने जाना है।''&lt;br /&gt;उसको इस तरह रोज़ ही किसी न किसी से मिलने जाना होता है या फिर कोई उसको मिलने आ रहा होता है। पगड़ी भी रोज़ बदलने लग पड़ा है। पहले कत्थई रंग की ही पहना करता था, पर अब पगड़ियों का रंग बदलता रहता है। एक दिन शिन्दर कौर पूछती है-&lt;br /&gt;''अंकल जी, सुल्ली से पहले बात करके पगड़ी बांधा करते हो ?''&lt;br /&gt;शिन्दर कभी-कभी उसके साथ बाहर चले जाया करती है। वह उससे लड़ भी पड़ती है कि इतनी औरतों के साथ एक ही समय में उसने वास्ता क्यों रखा हुआ है। प्रदुमण सिंह कहता है-&lt;br /&gt;''क्यों, तू यह बात क्यों कहती है ?''&lt;br /&gt;''जिस रंग की आपने पगड़ी बांधी होती है, वह उसी रंग का सूट पहनकर आती है।''&lt;br /&gt;''नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं।'' कहकर प्रदुमण सिंह फरीदा के बारे में सोचने लगता है। फिर वह डर भी जाता है कि अभी तो कुछ घटित भी नहीं हुआ और खबर पहले ही फैल गई। फरीदा दफ्तर में मुस्कराती हुई दाख़िल होती है, कहती है-&lt;br /&gt;''सरदार जी, आप तो मुझे बदनाम कर छोड़ोगे ?''&lt;br /&gt;''क्यों, क्या बात हो गई ?''&lt;br /&gt;''औरतें कहती हैं कि सरदार की पगड़ी और मेरे सूट का रंग एक होसी।''&lt;br /&gt;''यह तो कोई दिल की दिल को राह होगी।''&lt;br /&gt;''हाय अल्ला ! बन्द करो यह राह ! मेरे मियाँ को पता चल गया तो वह हमें जान से मार देगा। अगर आपकी सरदारनी को पता चल गया तो मेरे बाल नोंच लेगी।''&lt;br /&gt;''फरीदा, तू बहुत सुन्दर है। तेरी हर अदा खूबसूरत है। मैं तुझ अकेली को मिलना चाहता हूँ, घर से कितने बजे निकलती हो ?''&lt;br /&gt;''यही पन्द्रह मिनट का तो रास्ता होसी।''&lt;br /&gt;''कल तू एक घंटा देर से आना, मैं तुझे राह में मिलूँगा।''&lt;br /&gt;''न सरदार जी न, परमात्मा का नाम लो। मैं ऐसा न कर सां।''&lt;br /&gt;''तू तो न कर, पर मैं तो कर सां... कल सवेरे साढ़े छह बजे मैं रोड के कार्नर पर मिलूँगा।''&lt;br /&gt;''नहीं जी, वहाँ नहीं, आपने मिलना है तो लेडी मार्गेट रोड पर खड़े होना।''&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-1336653512938236332?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/1336653512938236332/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=1336653512938236332&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/1336653512938236332'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/1336653512938236332'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='पंजाबी उपन्यास'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-CLWyVrx1Zlw/Tw1tguXeUXI/AAAAAAAAAQ4/S_2kL2qa6zs/s72-c/102.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-361900870923615306</id><published>2011-12-25T19:36:00.004+05:30</published><updated>2011-12-25T19:48:07.867+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धृतराष्ट्र (आत्मकथा) - डॉ. एस. तरसेम'/><title type='text'>आत्मकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-JxEqFNJracc/TvcvQFgRSsI/AAAAAAAAAQs/N3TSz2mmcQo/s1600/09.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5690068607607851714" style="WIDTH: 193px; CURSOR: hand; HEIGHT: 153px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-JxEqFNJracc/TvcvQFgRSsI/AAAAAAAAAQs/N3TSz2mmcQo/s320/09.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ffcc66;"&gt;धृतराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;डॉ. एस. तरसेम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;चैप्टर-25(प्रथम भाग)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;चूल्हे के साथ स्कूल&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नदौण सीनियर सेकेंडरी स्कूल की नौकरी के समय मैं जिस सेवा-मुक्त अध्यापिका के घर में रहा करता था, उसे मैं 'माँ' कहकर बुलाया करता था। उसने एक दिन अपने सख्त और बदज़बान ज़िला शिक्षा अफ़सर के कड़वे शब्दों की बात सुनाई। वह उसके पास अपने तबादले के लिए गई थी। उसके गाँव के करीब कोई स्कूल खुल गया था। उसने डी.ई.ओ. के पास इस नये खुले स्कूल में बदली करने के लिए अर्ज़ी दी और स्वयं पेश होकर भी विनती की। डी.ई.ओ. गुस्से में उछलकर पड़ा, ''बीबी, तेरे चूल्हे के साथ न स्कूल खोल दूँ कोई ?'' प्रत्युत्तर में वृद्ध माता से अपने अफ़सर के सम्मुख ज़बान खोलने का साहस ही नहीं पड़ा और काँपती हुई वह दफ्तर से बाहर निकल आई। अब जब मैं अपनी बदली सरकारी हाई स्कूल, तपा मंडी हो जाने की बात करने लगा हूँ, मुझे उस माँ के साथ घटित यह घटना स्मरण हो आई है। तपा स्कूल में आने से सचमुच मेरे लिए मेरा स्कूल बिलकुल चूल्हे के साथ ही था।&lt;br /&gt;आठ नंबर गली में मेरा मकान था। मेरा यह मकान स्कूल के प्रवेश द्वार से सिर्फ 45-50 ग़ज़ की दूरी पर ही था, समझो चूल्हे के साथ ही। मैं स्कूल बग़ैर किसी की सहायता के पहुँच सकता था। शुरू-शुरू में हुआ भी इस तरह ही। उन दिनों मुझे धूप-छाँव का तो पता चलता था, करीब आए व्यक्ति का चेहरा भी कुछ मेरे मन-मस्तिष्क में बैठ जाता, पर मैं अब लिख-पढ़ बिलकुल नहीं सकता था। जून की पहली तारीख़ थी और वर्ष था 1976 जब मैं इस स्कूल के स्टाफ में शामिल हो गया था। ज़िन्दगी में किसी स्कूल में लगातार यदि बहुत समय मैं टिका था तो वह तपा का यही सरकारी हाई स्कूल था।&lt;br /&gt;इस स्कूल के सभी अध्यापक मेरे जाने-पहचाने थे। हंस राज सिंगला मुख्य अध्यापक था। मेरा भाई उस समय सुखानंद आर्य हाई स्कूल, तपा का मुख्य अध्यापक था। शाम को सिंगला साहिब जब बाज़ार में आते, वह आकर हमारी दुकान पर ही बैठते। इस सरकारी स्कूल के पहले मुख्य अध्यापक आर्य स्कूल के साथ थोड़ा-बहुत टकराव की स्थिति में भी आए होंगे, पर सिंगला साहिब कभी नहीं। इसलिए सिंगला साहिब मेरे लिए बिलकुल अपरिचित नहीं थे।&lt;br /&gt;एक बात और भी थी, सिंगला साहिब का एक साला नेत्रहीन था। वह सरकारी नेत्रहीनों के स्कूल, पानीपत का प्रिंसीपल था। इसलिए सिंगला साहिब के होते हुए मुझे यह डर भी नहीं था कि वह कम नज़र के कारण मुझे किसी तरह से तंग-परेशान करेंगे। हालाँकि मैं जानता था कि एक नेत्रहीन किसी सरकारी स्कूल में इतिहास का लेक्चरर लग चुका है। मुझे यह भी पता था कि कोई कृष्ण कुमार सरकारी राजिंदरा कालेज, बठिंडा में राजनीति शास्त्र का लेक्चरर लगा है। उसका चयन पंजाब पब्लिक सर्विस कमीशन की तरफ़ से हुआ था। मैं भी सामाजिक शिक्षा का अध्यापक था। इस विषय में इतिहास, राजनीति शास्त्र, समाज शास्त्र, अर्थ शास्त्र और भूगोल शामिल होते हैं। भूगोल पढ़ाने के लिए ग्लोब और नक्शे की ज़रूरत पड़ती थी। इन दोनों का संबंध सीधा आँखों की रौशनी से है, पर इस विषय के बहुत से अध्याय कोई भी नेत्रहीन पढ़ा सकता है। पर इस पद पर काम करने वाले हर अध्यापक को दसवीं कक्षा तक अंग्रेजी भी पढ़ानी पड़ सकती थी। मैं पिछले सभी स्कूलों में दसवीं तक अंग्रेजी पढ़ाता आ रहा था और मैंने अंग्रेजी और सामाजिक शिक्षा पढ़ाने का तरीका खोज लिया था।&lt;br /&gt;मैं मुख्य अध्यापक से इतनी भर छूट चाहता था कि वह मुझे छठी कक्षा की अंग्रेजी न दे। कारण यह था कि छठी कक्षा के बच्चों की अक्षरों की पहचान कराने और छोटी और बड़ी अंग्रेजी वर्णमाला को चार लाइनों वाली कॉपी पर लिखने का काम मैं नहीं कर सकता था। न सिंगला साहिब ने और न ही किसी अन्य मास्टर ने मुझे ऐसा टाइम-टेबल देने में कोई नोंक-झोंक की थी जो जज्बात को ठेस पहुँचा सके। आठवीं की अंग्रेजी मुझे इस स्कूल में दो बार पढ़ानी पढ़ी। मुझे ये शब्द लिखते हुए अपार खुशी हो रही है कि एक बार आठवीं की अंग्रेजी में मेरा नतीजा 90 प्रतिशत से अधिक था और अधिकतर विद्यार्थियों के इस विषय में प्रथम श्रेणी के नंबर आए थे। एक विद्यार्थी के 100 में से 80 से भी अधिक। सामाजिक शिक्षा पढ़ाने में भी मुझे कोई कठिनाई नहीं थी। भारत का नक्शा मैं ब्लैक बोर्ड पर अपने हाथ से बना सकता था और स्कूल में पढ़ाते समय सैकड़ों बार बनाया भी होगा। 10वीं की वार्षिक परीक्षा में जो नक्शा भरने के लिए आता था, वह भारत का ही होता था। इस नक्शे में भारत के बड़े शहर, नदियाँ, रेल मार्ग, हवाई मार्ग, घनी आबादी वाले क्षेत्र, कम आबादी वाले क्षेत्र, खनिज पदार्थ, फसलें और औद्योगिक क्षेत्र आदि भरने के लिए कहा जाता। यह सब भरने के लिए मैं अपनी आँखों की ज्योति ठीक होने के समय काफ़ी अभ्यस्त हो चुका था। इसलिए अब भी भारत का नक्शा ब्लैक बोर्ड पर बनाकर समझाने में मुझे कोई झिझक नहीं थी। इस स्कूल में जिस सबसे बढ़िया बात ने अगले पाँच सालों में मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया, वह थी -बाबू परषोत्तम दास से बनी सांझ। बाबू परषोत्तम दास सिंगला इस स्कूल में क्लर्क था। मुख्य अध्यापक के बाद स्कूल में क्लर्क की ही सबसे अधिक चलती, कई बार हैड मास्टर से भी अधिक। बाबू परषोत्तम दास के मधुर स्वभाव, फ़राख़दिली, नम्रता और लचीले व्यवहार के कारण सब अध्यापक उसका आदर करते। सिंगला साहिब भी उसका बहुत सम्मान करते। वह ज़िला शिक्षा विभाग मिनिस्ट्रीयल स्टाफ़ एसोसिएशन का नेता भी था। काफ़ी समय तो वह ज़िला संगरूर की इस एसोसिएशन का प्रधान भी रहा। मेरे प्रति उसके पुर-ख़ुलूस रवैये ने स्कूल में कभी भी मुझे कोई कठिनाई नहीं आने दी।&lt;br /&gt;यद्यपि उस समय प्राइमरी कक्षाएँ भी हाई स्कूल का हिस्सा थीं और कुछ प्राइमरी कक्षाएँ इस मुख्य इमारत के एक ओर बनी पुरानी इमारत में लगा करती थीं, पर कुछ कक्षाएँ रेलवे स्टेशन के सामने वाली सराय में लगा करतीं। मैं चौथी कक्षा तक उस सराय वाली बिल्डिंग में ही पढ़ा था और पाँचवी कक्षा के कुछ महीने उस पुरानी बिल्डिंग में जहाँ अब प्राइमरी कक्षाएँ लगती थीं। सरदार भगत सिंह बाली तब सरकारी मिडल स्कूल के मुख्य अध्यापक थे, बहुत अच्छे अध्यापक और बहुत अच्छे खिलाड़ी, शहतूत की छमक जैसा शरीर। सुनहरी फ्रेम वाली ऐनक से वह बड़ी दिलकश शख्शीयत लगते। विद्यार्थियों के साथ हॉकी खेलते समय तो वह मुझे बहुत ही अदभुत-सी शख्शीयत लगते। ऐनक वाले किसी व्यक्ति को मैंने पहली बार हॉकी खेलते देखा था। इस स्कूल में आकर मुझे अपने बचपन की पढ़ाई वाले दिन याद आ गए और दो-तीन बार तो मैंने उस कमरे में भी जाकर देखा था जिस कमरे में मैं पाँचवी कक्षा के दौरान बैठा करता था।&lt;br /&gt;हैड मास्टर हंस राज सिंगला के संग दो-तीन बार सराय वाले स्कूल में भी जाने का अवसर मिला। जब मैं 1958 से 1962 तक कुछ वर्ष आर्य स्कूल में पढ़ाता रहा था, उस समय मुकाबले का स्कूल होने के कारण सब मास्टर सरकारी स्कूल के ख़िलाफ़ पूरा रिकार्ड बजाते, पर मैं इस रिकार्डबाज़ी में कभी शामिल नहीं हुआ था। अब जबकि मैं इस स्कूल में एक अध्यापक के तौर पर आ गया था तो मुझे इस बात की तसल्ली थी कि आर्य स्कूल के कुछ अध्यापकों के पीछे लगकर मैंने अपने इस स्कूल के बारे में कभी कुछ नहीं कहा था।&lt;br /&gt;1964 में कम्युनिस्ट पार्टी में फूट पड़ गई थी। कर्मचारी संगठनों की सरपरस्ती मोटे तौर पर पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी करती थी। फूट के बाद कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) के अस्तित्व में आ जाने के कारण धीरे-धीरे कर्मचारी भी दो हिस्सों में बँट गए थे। सी.पी.आई. अर्थात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी वाले कर्मचारी गुट का नेता पंजाब में रणबीर ढिल्लों था और सी.पी.एम. से संबंधित कर्मचारी फेडरेशन का नेता त्रिलोचन सिंह राणा। पंजाब में कर्मचारियों में से अधिक गिनती अध्यापकों की थी, जिस कारण गवर्नमेंट टीचर्ज़ यूनियन पृथक तौर पर काम करती थी और पंजाब सबार्डीनेट सर्विसिज़ फेडरेशन के एक अंग के रूप में भी। 1968 के बाद कम्युनिस्टों में ही हथियारबंद संघर्ष से इंकलाब लाने वाली पार्टी सी.पी.आई.एम.एल. अस्तित्व में आ गई थी। एम.एल. का अर्थ है- मार्क्सवादी लेनिनवादी। इस पार्टी की नींव बंगाल के नक्सलवाड़ी क्षेत्र में रखी गई थी। इसलिए इससे संबंधित पार्टी सदस्यों या कर्मचारियों को नक्सली भी कहा जाता था। सो, 1968 से अध्यापकों में तीन बड़े ग्रुप बन चुके थे - ढिल्लों ग्रुप, राणा ग्रुप और नक्सली ग्रुप। एक ग्रुप कांग्रेसियों का भी था। असल में, यह सरकारी किस्म का ग्रुप था। कांग्रेस के राज के समय इनका अस्तित्व प्रकट होता। शहरों में आर.एस.एस. या जनसंघ (अब बी.जे.पी.) से संबंधित भी कुछ कर्मचारी थे पर इनका कोई अधिक प्रभाव नहीं था।&lt;br /&gt;सरकारी हाई स्कूल, तपा एक बड़ा स्कूल होने के कारण यहाँ हर धड़े का कोई न कोई छोटा-बड़ा नेता सक्रिय था। मेरा संबंध अब ढिल्लों ग्रुप से था (वैसे मैं सी.पी.आई. की 1964 की दोफाड़ के समय सी.पी.आई.एम. का हमदर्द बन गया था, क्योंकि हमारे ज़िले के सभी बड़े और बुजुर्ग़ कामरेड सी.पी.आई.एम. से जुड़े हुए थे, पर अध्यापकों में सी.पी.आई.एम. से संबंधित फेडरेशन का आर.एस.एस. के साथ अंदरूनी समझौता मुझे कतई मौकापरस्ती प्रतीत होता था और चुभता भी था। वैसे भी अधिकांश नेताओं में कम्युनिस्ट होने की बजाय जट्ट होने की हैंकड़ मेरी मानसिकता को बिलकुल भी नहीं भाती थी। इसलिए 1970 में मैं स्पष्ट तौर पर सी.पी.आई. से जुड़ गया, समझो कर्मचारियों या अध्यापकों में मैं ढिल्लों ग्रुप का समर्थक बन गया)। लेकिन मेरा भाषण वाला जोश कइयों को राणा ग्रुप वाला लगता और कइयों को नक्सलियों वाला। वैसे भी मैं मज़दूरों और कर्मचारियों के संबंध में अलग-अलग खिचड़ी पकाने के स्थान पर एकता के पक्ष में था। बाबू परषोत्तम दास के ढिल्लों ग्रुप के साथ होने की वजह से ढिल्लों ग्रुप का स्कूल में दबदबा था। कारण यह था कि बाबू परषोत्तम दास से कई अध्यापकों को छोटे-मोटे काम लेने होते थे, जिस कारण वे ढिल्लों ग्रुप के पक्षधर होने में ही बेहतरी समझते थे।&lt;br /&gt;ज्ञानी हमीर सिंह इस स्कूल में राणा ग्रुप का लीडर था। वह सी.पी.एम. पक्षधर नहीं था। उसकी पृष्ठभूमि अकाली दल से जाकर जुड़ती थी। कर्मचारियों में बहुत से अकाली पक्षधर अक्सर राणा ग्रुप की ओर ही जाते। सुरजीत सिंह डी.पी.ई. के आने से राणा ग्रुप भी स्कूल में कुछ ज़ोर पकड़ गया था। सुरजीत शहिणा का था और मेरा गाँव शहिणा होने के कारण वह मुझे बुजुर्ग़ों वाला सम्मान देता था। उभरते रूप में नक्सली सिर्फ़ एक ही अध्यापक था और वह था - हरकीरत सिंह, पी.टी.आई.। यहाँ एक जनसंघी भी था, पक्का आर.एस.एस., वह था - हंस राज गुप्ता। उसके पास एल.आई.सी. की एजेंसी होने के कारण सभी उसे बीमा मास्टर कहते थे। अकेला होने के कारण वह जल्दी ही किसी के साथ बहस में नहीं पड़ता था। किसी से बहस में पड़ने के कारण उसके बीमा वाले काम में नुकसान पहुँच सकता था। वैसे गवर्नमेंट टीचर्ज़ यूनियन के चुनाव बाकायदा ब्लॉक प्रधान और ज़िला प्रधान के होने के कारण सभी ग्रुप इस चुनाव में दिलचस्पी लेते। जब मैं तपा मंडी के स्कूल में आ गया था, तब तो चुनाव की सरगरमी ट्रक यूनियन के चुनाव जैसी हो गई थी। झूठा-सच्चा प्रचार भी होता, जिन अध्यापकों के काम रुके पड़े होते, लीडर उनके काम करवाने के लिए रातों-रात दफ्तरों में से काम करवाकर ला देते या काम करवाने का वायदा करते।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-361900870923615306?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/361900870923615306/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=361900870923615306&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/361900870923615306'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/361900870923615306'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/12/blog-post_25.html' title='आत्मकथा'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-JxEqFNJracc/TvcvQFgRSsI/AAAAAAAAAQs/N3TSz2mmcQo/s72-c/09.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-5781108639832162527</id><published>2011-12-11T18:29:00.006+05:30</published><updated>2011-12-11T18:42:49.814+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साउथाल(उपन्यास)- हरजीत अटवाल'/><title type='text'>पंजाबी उपन्यास</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-NGLxJ7VpDUM/TuSqvM8eVLI/AAAAAAAAAQU/aQ5Us9AVpgw/s1600/09.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5684856357553853618" style="WIDTH: 149px; CURSOR: hand; HEIGHT: 111px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-NGLxJ7VpDUM/TuSqvM8eVLI/AAAAAAAAAQU/aQ5Us9AVpgw/s320/09.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ffff99;"&gt;&lt;em&gt;''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-mW2jGpB1sgE/TuSq7Dc-6uI/AAAAAAAAAQg/zeEt3ooLoVE/s1600/Southall.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5684856561164282594" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 216px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-mW2jGpB1sgE/TuSq7Dc-6uI/AAAAAAAAAQg/zeEt3ooLoVE/s320/Southall.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़ कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;साउथाल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ffcc33;"&gt;हरजीत अटवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;।। उनतीस ॥&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;चौधरी मुस्ताक अली प्रदुमण सिंह को पाँच सौ समोसों का आर्डर दे देता है, पर उसको कच्चे समोसे चाहिए क्योंकि वह उन्हें खुद तलना चाहता है। चौधरी कहता है-&lt;br /&gt;''सरदार जी, आप इतने बनाकर दो... अगर चलेंगे तो खत्म होते ही अगला आर्डर दूंगा। मेरे पास टाइम ही नहीं है समोसे बनाने लायक। फिर ये बिकते भी कितने होंगे! दूसरा इतना सामान जो है खाने वाला। समोसे खाने का क्रेज गोरों को होगा, अगर कोई पूछे तो हम फ्रिज में से निकाल कर तल देते हैं। मैंने देखा है कि आपके समोसे का साइज कुछ बड़ा है, हमें कुछ छोटे चाहिए होंगे।''&lt;br /&gt;नमूने के तौर पर चौधरी एक समोसा प्रदुमण सिंह को देता है। वह समोसे को तोलकर देखता है। समोसे का वजन नब्बे ग्राम है। वह समझ जाता है कि चौधरी को क्या चाहिए। चौधरी के इस आर्डर से उसके लिए नया राह खुल जाता है। वह अगले दिन एक फ्रीजर खरीद लेता है और सारे स्टाफ से दो घंटे अधिक काम लेकर फ्रीजर को कच्चे समोसों से भर लेता है। उस शाम चौधरी का आर्डर भी पहुँचता कर देता है। वह योजना बनाने लगता है कि कच्चे समोसों का वह एक अलग राउंड खड़ा करेगा। उसका यह माल फिश एंड चिप्स की दुकानों या कैफों पर खपत हो सकेगा। अब उसको एक और ड्राइवर की आवश्यकता होगी। यूँ भी अब वह बहुत ध्यान से चलना चाहता है। बलबीर ने अपना राउंड बना लिया है। उसके पीछे-पीछे गुरमीत भी पक्का होकर अपना काम खड़ा करने का यत्न करेगा। फिर एकदम ड्राइवर खोजना कठिन हो सकता है। क्यों न किसी ड्राइवर को अभी तलाश ले और काम पर रख ले। हाल की घड़ी अन्दर काम करता रहे। कभी-कभी राउंड पर भी जाता रहे और ज़रूरत पड़ने पर काम कर सके, पूरे ड्राइवर का।&lt;br /&gt;एक दिन एक औरत काम पूछने के लिए आती है। जैसा कि कई बार लोग काम की तलाश में निकलते हैं और एक फैक्टरी से दूसरी फैक्टरी होते हुए काम पूछते जाते हैं। अब तक प्रदुमण की इस फैक्टरी के आसपास के इलाके में काफी चर्चा है। यदि कोई काम छोड़ता है तो उसकी जगह भरने में वक्त नहीं लगता। काम पूछने आई औरत पाकिस्तानी है। प्रदुमण सिंह ऐसी पहचान करने में माहिर है। पाकिस्तानी औरतों के पहरावे में भी कुछ अन्तर है। चुन्नियाँ भारी होती हैं और सलवार की सलवटें भी बहुत जैसे कि पटियाला सूट-सलवार में हुआ करती हैं। एक अन्य ख़ास फ़र्क होता है कि उनकी सलवार टखनों से ऊँची होती है। उनका मेकअप भी कुछ भारी होता है और देखने के अंदाज में कुछ अजीब किस्म की झिझक होती है। मर्द की ओर देखती ही रहती हैं। वह औरत फैक्टरी के अन्दर प्रवेश करते ही मैनेजर के बारे में पूछती है। कोई ज्ञान कौर की तरफ इशारा कर देता है। वह ज्ञानो के पास जाकर पूछती है-&lt;br /&gt;''जी, आपको काम के लिए किसी की ज़रूरत है ?''&lt;br /&gt;ज्ञान कौर एक तरफ खड़े प्रदुमण सिंह की ओर देखती है। उसकी तो पहले ही निगाह उस औरत की तरफ है। वह निकट आते हुए पूछता है-&lt;br /&gt;''बताओ, क्या खिदमत कर सकता हूँ ?''&lt;br /&gt;''जी, काम होसी (होगा)?''&lt;br /&gt;''क्या नाम है तुम्हारा ?''&lt;br /&gt;''जी फरीदा।''&lt;br /&gt;''फरीदा जी, हमें एक ड्राइवर की ज़रूरत है, फैक्टरी में तो अभी हमारा काम चल रहा है। दो हफ्ते तक पता कर लेना।'' कहकर वह ज्ञान कौर की ओर देखता है। मानो पूछ रहा हो कि ठीक कहा न। फिर वह फरीदा की तरफ देखता है, जैसे कह रहा हो कि मेरे कहे पर यकीन न करना। फरीदा का भरा हुआ शरीर और बहुत कुछ कहते नयन उसके अन्दर आकर्षण का केन्द्र बन रहे हैं। वह ज्ञान कौर से पूछता है-&lt;br /&gt;''देख ले, यदि ज़रूरत है या एडजस्ट कर सकती है तो।''&lt;br /&gt;''अभी तो हमको ज़रूरत नहीं।''&lt;br /&gt;''तू कह रही थी कि गिलणी काम छोड़ रही है।''&lt;br /&gt;''उसको वापस इंडिया जाना है, पर पता नहीं कब।''&lt;br /&gt;पत्नी की बात की ओर ध्यान दिए बिना प्रदुमण फरीदा से पूछने लगता है-&lt;br /&gt;''क्या क्या बना लेते हो ?''&lt;br /&gt;''मैं रसोई की बहुत माहिर हूँ जी।''&lt;br /&gt;''तंदूरी चिकन बना लेते हो ?''&lt;br /&gt;''अगर खाने वाला अपनी उंगलियाँ न खा जाए तो मुझे फरीदा न कहना।''&lt;br /&gt;''यह तो जब कभी खाएँगे तो बताएँगे।''&lt;br /&gt;फिर वह धीमे से ज्ञान कौर से कहता है-&lt;br /&gt;''कई दुकानों वाले तंदूरी चिकन की मांग करते हैं और कबाबों की भी।''&lt;br /&gt;असल में, वे दोनों कबाब शुरू करने को लेकर कई बार आपस में सलाह कर चुके हैं, पर बनाने वाला नहीं मिल रहा। खराब चीज़ बनाकर वह अपना बना-बनाया नाम खराब नहीं करना चाहता। वह जानता है कि मुसलमान मीट बनाने में बहुत गुणी होते हैं। प्रदुमण सिंह ज्ञान कौर के उत्तर की प्रतीक्षा किए बग़ैर ही कहने लगता है-&lt;br /&gt;''फरीदा जी, तुम टेम्परेरी आ जाओ, पार्ट टाइम। हम देखेंगे कि तुम कैसा चिकन बनाते हो और कबाब भी।''&lt;br /&gt;''सरदार जी, एक मौका देकर देखो।''&lt;br /&gt;''कल सवेरे आ जाओ।''&lt;br /&gt;''क्या रेट होसी जी घंटे का ?''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह ज्ञान कौर की ओर देखने लगता है क्योंकि फरीदा के इस सवाल का जवाब वह नहीं दे सकता। ज्ञान कौर कहती है-&lt;br /&gt;''हम दो पौंड एक घंटे के देते हैं।''&lt;br /&gt;''सिर्फ़ दो !''&lt;br /&gt;''लोग तो डेढ़ या एक पिचहत्तर ही देते हैं।''&lt;br /&gt;''नहीं जी, दो तो बहुत कम हैं।''&lt;br /&gt;''देख लो, तुम्हारी मर्जी है, हमें तो काम की ज़रूरत नहीं। यह तो यूँ ही तंदूरी चिकन की बात उठाये जाते हैं, पता नहीं बिकेगा भी कि नहीं।''&lt;br /&gt;ज्ञान कौर बात खत्म करने की तरह बात करती है।&lt;br /&gt;फरीदा कुछ मिनट सोचकर कहती है-&lt;br /&gt;''दो तो बहुत कम होसी, पर मुझे काम की ज़रूरत है, कल सुबह आ जासां। कितने बजे?''&lt;br /&gt;''छह बजे शुरू करते हैं, पर तुम आठ बजे आ जाओ बेशक।''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह कहता है। फरीदा बोलती है-&lt;br /&gt;''सरदार जी, मैं तो छह बजे भी आ जासां, उठने की प्रॉब्लम न होसी।'' बात करते हुए वह प्रदुमण सिंह की पगड़ी की तरफ देखती है।&lt;br /&gt;अगले दिन वह सवेरे छह बजे पहुँच जाती है। कुछ मसाले वह अपने साथ लाई है। मसालों वाला बैग ज्ञान कौर को दिखाते हुए कहती है-&lt;br /&gt;''भा जी, ये कुछ चीज़ें हैं जो मैं कबाब बनाने में इस्तेमाल कर सां।''&lt;br /&gt;''जैसे चाहे कर ले, पर पहले बनाकर दिखा कुछ न कुछ। हमको अभी सप्लाई नहीं करना।''&lt;br /&gt;''सप्लाई कर सों तो धड़ाधड़ बिक सीं।''&lt;br /&gt;''नहीं, सप्लाई के लिए जो माल मार्किट में जाता है, उसके स्वाद का हमको ध्यान रखना पड़ता है।''&lt;br /&gt;''ये तो भा जी ठीक है, आप एक बार मेरा काम देखो, फिर फैसला कर सीं।''&lt;br /&gt;ज्ञान कौर फरीदा को फ्रिज में से चिकन निकाल कर देती है। फरीदा थोड़ा-सा झुककर मसाले मिलाकर चिकन में डालती है। बड़े से पतीले के आगे झुकी हुई फरीदा की नज़र सामने खड़े प्रदुमण सिंह पर पड़ती है जो उसकी कमीज के गले की तरफ देख रहा है। वह एकदम खड़ी हो जाती है। थोड़ा मुस्कराते हुए कहती है-&lt;br /&gt;''तैयार होने दो सरदार जी, फिर देखना।''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह झेंप जाता है और ऊपर दफ्तर की तरफ चला जाता है। वह फरीदा के बारे में सोचते हुए सपने बुनने लगता है। कुछ देर बाद फरीदा ऊपर आती है। उसके हाथ में एक प्लेट है जिसमें चिकन रखा हुआ है। लाल रंग की चिकन लैग महक छोड़ रही है। वह कहती है-&lt;br /&gt;''ध्यान रखना, अगर उंगलियों को बचाना है तो।''&lt;br /&gt;कहती-हँसती वह नीचे उतर जाती है।&lt;br /&gt;अभी उसका खाने का मूड नहीं है। वक्त भी नहीं हुआ, पर चिकन की खुशबू से उसको भूख लग आती है। वह खाता है। स्वाद है। वह नीचे आकर ज्ञान कौर को एक तरफ ले जाकर कहता है-&lt;br /&gt;''बहुत बढ़िया बनाया है चिकन, मिर्च बहुत तेज़ है। हमारे लिए तो ठीक है, पर गोरों के लिए तेज़ है। वैसे चिकन का रंग-ढंग बढ़िया रेस्ट्रोरेंट वाला ही है। सोच ले, अगर दिल करता है तो काम पर रख ले। चिकन सप्लाई करने के लिए तो अभी सोचते हैं, अभी बेशक दूसरे काम पर लगा ले।''&lt;br /&gt;ज्ञान कौर कुछ नहीं कहती। उसको फरीदा बोझ-सा प्रतीत हो रही है। उसकी फैक्टरी में कोई ज़रूरत नहीं है। प्रदुमण सिंह फिर दफ्तर में चला जाता है। दोपहर को फरीदा कबाब बना लाती है। साथ में दही की चटनी है। प्रदुमण सिंह खाता है। वह पूछती है-&lt;br /&gt;''कैसा टेस्ट है ?''&lt;br /&gt;''बहुत बढ़िया। तेरा मियाँ तो खा-खाकर कुप्पा हो गया होगा।''&lt;br /&gt;''ना सरदार जी, वह तो सूखा पड़ा है।''&lt;br /&gt;''क्यों ? खाता नहीं यह सब जो तू बनाती है ?''&lt;br /&gt;''मैं तो बहुत कुछ बना सां, मेरा मियाँ भी बनाने में पूरा माहिर होसी, वो खूब खाता है, पर सुकड़ा होसी, उम्र जो बहुत होसी।''&lt;br /&gt;''तुझसे बड़ा है ?''&lt;br /&gt;''जी, सरदार जी, पूरे बीस साल। तीसरी बेगम होसां उसकी।''&lt;br /&gt;कहते हुए फरीदा आँखें भर लेती है। प्रदुमण सिंह कहता है-&lt;br /&gt;''फरीदा, तेरे जैसी सुन्दर औरत के साथ तो यह बहुत ज्यादती है, यह तो बहुत गलत बात है।''&lt;br /&gt;''मेरे नसीब ! सरदार जी।''&lt;br /&gt;''कुछ भी कह ले, पर यदि मैं तेरे किसी काम आ सकूँ तो...''&lt;br /&gt;''शुक्रिया सरदार जी, अभी तो मुझे काम की ज़रूरत थी।''&lt;br /&gt;''काम तेरा पक्का।''&lt;br /&gt;फरीदा कुछ नहीं बोलती। आँखों से ही उसका धन्यवाद करती है। वह जाने लगती है। प्रदुमण सिंह कहता है-&lt;br /&gt;''रब तेरा हुस्न ऐसे ही बनाए रखे !''&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc00;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-5781108639832162527?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/5781108639832162527/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=5781108639832162527&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/5781108639832162527'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/5781108639832162527'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='पंजाबी उपन्यास'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-NGLxJ7VpDUM/TuSqvM8eVLI/AAAAAAAAAQU/aQ5Us9AVpgw/s72-c/09.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-3211617122744434227</id><published>2011-11-27T18:46:00.006+05:30</published><updated>2011-11-28T13:13:10.914+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धृतराष्ट्र (आत्मकथा) - डॉ. एस. तरसेम'/><title type='text'>आत्मकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/--FQ4LMlChx0/TtI4uJ_jLxI/AAAAAAAAAPY/XFQ571qvx5A/s1600/n20.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5679664445675220754" style="WIDTH: 169px; CURSOR: hand; HEIGHT: 122px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/--FQ4LMlChx0/TtI4uJ_jLxI/AAAAAAAAAPY/XFQ571qvx5A/s320/n20.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;धृतराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ffcc33;"&gt;डॉ. एस. तरसेम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcccc;"&gt;चैप्टर-24( दूसरा भाग)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मोहब्बत का 'ससा'¹&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;मैंने अपने लेखकीय नाम स. तरसेम के साथ सिर्फ़ एक लड़की का नाम नहीं जोड़ा था, इस नाम में दो और लड़कियों के नाम का अगला अथवा मध्य का हिस्सा अवश्य है। भारतीय समाज को मैं आरंभ में बहुत कठोर समझता रहा था क्योंकि मेरे दिल में यह बात दृढ़ हो चुकी थी कि यदि मेरा पहला प्रेम परवान नहीं चढ़ा तो उसमें उस लड़की का कोई कसूर नहीं। वह जाति-पाति की लक्ष्मण-रेखा नहीं पा कर सकती थी। संभव है, इसीलिए उसने मेरे प्यार का जवाब देना उचित नहीं समझा हो, पर मेरे भाई की साली की राह में तो कोई रुकावट नहीं थी। बचपन में अक्सर हमारे घर में मेरे भाई की सबसे छोटी साली से मेरे विवाह की बात चलती रहती। जब भाई का बड़ा साला आता तो वह अक्सर ही यह बात करता। बात प्राय: हँसी में टल जाती। मेरा भी भाई की साली में पूरा झुकाव न होने के कारण मेरी दिलचस्पी उन बातों में बहुत कम हुआ करती, लेकिन जब मैं बड़ा हो गया और मेरे पहले प्रेम की केन्द्र-बिंदु मुझसे दूर हो गई तो मेरा झुकाव माला की तरफ हो गया था। उसका पूरा नाम राज माला था। अब जब भी राज माला की मेरे संग विवाह की बात चलती, मेरे कान खड़े हो जाते। मैंने उसे सिर्फ़ एक बार देखा था, उस समय मैं दूसरी कक्षा में पढ़ा करता था और दशहरे का दिन था। मेरा भाई मुझे अपनी ससुराल ले गया था। छोटी सी राज माला को अब मैंने 18-19 वर्ष की समझकर उसकी शक्ल अपने मन में बना रखी थी।&lt;br /&gt;संयोग से जनवरी 1961 के अन्तिम सप्ताह में राज माला तपा आ गई। उसने एफ.ए. अंग्रेजी की परीक्षा देनी थी। उन दिनों उसके माता-पिता हरियाणा के एक बड़े शहर को छोड़कर नज़दीक ही छोटे-से कस्बे में जा बसे थे। यहाँ उनकी साथ वाले किसी गाँव में काफ़ी ज़मीन थी। इसलिए, उसके बड़े भाई की उस शहर में रिहाइश होने के बावजूद उसके माता-पिता और छोटे बहन-भाई उस छोटे-से कस्बे में आ टिके थे। कालेज उन दिनों आम नहीं थे। इसलिए दसवीं और प्रभाकर पास करने के पश्चात माला अंग्रेजी में एफ.ए. करने की तैयारी करने लग पड़ी थी। एक अध्यापक उसे घर में आकर पढ़ा जाता, परन्तु एक ऐसी घटना घटी कि माला ने उस अध्यापक से पढ़ने से इन्कार कर दिया। कारण शायद उसने अपने माता-पिता को बताया हो। मुझे तो बस इतना याद है कि वह एफ.ए. (आजकल प्लस 2) अंग्रेजी पढ़ने के लिए तपा में आई थी। भाई उन दिनों मोगा में बी.एड कर रहा था। मेरी समझ में नहीं आता था कि उसके माता-पिता ने क्या सोचकर उसको तपा में पढ़ने के लिए भेज दिया था। संक्षेप में यह कि माला को अंग्रेजी पढ़ाने की जिम्मेदारी भी मेरे ऊपर आ पड़ी। सच बात तो यह है कि मैं ऊपर से दुखी दिखता था परन्तु भीतर से बहुत खुश था। यदि यही काम किसी अन्य का करना होता तो मैं साफ़ जवाब दे देता।&lt;br /&gt;तपा मंडी के आर्य स्कूल के सभी पीरियड पढ़ाने, सुबह और शाम ट्यूशनें करने, बहन तारा की पढ़ाई के बाद राज माला को पढ़ाकर मैं थकता नहीं था। इस न थकने का कारण माला थी। उसे पढ़ाने के बाद मैं खुद बी.ए. इतिहास की परीक्षा की तैयारी के लिए एक-डेढ़ घंटा रात के ग्यारह बजे के बाद लगाया करता। उस समय तक, दिन में पढ़ने-पढ़ाने में मुझे कोई दिक्कत नहीं आती थी परन्तु रात के समय मैं दीवार या छत से लगी ट्यूब की रोशनी में भी नहीं पढ़ पाता था। यही कारण था कि मैंने छत से अतिरिक्त तार लगाकर 60 वॉट का बल्ब लगा लिया था जो मेरे सिर से तीनेक फुट और मेज़ से चार फुट ऊँचा था। इस तरह पढ़ने-लिखने से आँखें थक तो जातीं, पर कोई मुश्किल नहीं आती थी। वैसे भी, मैं अपनी किताब पढ़ने की बजाय पढ़ने का काम किसी विद्यार्थी से करवाता। इस जुगत से विद्यार्थी का उच्चारण भी शुद्ध हो जाता और मेरी आँखों को भी आराम मिल जाता। बेचारी माला को इस बात का पता नहीं चला था कि रात के समय मैं दूर की रोशनी में पढ़-लिख नहीं सकता हूँ और न ही अँधेरे में चल फिर सकता हूँ। एक दिन झिझकते-झिझकते मैंने माला से पूछ ही लिया, ''जो टीचर तुझे वहाँ पढ़ाता था, उसमें क्या नुक्स था ?''&lt;br /&gt;पहले तो वह चुप रही, पर मेरे बार-बार पूछने पर उसने बता ही दिया, ''उसने एक बार मेरी कॉपी पर लिख दिया था - आई लव यू।''&lt;br /&gt;''फिर ?'' मैं इससे आगे जानना चाहता था।&lt;br /&gt;वह चुप रही और कुछ न बोली।&lt;br /&gt;''यदि मैं तेरी कॉपी पर यह कुछ लिखकर दूँ, फिर ?''&lt;br /&gt;''आप की बात कुछ और है।''&lt;br /&gt;''मेरी बात कैसे कुछ और है ?'' मैंने भी हिंदी में प्रश्न किया और प्रश्न करते समय मेरे अन्दर कोई झिझक भी नहीं थी, क्योंकि पहल उसकी तरफ़ से हुई थी।&lt;br /&gt;''मैंने बोल दिया न कि आपकी बात कुछ और है।''&lt;br /&gt;वो दिन सो वो दिन, उसके बाद मैं उसका ही होकर रह गया था। अब मैं पहले से भी अधिक उसे पढ़ाने लगा। हम कई छोटी-छोटी बातें किया करते। जिस चौबारे में मैं ट्यूशनें पढ़ाया करता, उसी में ही सोता था। जितनी देर मैं नौ-सवा नौ बजे तक ट्यूशनें पढ़ाता रहता, माँ नीचे काम में उलझी रहती और मेरी बहन तारा और माला नीचे पढ़ती रहतीं। इसके बाद पहले आधा-पौना घंटा तारा को और फिर माला को पढ़ाता। माँ की चारपाई बीच में होती। माला भी चौबारे में ही लेटा करती थी। माँ की खाट से दूसरी तरफ मेरी खाट होती। माँ की खाट बीच में होने के कारण मैं पढ़ाने के अलावा माला से बहुत कम बात करता। वह भी कोई बात नहीं करती थी। सवेरे पाँच बजे माँ नीचे नहाने-धोने और पूजा-पाठ करने के लिए चली जाती। माला उठकर पढ़ने लगती और मैं भी।&lt;br /&gt;हम दोनों एक-दूजे की ओर पूरी तरह आकर्षित हो गए थे, पर छोटी-छोटी, अच्छी-अच्छी बातों के अलावा हमारे बीच अन्य कुछ भी नहीं घटा था।&lt;br /&gt;''शादी से पहले कभी किसी को छूना नहीं चाहिए, यह पाप होता है।'' माला ने एक दिन पता नहीं यह बात क्यों कह दी।&lt;br /&gt;''मैंने तो आपको कभी कुछ नहीं कहा। आपके दिमाग में ऐसी बात क्यों आई ?'' मैंने नाराज़गी और मिठास के मिलेजुले लहजे में पूछा।&lt;br /&gt;''आप तो महसूस कर गए, मैंने तो यूँ ही बात की है।'' माला किसी दोषी की भाँति स्पष्टीकरण दे रही थी। साथ ही, वह रो पड़ी थी। मैं डर गया था। कोई बात नहीं, कोई चीत नहीं, यूँ ही कोई पंगा न खड़ा हो जाए। यदि माला ने भाभी को बता दिया तो घर में कोई नया तूफ़ान न खड़ा हो जाए, पर माला ने नीचे जाने से पहले अपनी गलती स्वीकार कर ली थी।&lt;br /&gt;मुहब्बत का यह पाक-पवित्र रिश्ता उसके वापस अपने घर जाने तक बना रहा और वह मुहब्बत आज भी कायम है। जाने से एक रात पहले वह फिर रोने लग पड़ी थी। मैंने उसे भरोसा दिलाया था और अंग्रेजी में कहा था -'अगर विवाह करवाया तो बस मैं तेरे से ही करवाऊँगा।' मैं उसे चूमना चाहता था परन्तु उसकी पवित्रता के वचन को निभाने की खातिर मैं स्वयं ही पीछे हट गया।&lt;br /&gt;मार्च का आख़िरी हफ्ता था या अप्रैल का पहला, भाभी माला को मायके छोड़ने गई। माला मुझे जाते हुए कह गई थी कि उसकी बहन अर्थात मेरी भाभी को मैं ही लेने आऊँ, पर मैं खुलकर अपने भाई या माँ को यह भी नहीं कह सका कि भाभी को लेने मैं जाऊँगा। शायद भाभी खोटे पैसे की तरह खुद ही लौट आई थी।&lt;br /&gt;..&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;मेरे लेखकीय नाम में 'स' अक्षर के पीछे के जो शब्द अभी तक पाठकों तक नहीं पहुँचे, उनमें आरंभिक 'स' और अन्तिम 'र' के मध्य में एक अक्षर 'व' है जो 'स' के पैरों में पड़ता है। रेवती उसी लड़की के नाम के बीच का 'व' है। यह लड़की 1960-61 में तपा मंडी की नगर पालिका कन्या पाठशाला में अध्यापिका थी। जब उसने मेरे से ज्ञानी की ट्यूशन के लिए पहुँच की, तब तक उसके द्वारा मेरे बारे में की गई कई विरोधी टिप्पणियाँ मेरे तक पहुँच चुकी थीं। मैं 1959 से ही ज्ञानी कक्षाओं को पढ़ा रहा था। इस लड़की के मेरे पास आने से पहले बठिंडा ज़िले के गाँव नथाणे से उसकी एक रिश्तेदार मेरे पास ज्ञानी पढ़ने आया करती थी और वह ज्ञानी पास कर चुकी थी। मेरे बारे में वह जो भी कह चुकी थी, उस संबंध में मैं उसको अहसास करवाना चाहता था।&lt;br /&gt;''लड़का-सा क्या पढ़ाएगा तुम्हें ?'' कहकर मैंने उसे जतला दिया था कि उसने जो मेरे विरुद्ध पहले टिप्पणी की थी, उसकी मुझे जानकारी है। वह पहले बहुत शर्मिन्दा थी और बार बार हाथ जोड़कर ट्यूशन के लिए कह रही थी। ट्यूशन तो मैंने पढ़ानी ही थी। मैं तो उसकी ऐंठ तोड़ना चाहता था, सो तोड़ दी। तय यह हुआ कि मैं उसके किराये पर लिए चौबारे में एक घंटा पढ़ाने के लिए आऊँ। चौबारे की सीढ़ियाँ अनाज मंडी में होने के कारण वह शाम के वक्त आने-जाने में झिझकती थी। मैंने भी अँधेरा होने से पहले पहले घर पहुँचने के हिसाब से जाना आरंभ कर दिया। यह ट्यूशन मैंने इसलिए की थी क्योंकि उस समय मेरे पास कोई अन्य ट्यूशन नहीं थी।&lt;br /&gt;इधर, ज्ञानी की परीक्षाएँ आरंभ हो गई और उधर मुझे जनता हाई स्कूल, जुआर (उस समय पंजाब के ज़िला होशियारपुर में था और अब हिमाचल प्रदेश के ज़िला ऊना में है) का नियुक्ति पत्र मिल गया। जब मैं हाज़िर होने के बाद दीवाली की छुट्टियों में घर आया तो पता नहीं कैसे उसको मेरे घर आने की ख़बर हो गई। वह दीवाली की मिठाई भी लेकर आई और पेपर अच्छा होने की खुशखबरी सुनाने भी। मेरा नया पता भी ले गई।&lt;br /&gt;अभी जुआर पहुँचे मुझे एक सप्ताह ही हुआ था कि रेवती की चिट्ठी मिली। बड़ा आदर और मोह-प्यार था उस चिट्ठी में। किसी लड़की द्वारा मुझे लिखी गई यह पहली चिट्ठी थी, पर पोस्ट कार्ड होने के कारण शक की कोई गुंजाइश नहीं थी। यह एक आदरसूचक ख़त था, कोई प्रेमपत्र नहीं था। मैंने ख़त का जवाब दिया। मैंने भी पोस्ट कार्ड ही लिखा था और ख़त में उसके उजले भविष्य की कामना की थी। हाँ, अन्दर ही अन्दर मैं उसकी ओर कुछ-कुछ आकर्षित हुआ था। उसकी मंशा तो पता नहीं क्या थी, पर मेरा झुकाव उसकी ओर हो गया था।&lt;br /&gt;मैं किसी भ्रम का शिकार भी नहीं हो सकता था। कम से कम मैं शब्दों के भीतरी अर्थों की गहराई तक किसी हद तक पहुँचने योग्य तो हो ही गया था।&lt;br /&gt;रेवती का एक और ख़त आया। मैंने ख़त का जवाब दे दिया। इस प्रकार चिट्ठी-पत्र का सिलसिला चलता रहा। जब माँ मेरे पास जुआर आ गई, मैं रेवती के ख़त माँ को पढ़कर सुनाता। एक ख़त सुनकर माँ कहने लगी-&lt;br /&gt;''तू इस लड़की से विवाह ही करवा ले।'' माँ की बात में जो फराख़दिली थी, वो उस ज़माने की बूढ़ी औरतों में मैंने कम ही देखी है। लड़की, माँ की देखी हुई थी। रंग काला तो नहीं था, ज़रा सांवला था। ऑंखें मोटी थीं और बाकी नक्श मध्यम। वैसे उसके चेहरे पर रौब-दाब बहुत था। मैं तो पहले ही उसकी तरफ़ आकर्षित था, क्योंकि उस समय तक माला की मंगनी हो चुकी थी और उसे तुड़वाने की कई स्कीमें घड़ने के बावजूद मैंने कुछ नहीं किया। बस, दिल वाली बातें दिल में ही रह गई थीं। माँ के कहने पर बात पक्की होने में मदद मिलनी ही थी। लेकिन भाई की मोहर लगे बग़ैर तो कुछ भी नहीं हो सकता था। यहाँ मैं बता दूँ कि 10 दिसम्बर 1961 को राज माला का विवाह हो चुका था। उसका घरवाला आर.बी.आई., दिल्ली में क्लर्क था। मैं इस 10 दिसम्बर वाले दिन भूख-हड़ताल पर रहा, कुछ भी नहीं खाया-पिया। लगता था, जैसे मेरी दुनिया ही उजड़ गई हो। राज माला को मैं बेवफ़ा भी नहीं कह सकता था, क्योंकि मुझे मेरे भाई की लिखी कांता बहन के विवाह पर पढ़ी गई 'शिक्षा' की अन्तिम पंक्ति अच्छी तरह याद थी :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोयल गउँओं और धीयाँ दा माण काहदा&lt;br /&gt;जिधर तोरनां, उधर ही जावणा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर कभी-कभी मन में ऐसा ही आता कि राज माला एक बार तो अपनी इच्छा जाहिर करती। आख़िर मैंने उससे वायदा किया था। यदि मैं वायदा तोड़ देता तो उसके मन पर क्या गुजरती। बस, यह घटना थी जिस कारण रेवती के ख़तों ने मुझे उसकी ओर आकर्षित कर दिया। बाद में, वह तपा मंडी छोड़कर अपने गाँव चली गई। चिट्ठी-पत्र का सिलसिला खत्म हो गया।&lt;br /&gt;मेरा विवाह राज माला के विवाह से पूरे पाँच साल बाद हुआ था और रेवती के विवाह के चार साल बाद। राज माला के पति की मधुमेह रोग के कारण आँखों की नज़र चली गई। मेरी नज़र पहले ही जा चुकी थी।&lt;br /&gt;सुखजीत, रेवती और राज- ये तीन लड़कियाँ मेरी ज़िन्दगी में आईं और अभी भी मेरी स्मृतियों में जिन्दा हैं। तीनों का ठौर-ठिकाना मुझे मालूम है। पर मैंने कभी भी उनसे मिलने का यत्न नहीं किया। बस जो किया है, वह यह है कि उनके नाम का कोई न कोई अक्षर अथवा शब्दांग अपने संग जोड़कर मैं 'स्वराज' बन गया। मेरा यह नाम मेरे अलावा या तो कवि गुरदर्शन(स्वर्गीय) को पता था या मरे भान्जे सुदर्शन को। 1982 में जब 'एस'(स) के बारे में स्पष्टीकरण मैंने ट्रिब्यून के पत्रकार पटियाला वाले शेर सिंह गुप्ता को दिया तो भी मैं झूठ ही बोला था। उसने मेरे बताये अनुसार ट्रिब्यून में मेरा जो फ़ीचर लिखा, उसमें 'स्वराज' शब्द का अर्थ 'आज़ादी' से जोड़ा और बताया कि यह नाम 'एस. तरसेम' के 1942 में हुए जन्म के कारण रखा गया है। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ था। यह आंदोलन स्वराज या आज़ादी से संबंधित था।&lt;br /&gt;मेरी पत्नी का नाम सुदर्शना था। इसलिए मेरे कुछ लेखक मित्रों ने यह समझ लिया कि मैंने अपनी पत्नी के नाम वाला पहला अक्षर अपने नाम से जोड़ लिया है। मेरी पत्नी को भी कभी तो यह बात ठीक लगती और कभी वह सोचती कि इस 'स' या 'एस' के पीछे कोई रहस्य है। उसे भी शक था कि 'स' अक्षर किसी लड़की के नाम का पहला अक्षर है। पर मैंने अपने मुँह से कभी यह रहस्य नहीं खोला था। इसलिए यह पर्दा गृहस्थी की गाड़ी चलाने के लिए सहायक ही रहा। अब सवाल पैदा होता है कि स. तरसेम से एस. तरसेम कैसे बना। इसके साथ भी एक छोटी-सी घटना जुड़ी हुई है।&lt;br /&gt;मैंने अपनी एक कहानी 'अकाली पत्रिका' को भेजी। अख़बार ने कहानी छाप तो दी पर स. तरसेम के स्थान पर मेरा नाम एस. तरसेम छाप दिया। मैंने अकाली पत्रिका के संपादक ज्ञानी शादी सिंह को पत्र लिखा। उसने उत्तर में लिखा कि 'स' से आम तौर पर अर्थ 'सरदार' लिया जाता है और किसी गुरसिक्ख के नाम से पहले 'स' सम्मान-सूचक शब्द का पहला गुरमुखी अक्षर है। भला कोई लेखक अपने नाम के आगे यह भूल कैसे कर सकता है। उन्होंने लिखा कि मैं अपने नाम के साथ 'एस' लिखा करूँ। सो, मैं स. तरसेम से एस. तरसेम बन गया।&lt;br /&gt;अब जब मैं केन्द्रीय पंजाबी सभा के झंडे तले पंजाबी माँ-बोली को योग्य स्थान दिलाने के लिए चल रहे संघर्ष के दौरान, शिक्षा संस्थाओं और दफ्तरों द्वारा अंग्रेजी के किए जाने वाले अनावश्यक प्रयोग का विरोध करता हूँ तो कई अड़ियल ज्ञानी मेरे संग इस बात पर ही बहस पड़ते हैं कि मैंने स्वयं अपने नाम के साथ अंग्रेजी का अक्षर 'एस' लगा रखा है। कुछ तो मेरे द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण से संतुष्ट हो जाते हैं पर कुछ मेरे स्पष्टीकरण को एक नाटक भी कह देते हैं। कुछ मित्र अभी चिट्ठी-पत्री के समय मेरा नाम स. तरसेम ही लिखते हैं। मुझे इसपर भी कोई एतराज़ नहीं। पर मैं कभी कभी सोचता हूँ कि क्यों न सिर्फ़ तरसेम ही लिखा करूँ। पर अब सुखजीत, रेवती और राज के चेहरे मेरे सामने आ खड़े होते हैं। मैंने उनके नामों के साथ ज़िन्दगी के इतने वर्ष गुजारे हैं। मेरी पत्नी का नाम भी संयोग से 'स' से शुरू होता है। उसकी याद भी इस नाम के साथ जुड़ी है। अब मैं एस. तरसेम नाम से दूर दूर तक जाना जाता हूँ। अब यह नाम ही ठीक है। जिन्हें इस नाम में कुछ गलत लगता है, वे मुझे माफ़ करें। मनुष्य भूलनहार है।&lt;br /&gt;-------------&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;1-गुरमुखी वर्णमाला का चौथा अक्षर 'स' जिसे 'ससा' कहा जाता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-3211617122744434227?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/3211617122744434227/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=3211617122744434227&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/3211617122744434227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/3211617122744434227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/11/blog-post_27.html' title='आत्मकथा'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/--FQ4LMlChx0/TtI4uJ_jLxI/AAAAAAAAAPY/XFQ571qvx5A/s72-c/n20.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-2922301360883401838</id><published>2011-11-13T20:25:00.002+05:30</published><updated>2011-11-15T20:35:01.787+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साउथाल(उपन्यास)- हरजीत अटवाल'/><title type='text'>पंजाबी उपन्यास</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-MCbxFOnW3s4/TsJ95UQuLsI/AAAAAAAAAO0/UVWoLQKsUUI/s1600/thumbnailCAOL03YD.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5675236904085106370" style="WIDTH: 160px; CURSOR: hand; HEIGHT: 117px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-MCbxFOnW3s4/TsJ95UQuLsI/AAAAAAAAAO0/UVWoLQKsUUI/s320/thumbnailCAOL03YD.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-CbhwiiqDan0/TsJ-CWDFtjI/AAAAAAAAAPA/cjuv2J2qdo8/s1600/Southall.JPG"&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ffff99;"&gt;''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व&lt;/span&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-0uGYRe7rC6E/TsJ-LFJwZMI/AAAAAAAAAPM/Onm6NY86rpc/s1600/Southall.JPG"&gt;&lt;span style="color:#ffff99;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5675237209267004610" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 115px; CURSOR: hand; HEIGHT: 181px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-0uGYRe7rC6E/TsJ-LFJwZMI/AAAAAAAAAPM/Onm6NY86rpc/s320/Southall.JPG" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#ffff99;"&gt; उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़ कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;साउथाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ffcc66;"&gt;हरजीत अटवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;।। अट्ठाईस ॥&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;प्रदुमण सिंह कई बार सोचने लगता है कि ज्ञान कौर ठीक कह रही है कि राजविंदर का ब्याह कर दिया जाए। यह तो ठीक है कि जिस लड़की को भी वह ब्याह कर लाएगा, उसकी ज़िन्दगी खराब ही होगी, पर ऐसा करने से उसके लड़के की ज़िन्दगी तो बच सकती है। इस लड़के के साथ-साथ छोटों पर भी गलत असर पड़ने से बचेगा, लड़कियों की उसको ख़ास चिंता है। इस मुल्क में जिस तरह बच्चे बिगड़ जाते हैं, उससे तो वह सदैव ही चिंतातुर रहता है। इसीलिए इंडिया में सैटिल हुआ था कि और नहीं तो, बच्चों को तो मनपसंद जगह पर ब्याहेगा, पर हालात ने उसको फिर उस जगह पर ला खड़ा किया है जिससे वह डरता है। अभी तक तो उसके बच्चे ठीक हैं। बस, यह राजविंदर ही बिगड़ा हुआ है। वह पत्नी से कहता है-&lt;br /&gt;''जा, कर ले बेटे का ब्याह, ढूँढ़ ले लड़की। पर जल्दबाजी न करना, ख़ानदानी लड़की चाहिए, भूखे घर की नहीं।''&lt;br /&gt;''ख़ानदानी लड़की तो इंडिया से ही मिलेगी।''&lt;br /&gt;''इंडिया हो आ फिर।''&lt;br /&gt;''क्रिसमस पर देखते हैं। तुम भी साथ चलना।''&lt;br /&gt;''मुझे नहीं जाना दुबारा वहाँ।''&lt;br /&gt;''अब तो सब ठीक है। पंजाब में आतंकवाद तो अब खत्म हो चुका है।''&lt;br /&gt;''खत्म हो चुका होगा, पर मेरे जख्म तो अभी दर्द करते हैं।''&lt;br /&gt;कहने को तो वह कह जाता है पर नीरू से मिलने को उसका दिल करता है। अब तो काफी दिन हो गए हैं, नीरू को फोन किए भी। कारा ठीक कहता है कि इतनी देर कोई औरत तो मेरे इंतज़ार में बैठी नहीं रह सकती। जैसे भी हो, जब वह इंडिया गया तो कुछ दिन तो जश्न जैसे गुजरेंगे ही। पर जाएगा कब। पता नहीं, जाएगा भी कि नहीं, या फिर यूँ ही सोचता ही रहेगा।&lt;br /&gt;आजकल कारा उसको कम ही मिलता है। कारे का सप्ताहांत तो निठल्लों जैसा ही होता है। खास तौर पर रविवार। लेकिन प्रदुमण सिंह किसी दिन भी खाली नहीं होता। कोई न कोई काम सिर पर खड़ा होता है। उस दिन वह प्रताप खैहरे के रेस्ट्रोरेंट पर ही मिलता है। कितने दिनों बाद। प्रताप खैहरे का ब्राडवे पर बहुत पुराना रेस्ट्रोरेंट है। बहुत प्रसिद्ध है। साउथाल के सबसे पुराने रेस्ट्रोरेंटों में से है। उसके सामने ही चौधरी मुश्ताक अली का ‘चौधरी तंदूरी’ है। यह भी काफ़ी पुराना है। एक समय था कि साउथाल के ये दोनों ही जाने-माने रेस्ट्रोरेंट होते थे। अब तो पूरा साउथाल ही रेस्ट्रोरेंटों से भरा पड़ा है। अब इनकी पहले जैसी बात नहीं रही है। 'गुड मार्निंग' रेडियों पर अनाउंसर नित्य नये-नये रेस्ट्रोरेंटों की ऊँची आवाज़ में मशहूरी करने लग पड़े हैं। फिर भी, खैहरा और चौधरी चूँकि साउथाल के पुराने व्यक्ति इसलिए लोग इन्हें जानते हैं और इन दोनों में टक्कर अभी भी पहले जैसी ही चल रही है। जैसा कि आमने-सामने वाले रेस्ट्रोंरेटों में हो ही जाया करती है। जब दोनों रेस्ट्रोरेंट भरे रहते थे, तब यह तनाव कम था। अब काम कम हो चुके हैं। नये रेस्ट्रोरेंटों ने ग्राहक खींच लिए हैं। अपने कम हुए काम का दोष ये एक-दूसरे को देने लगते हैं। अब तो तनाव इतना बढ़ चुका है कि तलवारें किसी भी समय निकल सकती हैं। प्रताप खैहरा सिक्खों के लड़कों को हवा दे कर रखता है और चौधरी मुसलमानों के लड़कों को इस्तेमाल करता है। इसलिए मुसलमानों और सिक्खों के लड़कों मे तनाव रहता है। दोनों ने अपने अपने रेस्ट्रोरेंट की बेसमेंट में स्नूकर क्लब बनाये हैं जो कि इन लड़कों के इकट्ठा होने का कारण बनते हैं।&lt;br /&gt;प्रताप खैहरा सिक्ख और हिंदू कम्युनिटी के प्रतिष्ठित लोगों को अपने रेस्ट्रोरेंट में बुलाता है। बहाना तो है रेस्ट्रोरेंट की पच्चीसवीं वर्षगांठ मनाने का। साउथाल के प्रतिष्ठित लोगों में कारा भी आता है और अब प्रदुमण भी। कई दिनों बाद मिलने के कारण वे दोनों आपस में ही बातें किए जा रहे हैं। प्रताप खैहरा के निमंत्रण की उन्हें ज्यादा फिक्र नहीं है। कारा उससे कहता है -&lt;br /&gt;''यह खैहरा भी सियासी बंदा है। यूँ तो यह चाय भी नहीं पिलाता। यह पार्टी यूँ ही नहीं कर रहा।''&lt;br /&gt;''इसका अब चौधरी के साथ पंगा भी तो पड़ा हुआ है। शायद अपने साथ जुड़े लोगों का दिखावा करना चाहता हो उसके आगे।'' प्रदुमण कहता है। उसको कुछ स्मरण हो आता है तो वह फिर कहने लगता है, ''मुझे तो एक दिन चौधरी का फोन आया था। समोसों के बारे में पूछ रहा था। मैंने कहा था कि कभी आ जा, बैठकर बात करेंगे।''&lt;br /&gt;''मेरा तो खुद का क्लाइंट है चौधरी। उसकी सारी कारों-वैनों की इंश्योरेंस मैं कर रहा हूँ। कभी रोटी खाने भी आ जाएँ तो पैसे नहीं लेता।''&lt;br /&gt;''चलो, अब आए हैं तो देख लेते हैं कि खैहरा टोपी में से कैसा कबूतर निकालता है।''&lt;br /&gt;बातें करते हुए वे दोनों कुर्सियों पर बैठ जाते हैं। कुछ अंग्रेज लड़कियाँ शराब, जूस और कोक आदि सर्व कर रही हैं। कारा आदत के कारण ज्यादा नहीं पीता, पर प्रदुमण सिंह एक पैग ज्यादा पी जाता है। यह रेस्ट्रोरेंट का बेसमेंट है। जहाँ पर वे सभी बैठे हैं, वह स्नूकर क्लब है। नौजवान लड़के यहाँ स्नूकर खेलने आते हैं। आज कुर्सियाँ और मेज़ लगाकर एक तरफ मंच भी बना रखा है। कुछ देर बाद जसपाल सिंह दाढ़ी पर हाथ फेरता मंच पर चढ़ता है और कहने लगता है-&lt;br /&gt;''दोस्तो, आज हम खैहरा तंदूरी की सिलवर जुबली पर एकत्र हुए हैं। इन्हें हम सबकी ओर से बधाइयाँ तो हैं ही कि इतने वर्षों से इतनी कामयाबी से यह कारोबार चला रहे हैं। साथ ही साथ, हम इनके विचार भी सुनेंगे। सबसे पहले मैं सरदार सुंदर सिंह और सरदार मीहां सिंह से विनती करता हूँ कि वे मंच पर आकर सुशोभित हों। ये दोनों हमारे बुजुर्ग़ साउथाल के सबसे पुराने पंजाबी हैं। यूँ कह लो कि साउथाल इन्होंने ही बसाया है।''&lt;br /&gt;दो बुजुर्ग़ उठकर मंच की तरफ जाते हैं और उसके बाद प्रताप खैहरा भी ऊपर मंच पर जा बैठता है। फिर जसपाल सिंह, केवल सिंह भंवरा को अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित करता है। केवल सिंह भंवरा की पगड़ी जो कीन्या से आए सरदारों जैसी है, से उसकी पृष्ठभूमि का पता चल जाता है। बात करने के अंदाज से अनुभवी व्यक्ति प्रतीत होता है। वह प्रताप खैहरा की तारीफ़ों के पुल बांध रहा है। साउथाल की सांस्कृतिक ज़िन्दगी में खैहरा तंदूरी के महत्व का उल्लेख करता है और फिर कहने शरू करता है-&lt;br /&gt;''दोस्तो, कुछ बातें और भी हैं आपके साथ करने वालीं। शायद, आपने खबरों में पढ़ा-सुना होगा कि मुस्लिम धर्म के कुछ लोग सिक्ख धर्म को नीचा दिखाने पर तुले हुए हैं। मैं सारे मुसलमानों को दोष नहीं दे रहा। कुछेक लोग जो कि ईर्ष्या के शिकार होकर ऐसा कर रहे हैं और यंगस्टर को उकसा रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि जैसे पूरा पाकिस्तान इंडिया के लिए फैसिनेटिड है, उसी तरह पंजाब मुसलमान सिक्खों के प्रति फैसिनेटिड हैं। नहीं तो साउथाल में मुसलमान थे ही कितने! ब्राडवे की सारी दुकानें पंजाबियों की थीं, मतलब कि हमारी। अब वे दिनोंदिन यहाँ घुसपैठ कर रहे हैं। आधी दुकानें अब इनकी हो चली हैं। हलाल मीट की दुकानें झटके वाली दुकानों से ज्यादा हो गई हैं। ये ऐसी बातें घटित हो रही हैं बिकॉज वी आर नाट केअरफुल टुवर्ड अवर रिलीज़न एंड कम्युनिटी। पर अब बड़ा खतरा अपने सामने है। ये एकतरफ़ लीफ़लैट पड़े हैं जो मुस्लिम लड़कों के बीच बांटे जा रहे हैं। इनमें बताया गया है कि सिक्ख धर्म बुरा है। सिक्खों को सबक सिखाने का तरीका एक ही है कि उनकी लड़कियों को फंसाओ और मुसलमान बनाओ। इस काम के लिए लड़कों को मुस्लिम कम्युनिटी के लीडरों की सरपरस्ती हासिल है। हमें इसका मुकाबला करना चाहिए। कम से कम अपना बचाव तो करना ही चाहिए। पहली बात तो लड़कियों को यह शिक्षा दें कि मुसलमान कितने बुरे हैं, इनके इरादे क्या हैं। हमारी लड़कियों से दोस्ती का मतलब उनकी ज़िन्दगी खराब करना है। कितनी ही लड़कियों को ये लोग फुसला कर पाकिस्तान ले गए हैं और वहाँ कोठों पर बिठा आए हैं। इसके साथ-साथ, अपने लड़कों को भी शिक्षा देने की ज़रूरत है कि अपनी सिक्ख लड़कियों की रखवाली करो। हर सिक्ख लड़के के जिम्मे यह फर्ज़ लगाओ, उसकी जिम्मेवारी लगाओ कि वे हर सिक्ख लड़की के दोस्त बनकर, भाई बनकर उनकी हिफाजत करें और हम बड़ों का काम है कि मुसलमानों की तरह ही इन अपने लड़कों को सरपरस्ती दें ताकि हमें सरदार साधू सिंह न बनना पड़े।''&lt;br /&gt;केवल सिंह भंवरा का भाषण अभी चल ही रहा है कि साधू सिंह का नाम सुनते ही कुछ लोग जोश में आ जाते हैं। एक आदमी उठकर बांहें ऊपर उठा आवाज़ लगाता है - ''सरदार साधू सिंह!'' कुछ आवाज़ें उठती हैं - ''ज़िन्दाबाद !'' शोर-सा मच जाता है। केवल सिंह भंवरा माहौल देखकर स्टेज पर से उतर आता है। जसपाल सिंह फिर माइक संभालते हुए कहने लगता है-&lt;br /&gt;''भाइयो ! भंवरा साहब की बातें सोलह आने सच हैं। हमें मिलजुलकर बैठने की ज़रूरत है। यह साधू सिंह वाली दुर्भाग्यपूर्ण घटना दुबारा न घटे, इसे रोकना है हम सबको। हाँ जी... अगर किसी अन्य भाई को बोलना हो।''&lt;br /&gt;वह सामने बैठे लोगों में से वक्ता को खोजने की कोशिश करता है। कोई नहीं उठ रहा। वह फिर कहता है -&lt;br /&gt;''इस काम के लिए प्रताप खैहरा ही आगे आए हैं, हम सबको इनके हाथ मज़बूत करने चाहिएँ।''&lt;br /&gt;उसकी बात के बीच ही एक हाथ खड़ा होता है। जसपाल सिंह इशारे से ही उस हाथ वाले व्यक्ति को उठकर स्टेज पर आने के लिए कहता है। यह सुरमुख संधू है। वकील संधू। वह अपना ड्रिंक खत्म करके गिलास एक तरफ रखते हुए कहता है-&lt;br /&gt;''भाइयो, अगर इजाज़त दो तो दो बातें कहूँ, पर हैं कड़वीं।''&lt;br /&gt;''घूंट लगाकर तो बंदे को मीठी बातें करनी चाहिएँ।''&lt;br /&gt;कोई कहता है तो सभी हँसने लगते हैं। संधू फिर कहता है-&lt;br /&gt;''यह भी ठीक है, पर जैसा कि कहा करते हैं कि मित्रों की लूण की डली मिश्री बराबर जानो, पहली बात तो यह कि साउथाल सिक्खों ने अपने नाम नहीं लिखवा रखा, कोई भी यहाँ आकर रह सकता है। दूसरा यह जो मुसलमान और सिक्ख लड़के टोलियाँ बना कर आपस में लड़ रहे हैं, इसका कारण धर्म नहीं, लड़कियाँ हैं। यह ठीक है कि मुसलमान लड़के कड़े पहनकर खुद को सिक्ख ज़ाहिर करके सिक्ख लड़कियों के साथ दोस्ती गांठने के चक्कर में होंगे, हो सकता है, पर दोस्ती जैसे रिश्ते को कोई मजबूरी नहीं होती। यह जो बात आप सिक्ख लड़कियों को पाकिस्तान ले जाकर कोठों पर बिठाने वाली करते हो, ज़रा बताओ तो ऐसे कितने केस हुए हैं? मैं कई लड़कियों को जानता हूँ जिन्होंने मुसलमान से शादी की, पाकिस्तान जाकर भी आई हैं और खुश हैं। मेरा ख़याल है कि हम बात को बढ़ा-चढ़ाकर कर रहे हैं। यह बात भी याद रखने लायक है कि जो पेड़ हम लगा रहे हैं, इससे यहाँ सिक्ख-मुस्लिम फसाद भी हो सकते हैं। मैं तो यह कहता हूँ कि बात को और ज्यादा सोच समझकर उसे बढ़िया ढंग से हैंडल किया जाए। हाँ, यदि हमारे मित्र प्रताप खैहरा की कोई प्रॉब्लम है तो हैल्प कर दो। हम जानते हैं कि इनका बिजनेस राइवलरी है। हम ऐसा कोई काम न करें कि कल को हमें पछताना पड़े। शुगल की बात यह है कि प्रताप खैहरा की शराब पीकर और चिकन खाकर इससे ज्यादा मैं कह ही नहीं सकता।''&lt;br /&gt;सभी हँसने लगते हैं। संधू बैठ जाता है। कारा प्रदुमण के कान में कहता है-&lt;br /&gt;''शराबी वकील तो छा गया। इसकी बात में सच्चाई है। खैहरा ने तो स्नूकर क्लब के बहाने ऐसे लड़कों का गैंग बना रखा है। उधर चौधरी भी मुसलमान लड़कों को हवा देकर रखता है, पैसे भी देता है उनको।''&lt;br /&gt;''मैं तो सुनता हूँ कि दोनों के ही दूसरे धंधे भी हैं।''&lt;br /&gt;कहते हुए प्रदुमण घड़ी देखता है। फिर कहता है-&lt;br /&gt;''कारे, मुझे जल्दी जाना है। सुबह जल्दी उठना होता है और जाते हुए शायद चौधरी समोसों का आर्डर ही दे दे।''&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-2922301360883401838?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/2922301360883401838/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=2922301360883401838&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/2922301360883401838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/2922301360883401838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='पंजाबी उपन्यास'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' 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तुलसी कहकर बुलाया करता था। पर नानी द्वारा मेरे जन्म वाले दिन ही रखा नाम तरसेम मेरा पक्का नाम बन गया। 'नामों के झुरमुट' शीर्षक अधीन मैंने अपनी बचपन संबंधी आत्मकथा 'कच्ची मिट्टी, पक्का रंग' में अपने नामों के रखे जाने और उनके प्रचलित होने के बारे में विस्तार से उल्लेख किया है। इसलिए मैं उसको दोहराना नहीं चाहता। दोहराने का मुझे हक भी नहीं है।&lt;br /&gt;मैं सातवीं कक्षा में था जब मेरी कविताएँ अख़बारों में छपनी शुरू हो गई थीं। मैं 'तरसेम लाल तुलसी' नाम से कविताएँ अख़बारों को भेजता। ताया मथरा दास द्वारा रखा गया नाम 'तुलसी' समझो मेरा तख़ल्लुस बन गया था। तपा मंडी में सब मुझे 'तुलसी' कहकर ही बुलाया करते थे। कोई मुझे हमारे गोत्र के कारण 'गोयल' भी कहता और मजाक में कोई 'गोलमोल' भी कह देता, पर शारीरिक तौर पर मैं बिलकुल पतला-लम्बा सींख की तरह था। मेरे भाई को तो कोई हरबंस लाल कहकर बुलाता ही नहीं था। सब उसे 'गोयल साहब' कहते। इसलिए 'तरसेम गोयल' या 'तरसेम तुलसी' मेरे दो नाम मैट्रिक पास करने से पहले चलते रहे। नवम्बर 1958 में मैंने ज्ञानी पास कर ली थी, इसलिए अख़बारों में मैं अपना नाम ज्ञानी तरसेम लाल तुलसी लिखकर भेजने लगा, जिस वजह से हमारे इलाके के कुछ लोग मुझे ज्ञानी जी भी कहने लग पड़े। तपा मंडी के आर्य स्कूल में पंजाबी अध्यापक लगने के कारण और कुछ ज्ञानी की ट्यूशनें पढ़ाने के कारण मुझे 'ज्ञानी जी' या 'तुलसी जी' कहकर ही बुलाया जाने लगा। ऐसे सम्बोधनों से मैं कभी खुश भी होता और कभी उदास भी। ज्ञानी शब्द तो मैं बिलकुल ही अपने नाम से मिटा देना चाहता था, पर क्या करूँ। अभी भी यदि मेरे भाई का मित्र मास्टर चरनदास मिल जाए, तो वह मुझे 'ज्ञानी जी' कहकर ही बुलाता है। वैसे मैंने अपने नाम के आगे और पीछे से 'ज्ञानी' और 'तुलसी' उस वक्त हटा दिए थे जब मैं पहली बार करतार सिंह बलगण की पत्रिका में छपा था - सिर्फ़ तरसेम के नाम से। बस, उस समय से मैं 'तरसेम' नाम के अधीन ही अख़बारों और पत्रिकाओं में छपता रहा। उस समय मैं कविता भी लिखा करता था और कहानी भी।&lt;br /&gt;अचानक, तरसेम सिंह के नाम से छपने वाला एक कहानीकार भी अपनी कहानियों के साथ सिर्फ़ 'तरसेम' लिखने लग पड़ा। न तो मुझे उसका ठौर-ठिकाना पता था और न ही उस वक्त मुझे यह समझ थी कि उसका कहीं से पता-ठिकाना लेकर उसे पत्र लिखूँ कि वह अपना नाम बदल ले, क्योंकि 'तरसेम' नाम के अधीन मेरी रचनाएँ उससे पहले छपी थीं।&lt;br /&gt;मैंने न तो किसी से सलाह ली और न ही किसी को बताया। हाँ, कुछ महीने सोचता अवश्य रहा। आख़िर मैंने अपना लेखकीय नाम 'स. तरसेम' रख लिया। तरसेम नाम से कहानियाँ लिखने वाला लेखक भी पता नहीं कहाँ गुम हो गया। मेरे द्वारा 'स. तरसेम' नाम रखने के तुरन्त बाद पता चला कि वह विदेश चला गया है। यह भी ख़बर मिली कि वह आजकल एक मैगज़ीन निकालता है - 'नीलगिरी'। इसलिए उसका नाम भी 'तरसेम नीलगिरी' पड़ गया। लेकिन मैं तो अब स. तरसेम बन चुका था। इस 'स' के बारे में मेरे लेखक दोस्त प्राय: पूछते रहते, पर मैं हँसकर टाल देता। यदि कोई पीछ ही पड़ जाता तो मैं कहता 'स' सीक्रेट है अर्थात गुप्त।&lt;br /&gt;मेरे अन्दर उन दिनों इतना साहस नहीं था कि 'स' की सारी कहानी खोल देता। यह कहानी तो मैंने तब भी नहीं खोली, जब 1990 में मेरी बचपन की आत्मकथा 'कच्ची मिट्टी, पक्का रंग' में मेरे नाम को लेकर एक पूरा अध्याय छपा था। तब भी मैंने यह लिख दिया था, ''स. तरसेम मैं बहुत सोच-समझ कर लिखने लगा था। इसके पीछे तीन कहानियाँ हैं। तीन लड़कियाँ हैं। लड़कियों से हुई मुहब्बतें हैं। पहली मुहब्बत बचपन की मुहब्बत है। इसलिए अब भी मैं यह गीत अक्सर गुनगुनाता रहता हँ :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन की मुहब्बत को&lt;br /&gt;दिल से न जुदा करना&lt;br /&gt;जब याद मेरी आए&lt;br /&gt;मिलने की दुआ करना...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुहब्बत की शुरूआत मेरे से हुई थी। भला 12-13 साल के लड़के को भी मुहब्बत करने का पता होता है, इस बात की समझ मुझे अभी तक नहीं आई। पर मैं उसको प्यार करता था। अब भी प्यार करता हूँ। अब वह मेरी तरह सेवा-मुक्त ज़िन्दगी बिता रही है। उसके कोई औलाद नहीं। सुना है कि उसने एक बेटी गोद ले रखी है। बहुत सुन्दर थी वह लड़की, मूरत जैसी, मानो ईश्वर ने फुर्सत में बैठ कर घड़ी हो। मेरी बड़ी बहन शीला ने जब उसे एक दिन देखा था, तो कहा था -&lt;br /&gt;''भाई, यह लड़की तो मोरनी जैसी है, जिस घर में जाएगी, घर को सजाकर रख देगी।'' बहन को क्या मालूम था कि मैं उस लड़की को प्यार करता था। बहन को अब भी नहीं पता, किसी को भी नहीं पता। बस, मेरे मित्र कवि गुरदर्शन (स्वर्गीय) को ही मालूम था। अन्य किसी के सम्मुख इस मुहब्बत की मैंने भाप तक नहीं निकाली थी। उस लड़की को गली में 'पीचो-बकरी' खेलने से लेकर मेरे सामने पढ़ती हुई को मैंने सैकड़ों बार निहारा था। वह एक प्राइमरी अध्यापिका की बेटी थी। जब वह प्राइवेट दसवीं करने लगी तो ट्यूशन पढ़ने के लिए मेरे भाई के पास आने लगी। शाम पाँच बजे के बाद वह पढ़ने आया करती। मैं उस समय ज्ञानी कर रहा था। ज्ञानी गुरबचन सिंह तांघी के मालवा ज्ञानी कालेज, रामपुरा फूल में करीब ढाई महीने मैं पढ़ा था। दोपहर 12 बजे की ट्रेन से जाता और शाम पाँच बजे वाली से लौट आता। यदि गाड़ी छूट जाती तो मैं पैदल चल पड़ता। बहुत तेज़ चला करता था उन दिनों। उस लड़की के पढ़कर जाने से पहले पहले मैं घर पहुँच जाया करता था। उन दिनों तो मेरे अन्दर मुहब्बत का सोता निरन्तर फूट रहा था। सिर्फ़ उसके दर्शन-दीदार के लिए मैं तेज़-तेज़ चलकर रामपुरा फूल से घर पहुँचा करता। सीधा कोठे पर चढ़ जाता, जहाँ भाई दो लड़कियों को पढ़ा रहा होता। उनमें ही थी वह हसीन लड़की जो 'स' की बुनियाद थी। उस लड़की ने मार्च 1959 में दसवीं पास की। मैं उन दिनों तपा मंडी के आर्य हाई स्कूल में पंजाबी का अध्यापक लग चुका था। उस लड़की का नाना हमारे घर आया और मेरे भाई से कहने लगा कि अगर तरसेम हमारी लड़की को ज्ञानी करवा दे। मैं समीप बैठा था। अन्दर से मैं बहुत खुश था। ज्ञानी में पंजाब यूनिवर्सिटी में मैं तीसरे स्थान पर रहा था। तांघी साहब ने अपने मालवा कालेज को और अधिक चमकाने के लिए जो इश्तहार छापा, उसका आरंभ कुछ इस प्रकार था :&lt;br /&gt;'केवल ढाई महीने पढ़कर ज्ञानी का विद्यार्थी तरसेम लाल गोयल पंजाब यूनिवर्सिटी की नवम्बर 1958 की परीक्षा में 367 नंबर लेकर तीसरे स्थान पर रहा और प्रथम आने वाले विद्यार्थी से केवल 10 नंबर कम।' यही कारण था कि मेरी प्रसिद्धि दूर तक फैल गई थी।&lt;br /&gt;कुछ 'न-न' करने के बाद आख़िर मैं सहमत हो गया। यह 'न-न' तो यूँ ही एक ड्रामा था। मैं तो अपने पल्ले से चार पैसे खर्च करके भी उसके घर जाने को तैयार था। मैंने अगले दिन से ही बाकायदा उनके घर जाकर उस लड़की को पढ़ाना शुरू कर दिया। एक घंटा पढ़ाने की बात हुई थी और ट्यूशन लेनी थी बीस रुपये महीना। घंटा क्या, कभी डेढ़ घंटा भी लग जाता। दो घंटे भी लग जाते। समय के बीतने का पता ही न चलता। लेकिन एक दिन उसकी माँ ने कहा कि मैं चौबारे की बजाय उसे ड्यौढ़ी में ही पढ़ाया करूँ। मुझे यह मेरा अपमान-सा महसूस हुआ। लगा जैसे उसकी माँ मेरी नीयत पर शक कर रही हो। मुझे यह भी लगा कि शायद उस लड़की ने ही कोई ऐसी बात कह दी हो जिसके कारण उसकी माँ को ऐसा कहना पड़ा हो। मैं अगले दिन पढ़ाने नहीं गया, दूसरे दिन भी नहीं और तीसरे दिन भी नहीं। लड़की का नाना छड़ी खटखटाता मेरे घर आ पहुँचा। मैंने उसे भीतरी बात नहीं बताई थी। बस, कह दिया था कि मेरे पास वक्त नहीं है। पहली कक्षा में वह मेरा अध्यापक रहा था। उसने मुझे बहुत अपनेपन से कहा, ''भई तरसेम, बीच मंझदार में न डुबा लड़की को।''&lt;br /&gt;कुछ तो उसके अध्यापक होने के कारण, कुछ नेत्रहीन होने के कारण और कुछ मेरे अपने दिल का उस लड़की के प्रति आकर्षण होने के कारण, मैं मान गया। लेकिन शर्त यह रखी कि मैं ड्यौढ़ी में नहीं पढ़ाऊँगा।&lt;br /&gt;''लो बताओ, बखेड़ा ड्यौढ़ीवाला था। तूने पहले क्यों नहीं बताया ? बीबी यूँ ही वहमी है। मेरे यार तू कहीं भी बैठकर पढ़ा। बस, कल को आ जाना मेरे वीर।'' मास्टर जी के शब्दों में अपनत्व भी था और अनुनय भी। 'बीबी' शब्द का प्रयोग उसने अपनी बेटी के लिए किया था, दोहती के लिए नहीं। घर में लड़की की माँ को सब 'बीबी' कहा करते थे और अड़ोस-पड़ोस में भैण जी। अगले दिन दोपहर के बाद गया। वैसे ही चौबारा साफ-सफाई किया हुआ, मेरी कुर्सी बिलकुल पहले वाली जगह पर और चारपाई जिस पर लड़की बैठा करती थी, बिलकुल उसी जगह पर।&lt;br /&gt;लड़की इस बात की जिद्द कर रही थी कि मैं उसे तीन दिन न आने का असली कारण बताऊँ। मैंने उसे सबकुछ बता दिया। पीचो-बकरी खेलने वाली उस लड़की के ज्ञानी की पढ़ाई शुरू करने तक की उसके प्रति अपनी सब भावनाएँ टुकड़ों में धीरे-धीरे प्रगट कर दीं। लड़की के चेहरे पर कुछ घबराहट आ गई थी और मैं भी कुछ डर गया था। मैं कौन-सा पोरस था। बात खत्म हुई तो हमने पढ़ाई शुरू कर दी।&lt;br /&gt;पढ़ाई से लड़की का नाना, बीबी और स्वयं लड़की बहुत संतुष्ट थे। ढाई-तीन महीने विवाह जैसे बीत गए। चाय तो वे रोज़ पिलाते ही थे, कभी-कभार रोटी खिलाने के लिए भी वे जिद्द पकड़ लेते थे। मैं रोटी भी खा लेता था। इस सबकुछ में मेरी भावुक सांझ जुड़ी हुई थी।&lt;br /&gt;लड़की ने परीक्षा दी। पेपर अच्छे हो गए। लड़की से अधिक मैं स्वयं उसके नतीजे की प्रतीक्षा करने लगा। जिस दिन उसका नतीजा अख़बार में छपा, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। ऐसा प्रतीत होता था मानो मैं भी पास हो गया होऊँ। वैसे भी मैं सैर करने के लिए उनके घर के साथ लगती गली में से गुजरा करता और कभी-कभार सिर्फ़ उससे मिलने के लिए मैं उनके घर भी जाता। यह प्यार का सिलसिला मुझे एकतरफा प्रतीत हुआ। उसकी ओर से कोई हुंकारा नहीं था। बेशक एफ़.ए. और बी.ए. की परीक्षाएँ उसने मेरी तरह प्राइवेट ही दी थीं और प्राय: पढ़ाई में भी मेरी सलाह लेती रहती थी, पर मैं जो चाहता था, उस बारे में उसकी ओर से उसका इन्कार ही समझो।&lt;br /&gt;बी.ए. करने के उपरांत तो वह बहुत चालाक हो गई थी। अपने आप को कुछ समझने भी लग पड़ी थी। मैंने उसे पंजाबी में एक लम्बा पत्र लिखा। ज़िन्दगी में यह मेरा पहला प्रेम पत्र था। मैं स्वयं उस पत्र को लेकर उसके घर गया। वह ड्यौढ़ी में नानी के पास बैठकर गरारे कर रही थी। मुझे देखकर उसने लुटिया रख दी और पूरे अदब से नमस्ते कहा। मैंने उसके हाथ में पत्र रख दिया।&lt;br /&gt;''क्या है यह ?'' उसके चेहरे पर लाली छा गई थी, मानो उसका खूब गोरा रंग गुलाबी हो गया हो।&lt;br /&gt;''देख ले।'' मेरी आवाज़ में कंपन ज़रूर होगा। उसने पत्र की पहली पाँच-सात पंक्तियाँ ही पढ़ी होंगी। बड़े धैर्य से बोली-&lt;br /&gt;''बहुत सुन्दर है चिट्ठी यह। मैं इसे अकाली पत्रिका में भेज दूँ।'' वह मजाकिया लहजे में बोल रही थी। उन दिनों में पंजाब में 'अकाली पत्रिका' बहुत प्रसिद्ध अख़बार माना जाता था।&lt;br /&gt;''भेज दे। चाहे ट्रिब्यून में भेज दे।'' मैंने ज़रा खीझकर कहा। (1990 में ट्रिब्यून सिर्फ अंग्रेजी में छपता था और अम्बाला से निकलता था।)&lt;br /&gt;''आप नाराज़ तो नहीं होगे ?'' उसने बड़े नरम लहजे में पूछा।&lt;br /&gt;''नहीं।''&lt;br /&gt;चाय-पानी की रस्मी पूछताछ और मेरी रस्मी तौर पर न-नुकर के बाद मैं घर लौट आया। बस, यह उससे अन्तिम मुलाकात थी जिसके बाद यदि कोई मुलाकात हुई भी, उसमें न मेरी ओर से कोई बात चली और न ही उसकी ओर से।&lt;br /&gt;1994 में वह मालेरकोटला मेरे घर आई। उसका पति उसके संग था। शिष्टाचार के नाते उसकी खातिर-सेवा भी की, पर मेरे दिल में से उसके प्रति प्यार का चश्मा न फूटा, जिसकी शीतलता वर्षों तक मेरी यादों में रची-बसी रही थी। कारण स्पष्ट था कि वह किसी मोह-मुहब्बत के कारण मेरे पास नहीं आई थी, यहाँ एक दफ्तर में उसका कोई काम था और मुझे बा-रसूख व्यक्ति समझकर वह अपने पति के संग मेरे पास आ गई थी। यह वह लड़की थी जिसका नाम 'स' से आरंभ होता था - सुखजीत। अब भी जब वह मुझे याद आती है, उसकी ओर से कोई रिस्पांस न मिलने का दर्द मेरे कलजे में कसक पैदा करता है। मुझे प्यार नहीं किया, न सही। मैंने तो उसे प्यार किया था। अब भी मैं उसे प्यार करता हूँ।&lt;br /&gt;-------------&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;1-गुरमुखी वर्णमाला का चौथा अक्षर 'स' जिसे 'ससा' कहा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-955265395410066548?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/955265395410066548/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=955265395410066548&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/955265395410066548'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/955265395410066548'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/10/blog-post_30.html' title='आत्मकथा'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-qWizNQoLVxc/TrJsisZu9jI/AAAAAAAAAOo/vR5CWaRY_rA/s72-c/priyanka_2409_60.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-6151076561158992911</id><published>2011-10-22T22:58:00.004+05:30</published><updated>2011-10-22T23:09:17.895+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साउथाल(उपन्यास)- हरजीत अटवाल'/><title type='text'>पंजाबी उपन्यास</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-JImgZfGILR0/TqL-B_MRLrI/AAAAAAAAAOQ/w9T_K4byyYI/s1600/storm_070711_60.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5666370591281721010" style="WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 126px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-JImgZfGILR0/TqL-B_MRLrI/AAAAAAAAAOQ/w9T_K4byyYI/s320/storm_070711_60.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ffff66;"&gt;''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-LJH9HiHp75U/TqL-QGIiheI/AAAAAAAAAOc/ivRrVMKh5Jo/s1600/Southall.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5666370833663296994" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 147px; CURSOR: hand; HEIGHT: 217px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-LJH9HiHp75U/TqL-QGIiheI/AAAAAAAAAOc/ivRrVMKh5Jo/s320/Southall.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़ कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ffcc00;"&gt;साउथाल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;हरजीत अटवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;॥ सत्ताईस ॥&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईलिंग काउंसल के चुनाव आ रहे हैं। सभी पार्टियों ने अपनी पार्टी की ओर से काउंसलर खड़े करने हैं। पहले अपने-अपने उम्मीदवार नामज़द करने हैं। भारद्वाज सक्रिय हो जाता है। सोहनपाल उसके साथ है। जगमोहन और गुरचरन भी हैं। दिलजीत दूर रहता है, राजनीति से एक तरफ। सोहनपाल ने उसके लिए हिलसाइड वार्ड चुना है। यहाँ का काउंसलर प्रीतम फुल्ल अनपढ़-सा व्यक्ति है। लोगों में उसका बड़ा नाम नहीं है। कुछ हेराफेरी से पिछली बार नामज़दगी जीत गया था, वैसे योग्य नहीं है। उसके मुकाबले शाम भारद्वाज ज्यादा पढ़ा-लिखा है और स्पीकर भी बढ़िया है।&lt;br /&gt;हर वार्ड के पार्टी मेंबर्स को उम्मीदवार नामजद करने हैं। वह तारीख़ आ जाती है। शाम भारद्वाज ने अपने बहुत सारे नये मेंबर जो कि इस वार्ड में रहते हैं, लेबर पार्टी में भर्ती किए हैं। मित्रों के साथ वैन गाड़ियाँ भरकर लेबर पार्टी के ऐक्टन वाले दफ्तर में पहुँच जाता हे। सेलेक्शन कमेटी के तीन व्यक्ति हैं। सबसे पहले तो चेयरमैन नये सदस्यों को पार्टी ज्वाइन करने के लिए उनका धन्यवाद करता है, स्वागत करता है और वह इतनी बड़ी उपस्थिति पर हैरान भी होता है। वह अर्जियों को देखते हुए बारी-बारी से संभावित उम्मीदवारों को स्टेज पर बुलाता है। हर व्यक्ति अपना परिचय देता है और बताता है कि वह काउंसलर क्यों बनना चाहता है। सभी अपनी-अपनी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए काउंसलर बनने की अपनी योग्यता के विषय में दावे करते हैं। फिर उपस्थित मेंबर उनसे भाँति-भाँति के प्रश्न पूछते हैं। कुल पांच लोगों की अर्जियां हैं- तीन एशियन और दो गोरों की। एशियनों में से सबसे अधिक प्रभावशाली भाषण मुख्तियार सिंह ग्रेवाल का है। वह कालेज में अध्यापक है। वह साउथाल में बच्चों की पढ़ाई और स्त्रियों के हकों पर ज़ोर देना चाहता है और साथ ही, वह साउथाल में घरों की बढ़ती संख्या से हो रही भीड़-भाड़ से भी चिंतित है। शाम भारद्वाज का भाषण आम मसलों के बारे में है जैसे कि साउथाल की गंदगी, बढ़ता ट्रैफिक और भाईचारे के अच्छे संबंध। इसी प्रकार प्रीतम फुल्ल रटी-रटाई बातें करता है। दोनों गोरे कुछ सही बाते करते हैं पर हाल में गोरों की संख्या कम है।&lt;br /&gt;वोट पड़ते हैं। शाम भारद्वाज को इक्कीस, प्रीतम फुल्ल को उन्नीस, पीटर एंडरसन को सत्तरह, आर्थर मिलर को सोलह और ग्रेवाल को सात वोट पड़ती हैं। शाम भारद्वाज खुश है। वह अभी से ही स्वयं को काउंसलर बना समझ रहा है। लेबर पार्टी के उम्मीदवार ने साउथाल में से तो जीतना ही है। इस पार्टी का ही यहाँ पर ज़ोर है। अधिकांश एशियन लोगों के दिलों में यह बात घर किए बैठी है कि वे मज़दूर क्लास लोग हैं और लेबर पार्टी ही उनके लिए अच्छी है। इसलिए वे सभी लेबर पार्टी को ही वोट डालते हैं। शाम भारद्वाज को लगता है कि वह बस जीता ही जीता। वह अभी से सभी से बधाइयाँ ले रहा है। जगमोहन उसको दूर से हाथ हिलाकर बधाई देता है। प्रीतम फुल्ल अपने साथियों के साथ मुँह लटकाये खड़ा है। कुछेक लोग धीमे स्वर में कह रहे हैं कि यह तो सीधी हेराफेरी है। इस तरह अचानक मेंबरों की गाड़ियाँ भर कर ले आना, ये तो घटिया राजनीति है। प्रीतम फुल्ल को लगता नहीं था कि वह नामजदगी से यूँ हाथ धो बैठेगा।&lt;br /&gt;जगमोहन सब उम्मीदवारों के भाषण ध्यान से परखता है। उसको सबसे बढ़िया बातें ग्रेवाल की लगती हैं। वह एक तरफ खड़ा होकर लोगों की ओर देख रहा है। जगमोहन उसके करीब जाकर उसे सम्बोधित होते हुए कहता है -&lt;br /&gt;''मुझे आपकी बातें बहुत अच्छी लगीं, पर मुझे लगता है, आपने अपना होमवर्क पूरा नहीं किया। यही कारण है कि नॉमीनेशन नहीं मिली।''&lt;br /&gt;ग्रेवाल हँसते हुए कहता है-&lt;br /&gt;''नॉमीनेशन मिलना तो दूर की बात है, ये जो छह-सात वोट पड़े हैं, ये भी लोग धोखे में डाल गए हैं।'' कहकर वह ज़ोर से हँसता है।&lt;br /&gt;जगमोहन कहता है, ''सेलेक्शन का यह तरीका ही गलत है।''&lt;br /&gt;''सेलेक्शन का तरीका तो ठीक है, पर हम लोग हेराफेरी करने से नहीं हटते।''&lt;br /&gt;ग्रेवाल के कहने पर जगमोहन कुछ झेंप-सा जाता है। उसको लगता है कि ग्रेवाल उसके बारे में ही कह रहा है कि वह शाम भारद्वाज की वोट बनकर आया हुआ है। ग्रेवाल पुन: कहता है-&lt;br /&gt;''मैंने तो यह तुर्ज़बा ही किया है, वैसे मेरा फील्ड नहीं है यह।''&lt;br /&gt;''आपका कौन-सा फील्ड है ?''&lt;br /&gt;''मैं युनिवर्सिटी टीचर यूनियन में काम कर रहा हूँ। लोकल पॉलिटिक्स में इन्वोल्व होने के लिए ट्राई किया था, पर मेरे वश की बात नहीं।''&lt;br /&gt;यहीं से जगमोहन का ग्रेवाल से परिचय होता है जो कि जान-पहचान की ओर बढ़ता है। एक दिन वे ईलिंग शॉपिंग सेंटर में मिलते हैं और फिर एक दिन ‘द-ग्लौस्टर’ में। विचारों का आदान-प्रदान होने लगता है। सम्बन्ध दोस्ती में बदलने लगते हैं। वे एक-दूसरे को अपना फोन नंबर देते हैं। ग्रेवाल अपने बारे में बताते हुए कहता है कि एक समय में उसे कविता लिखने का शौक रहा है। वह कामरेड इकबाल को भी भलीभांति जानता है। वह जगमोहन को साउथाल के लेखकों के विषय में कितना कुछ बताता है, परन्तु जगमोहन को इसमें अधिक दिलचस्पी नहीं है। वह 'वास-प्रवास' में से कभी कोई लेखादि पढ़ लेता है, नहीं तो पढ़ने में उसकी अधिक रुचि नहीं है। हाँ, अंग्रेजी की अख़बार वह लगातार पढ़ता है, चाहे कोई भी हाथ में आ जाए। 'द मैन' की मसालेदार ख़बरें तो वह वक्त ग़ुज़ारने के लिए पढ़ा करता है।&lt;br /&gt;एक दिन अंग्रेजी की अख़बार 'द टाइम्ज़' में साउथाल की महिलाओं की संस्था 'सिस्टर्ज इन हैंड्ज़' के बारे में एक आलेख छपता है। ग्रेवाल पढ़ता और एकदम जगमोहन को फोन करता है। कहता है-&lt;br /&gt;''आज का टाइम्ज़ देखा ?''&lt;br /&gt;''नहीं तो।''&lt;br /&gt;''देख फिर और पढ़, इन औरतों के बारे में किसी ने बड़ा लम्बा-चौड़ा आर्टिकल लिख मारा है।''&lt;br /&gt;''अच्छा!''&lt;br /&gt;जगमोहन टाइम्ज़ खरीदता है। ख़बर पढ़कर वह ग्रेवाल को फोन घुमाता है। कहता है -&lt;br /&gt;''सर जी, यह तो किसी ने इनकी कुछ ज्यादा ही फेवर कर दी, वैसे ये इतने के लायक नहीं।''&lt;br /&gt;''मेरा तो दिल कर रहा है कि टाइम्ज़ को लैटर लिखूँ और कहूँ कि किसी संस्था के बारे में लिखने से पहले उसके कामों के बारे में पूरी जांच तो कर लिया करो।''&lt;br /&gt;''बात तो आपकी ठीक है सर जी, ये औरतें काम इतना नहीं करतीं। बस, ख़बरों में रहने के चक्कर में रहती हैं। ऐसे ही टाइम्ज़ का कोई रिपोर्टर फंसा लिया होगा।''&lt;br /&gt;''वैसे तो अखबारवालों को भी सभी कम्युनिटीज़ को प्रतिनिधिता देनी होती है। एशियन स्त्रियों का अन्य कोई संगठन है भी तो नहीं।''&lt;br /&gt;''सर जी, ये सब छोटे-से सर्किल में ही घूमती फिरती है, बस।''&lt;br /&gt;जगमोहन ग्रेवाल को हमेशा 'सर जी' कहकर ही बुलाता है। सर जी मजाक में कहना आरंभ किया था कि इंडियन लोग अंकल के साथ भी जी लगा देते हैं और डैडी के साथ भी और इसी प्रकार सर के साथ भी। जगमोहन हमेशा कहता है कि इंडिया में लोगों को यह भी नहीं पता कि शब्द ‘सिस्टर’ सरनेम के साथ लगाया जाता है कि पहले नाम के साथ। उसने 'सर जी' कहना शुरू किया और अब भी 'सर जी' ही कहा करता है। यही पक्का हो गया है। ग्रेवाल हालांकि उससे अट्ठारह-बीस साल बड़ा है, परन्तु दोस्तों की तरह ही व्यवहार करता है। दोस्तों की भाँति ही खुली बातें कर लिया करता है। एक दिन जगमोहन उसके सम्मुख बैठकर सिगरेट पीने लगता है तो ग्रेवाल कहता है-&lt;br /&gt;''ला यार, मुझे भी लगवा एक।''&lt;br /&gt;जगमोहन को ज़रा-सी हैरानी होती है और पूछता है-&lt;br /&gt;''सर जी, आप भी!''&lt;br /&gt;''नहीं यार, मैं कहाँ। यह तो तुझे देखकर हुड़क-सी जाग पड़ी। कभी पिया करता था, अब मुश्किल से इस आदत से निजात पाई है।''&lt;br /&gt;अब वे प्राय: मिला करते हैं। अधिकतर ग्रेवाल के घर ही बैठते हैं। ग्रेवाल अपने घर में अकेला रहता है। सिस्टर्ज इनहैंड्ज़ उनकी बात में प्राय: उपस्थित रहती हैं। ग्रेवाल जगमोहन से पूछता है -&lt;br /&gt;''तू इस संस्था की ओर इतना फैसिनेटिड क्यूँ है ?''&lt;br /&gt;इसका उत्तर जगमोहन के पास नहीं है। एक दिन उसके मन में कुछ ऐसा आता है कि वह ग्रीन रोड पर पंद्रह नंबर का दरवाजा जा खटखटाता है। उसके मन में है कि सिस्टर्ज इनहैंड्ज़ वाली स्त्रियाँ उतना कुछ नहीं कर रहीं, जितना करने की आवश्यकता है और जितना कुछ वे कर सकती हैं। उन्हें अपना कार्यक्षेत्र और फैलाना चाहिए। एक औरत दरवाज़ा खोलती है। वह कुछ डरी हुई-सी है। वह पूछती है -&lt;br /&gt;''बताओ, मैं क्या कर सकती हूँ आपके लिए ?''&lt;br /&gt;''मुझे कुलविंदर से मिलना है।''&lt;br /&gt;''वह तो है नहीं।''&lt;br /&gt;''वैसे होती तो यहीं है न ?''&lt;br /&gt;''नहीं, अब वह यहाँ नहीं आया करती।''&lt;br /&gt;''और प्रीती ?''&lt;br /&gt;''प्रीती कौन ? मैं नहीं जानती।''&lt;br /&gt;वह औरत न में सिर हिलाती है। जगमोहन तो वहाँ सिर्फ़ कुलविंदर को ही जानता है जो कि उसके पास सलाह लेने आई थी। फिर इधर-उधर ही मिली थी, एक-दो बार। प्रीती का नाम तो अचानक ही उसके मन में आ जाता है। प्रीती ने उसको बताया था कि वह भी इस संस्था से जुड़ी हुई है। प्रीती तो उससे बहुत दिनों से मिली ही नहीं है। उसको कभी-कभी उसकी याद भी आती है। एक बार भूपिंदर से भी उसके बारे में पूछा था। भूपिंदर ने बताया था कि प्रीती का पति उसको नाटकों में काम नहीं करने दे रहा। यह बात तो वह पहले से ही जानता है। अब इसका अर्थ है कि प्रीती का इस संस्था के साथ भी कोई सम्पर्क नहीं है। वह वहाँ से चल पड़ता है। कुछेक कदम ही चलता है तो पीछे से आवाज़ आती है-&lt;br /&gt;''एक्सक्यूज़ मी।''&lt;br /&gt;वह पलटकर देखता है। दरवाजे में एक अन्य औरत खड़ी है। वह पूछती है-&lt;br /&gt;''कोई काम ?''&lt;br /&gt;''नहीं, खास नहीं। कुलविंदर से ही मिलना था।''&lt;br /&gt;''वह तो यहाँ से जा चुकी है। यदि कोई काम है, हमारे करने वाला तो बताओ।''&lt;br /&gt;''नहीं, मैंने टाइम्ज़ में आपकी आर्गनाइजेशन के बारे में लेख पढ़ा है, उसके विषय में ही डिस्कस करना था कुछ।''&lt;br /&gt;''आओ, मेरे साथ करो, मैं यहाँ की कन्वीनर हूँ।''&lt;br /&gt;जगमोहन उसके पीछे-पीछे अन्दर चला जाता है। फ्रंट रूम में कुछ कुर्सियाँ पड़ी हैं। एक बड़ा-सा मेज लगा हुआ है। वह औरत उसको वहाँ बैठने का संकेत करती है और स्वयं भी बैठ जाती है। पूछती है-&lt;br /&gt;''आपने ही वहाँ लीगल एडवाइज़ सेंटर खोल रखा है, लेडी मार्गेट रोड पर।''&lt;br /&gt;''हाँ, पर बन्द करना पड़ा।''&lt;br /&gt;''क्यों ?''&lt;br /&gt;''कोई आता नहीं था।''&lt;br /&gt;''हमने तो आप तक अप्रोच की थी, पर आपने ही मना कर दिया।''&lt;br /&gt;''क्योंकि मैं तो इमीग्रेशन के केस ही करता था, दूसरे लॉ के बारे में मुझे कोई ज्यादा जानकारी नहीं।''&lt;br /&gt;''बताओ, कौन सी बात करनी है?... बॉय द वे, मॉय नेम इज़ लक्ष्मी।''&lt;br /&gt;''आय'एम जगमोहन।''&lt;br /&gt;''आई नो ! बस बात बताओ।''&lt;br /&gt;''मुझे तो यह कहना है कि जितनी आपकी कैपेसिटी है, आप लोग उतना काम नहीं कर रहे।''&lt;br /&gt;''आपने आर्टिकल पढ़ा नहीं ? हमारी उपलब्धियों के बारे में नहीं पढ़ा आपने इस आर्टिकल में ?''&lt;br /&gt;''देखो, इस आर्टिकल का क्या मकसद है या इसके माध्यम से इसका राइटर क्या कहना चाहता है, यह एक अलग सवाल है। मुझे तो यह कहना है कि आप स्त्रियों की मैरीड लाइफ़ की प्रॉब्लम्स को ही कवर कर रहे हो, जब कि स्त्रियों की और भी तकलीफ़ें हैं।''&lt;br /&gt;''फॉर एक्ज़ाम्पिल ?''&lt;br /&gt;''फॉर एक्ज़ाम्पिल... ये जबरदस्ती के विवाह, ये ऑनर किलिंग और इंडिया-पाकिस्तान में औरतों के संग कितनी ज्यादतियाँ हो रही हैं।''&lt;br /&gt;''देखिए, हमारी कैपेसिटी बहुत लिमिटेड है, हमें मालूम हैं, औरतों की बहुत प्रॉब्लम्स हैं, पर इस वक्त बड़ा मसला औरत के ऊपर हो रही वायलेंस का है। भारतीयों में पंजाबी मर्द अपनी पत्नियों के साथ बहुत मारपीट करते रहे हैं, ये लोग शराब पीते हैं और शराब पीकर औरत पर हाथ उठाते हैं। दूसरा हम बुजुर्ग़ औरतों की प्रॉब्लम्स को भी डील करते हैं।''&lt;br /&gt;''यह मैं जानता हूँ, मेरा कहना है कि इस एरिये का विस्तार करो, और काम करो।''&lt;br /&gt;''हमारे पास ग्रांटों की कमी है, फिर भी हमने सुखी क़त्ल कांड में आवाज़ उठाई थी।''&lt;br /&gt;''सिर्फ़ एक प्रदर्शन किया था।''&lt;br /&gt;''और एक प्रदर्शन ही काम कर गया, क़ातिल को सज़ा हो गई। सच तो यह है कि एक प्रदर्शन भी बहुत मुश्किल से हो पाता है। सभी औरतें काम करती हैं और जुलूस में आने के लिए हसबैंड की अनुमति चाहिए। आप शायद हमारी प्रॉब्लम को इस एंगिल से नहीं समझ सकते। अब पिछले दिनों अपने एक पंजाबी व्यक्ति ने किसी से अपने घर को आग लगवा दी जिसमें उसकी तीन बेटियाँ और पत्नी जलकर मर गईं। उसने आग इसलिए लगवाई कि उसकी पत्नी बेटा पैदा करने के काबिल नहीं थी।”&lt;br /&gt;''मुझे पता है इस कहानी के बारे में। मैंने 'वास-प्रवास' में पढ़ा था।''&lt;br /&gt;''हम इस इशू को लेकर जुलूस निकालना चाहती हैं, पर औरतें इकट्ठी नहीं हो रहीं। औरतों को काम पर से लौटकर घर संभालना पड़ता है, बच्चे भी और पति के हुक्म भी सुनने होते हैं। सच बात तो जगमोहन जी यह है कि यह पत्नी शब्द गलत है, असली शब्द तो स्लेव है। जब हम कहते हैं कि वह औरत इस आदमी की पत्नी है, हमें कहना यह चाहिए कि वह औरत इस आदमी की गुलाम है।''&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-6151076561158992911?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/6151076561158992911/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=6151076561158992911&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/6151076561158992911'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/6151076561158992911'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='पंजाबी उपन्यास'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-JImgZfGILR0/TqL-B_MRLrI/AAAAAAAAAOQ/w9T_K4byyYI/s72-c/storm_070711_60.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-2118872848719451741</id><published>2011-09-17T12:07:00.000+05:30</published><updated>2011-09-25T12:27:31.968+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धृतराष्ट्र (आत्मकथा) - डॉ. एस. तरसेम'/><title type='text'>आत्मकथा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-ff7ItRdooak/Tn7M9IL7iGI/AAAAAAAAAOI/PrbBqoOKcso/s1600/imagesCAC7I9M7.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5656183532565530722" style="WIDTH: 127px; CURSOR: hand; HEIGHT: 95px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-ff7ItRdooak/Tn7M9IL7iGI/AAAAAAAAAOI/PrbBqoOKcso/s320/imagesCAC7I9M7.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc00;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;धृतराष्ट्र &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;डॉ. एस. तरसेम&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैप्टर-23&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;बुध कि बुद्धू&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इतिहास बताता है कि ईसवी से 563 साल पहले कपिलवस्तु के राजा सुधोदन के घर एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम सिद्धार्थ रखा गया। वैसे उसका पारिवारिक नाम गौतम था। होश संभालने पर उसने शहर में पहले एक रोगी और बाद मे एक वृद्ध को देखा। तीसरे फेरे में उसने एक अर्थी देखी।&lt;br /&gt;राज कुमार ये सब दृश्य देखकर उदास रहने लगा और आख़िर एक रात अपनी सोई हुई पत्नी यशोधरा और फूल भर के बेटे राहुल को छोड़कर जीवन के सही अर्थों को समझने के लिए महलों में से निकल कर जंगल की तरफ चल पड़ा। तपस्या की, भूख से सूखकर पिंजर बन गया। आख़िर सहज जीवन का राह सिद्धार्थ ने खोज लिया और वह बुध बन गया।&lt;br /&gt;कुछ इस तरह के ही ख़याल लेकर एक सुबह मैंने घर छोड़ दिया था। उन दिनों मैं सरकारी मिडल स्कूल, महिता में मुख्य अध्यापक था। सन् 1972 की बात है और दिन थे गर्मियों के। कुछ गिले-शिकवे पत्नी से थे। परन्तु असल में मैं परेशान अपनी आर्थिक मंदहाली के कारण था। तनख्वाह के अलावा अन्य कोई आमदनी नहीं थी। बेहद तंगी-तुर्शी के पश्चात भी तपा मंडी की 8 नंबर गली में बनाये मकान का कर्ज़ा नहीं उतर रहा था। लोहे और लक्कड़ वाले के पैसे ज्यों-के-त्यों खड़े थे। ईश्वर में विश्वास न होने के कारण मेरी उदासीनता मुझे घर छोड़कर बुद्ध की राह चलने के लिए मजबूर कर रही थी। जब करीब नौ बजे बस में चढ़ा तो यह पता नहीं था कि कहाँ जाना है ? बस, दिल में भूत सवार था कि भगवे वस्त्र पहन कर लोगों में समानता का प्रचार करना है। साधू-संतों की बात लोग मानते भी अधिक हैं और मेरे भगवे वस्त्रों को देखकर मेरी सिक्खी-सेवकी बढ़ जाएगी और मैं जल्दी ही जिस इलाके में भी रहूँगा, वहाँ का पथ-प्रदर्शक बन जाऊँगा और लोगों के विचारों को बदलकर रख दूँगा। परन्तु, क्रोध और जोश मनुष्य को सही सोचने नहीं देते। मेरी स्थिति भी कुछ इसी तरह की थी। क्रोध का मारा मैं घर से चला था और जोश में शेखचिल्ली की भाँति किले बनाये जा रहा था। इस जोश में पता नहीं कब मैं पटियाला पहुँच गया, फिर अम्बाला और फिर कालका। अभी चार बजे थे। मेरे लिए चार का समय छह के बराबर था। उस समय मेरी नज़र धूप-छांव से कुछ बेहतर थी। पर शाम होने पर मैं कहीं भी चलने-फिरने के योग्य नहीं रहता था। कालका में मुझे कोई उपयुक्त धर्मशाला नहीं मिली। आधा-पौना घंटा रिक्शा पर धक्के खाता वापस बस-अड्डे पर आ गया, जहाँ से मुझे सीधी चंडीगढ़ की बस मिल गई।&lt;br /&gt;दिन छिप चुका था। बस से उतरते जिस रिक्शावाले ने भी बांह पकड़ी, उसी के संग चल दिया। पाँच रुपये लेकर वह मुझे एक गेस्ट हाउस में छोड़ गया। मेरे लिए वह इसलिए सस्ता था कि ऐसे कठिन समय में वह मुझे मात्र पाँच रुपये में ही ठिकाने पर पहुँचा गया था। शायद उसे फायदा यह हुआ होगा कि उसने गेस्ट हाउस के मालिक से भी पाँच-दस रुपये ले लिए होंगे। गेस्ट हाउस के कमरे में बैठकर मुझे सुख का साँस आया। लेकिन साथ ही चिंता और घबराहट की कोई लहर-सी अन्दर दौड़ जाती क्योंकि अब तक मेरे घर न पहुँचने के कारण सबको यह पता तो चल ही गया होगा कि मैं या तो घर से चला गया हूँ या किसी हादसे का शिकार हो गया हूँ। पत्नी सुदर्शना देवी तो यह सोच रही होगी कि मैं गुस्से के कारण चला गया हूँ पर अन्य रिश्तेदार और यार-दोस्त मेरे किसी हादसे में गंभीर रूप से घायल होने या मेरी मौत तक के कयास लगा रहे होंगे। इस सबकुछ के बावजूद मैंने घर वापस लौट जाने के विषय में उस रात बिलकुल ही नहीं सोचा था। सुबह से पानी तक नहीं पिया था। इसलिए पहले चाय और उसके तुरन्त बाद रोटी का आर्डर दे दिया। मैं सोच रहा था कि आदमी कितना अजीब है। मैंने बड़े स्वाद से चाय पी और फिर रोटी भी बहुत अच्छी लगी। मैंने शायद यह सोचा ही न हो कि आज की शाम मेरे घर में रोटी पकी होगी। क्रांति ज़रूर रो रहा होगा। बॉबी अभी गोद में ही था। उनके बारे में सोचकर भी दिमाग पर कोई बोझ न पड़ा। दिल जैसे पत्थर बन गया हो। उस समय तो यह बात मेरे दिमाग में नहीं आई थी पर आज सोचता हूँ कि आख़िर मनुष्य सिर्फ़ अपने और अपने अस्तित्व के लिए ही दौड़-भाग करता है। न माँ-बाप और न बच्चे, गुस्से और खतरे में उसे अपने लगते हैं और न पत्नी और प्रेमिका। दूसरा, मैं उस समय भी सोचता था और अब भी सोचता हूँ कि मनुष्य अपने आप को ही सही समझता है, दूसरा व्यक्ति उसे गलत लगता है। उस समय मैं अपने आप को बिलकुल ठीक समझता था। तब मुझे लगता था कि सुदर्शना देवी मेरी कुछ नहीं लगती। घर की खराब आर्थिक हालत के बावजूद वह मुझसे पैसों की आस रखती है। भाई, बँटवारा करवाने वाली सल्हीणे वाली बहन और जीजा जी के विषय में सोचकर मेरा मन नफ़रत से भर रहा था जिन्होंने न मेरे अंधेपन के बारे में सोचा और न मेरे बीवी-बच्चों के बारे में। दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया। घर से बाहर निकालने और बँटवारे की उस कुटिल नीति के विषय में सोचकर मुझे अपना कोई भी रिश्तेदार अपना नहीं लगता था।&lt;br /&gt;शायद मैं नहाया नहीं था। सिर्फ़ मुँह-हाथ ही धोया था, पर नाश्ता ज़रूर किया था। जब पैसे पूछे, गेस्ट हाउस के मालिक ने सिर्फ़ सत्तर रुपये मांगे। रात की रिहाइश, चाय-पानी, खाना और सुबह का नाश्ता और रिक्शेवाले की कमीशन आदि के बारे में मैंने मन ही मन हिसाब लगाया। मुझे यह रकम कतई लूट नहीं लगी थी। लेकिन इस बात से अवश्य चिंतातुर था कि मेरे पास अब मात्र 125 रुपये ही रह गए थे। गेस्ट हाउस के मालिक ने एक मेहरबानी यह की कि रिक्शा पर बस-अड्डे जाने वाली सवारी के साथ मुझे बिठा दिया और उसने यह भी कह दिया कि बाबूजी से पैसे न लेना। शायद उसे मेरी कम निगाह के बारे में पता चल गया था। उपकार आख़िर उपकार होता है, छोटा हो या बड़ा। सयाना मनुष्य कभी उपकार भूलता नहीं है। गेस्ट हाउस से चलने के समय मैं सोच रहा था कि अब मैं जुआर (अब ज़िला- ऊना, हिमाचल प्रदेश में) या नादौण(अब ज़िला-हमीरपुर में) जाऊँगा। जुआर के जनता हाई स्कूल में मैं 1961-62 में करीब आठ महीने रहा था और 1966 में नादौण के सरकारी हॉयर सेकेंडरी स्कूल में सिर्फ़ साढ़े पाँच महीने। लेकिन यह इलाका मुझे घरवालों से लुक छिप कर रहने के लिए उपयुक्त ठिकाना लगा। वैसे भी, मैं इस इलाके से परिचित होने के कारण इधर ही अपना गुप्त ठिकाना बनाना चाहता था।&lt;br /&gt;चंडीगढ़ के बस-अड्डे पर पहुँचते ही संयोग से मुझे ऊना की बस मिल गई। बस में बैठने के बाद मैं जैसे सारा गुस्सा-गिला भूल गया था। मेरे पर बस यही धुन सवार थी कि भगवे वस्त्र पहनकर मैं लोगों में मनुष्यता की समानता का प्रचार करूँगा। महात्मा बुद्ध के अष्ट मार्ग के कई नुक्ते मेरे दिमाग में आ रहे थे। पर बोध धर्म को मैं वर्तमान हालात के अनुसार ढालकर ही प्रचार करना चाहता था। बुद्ध से लेकर बीसवीं सदी के तीन चौथाई सफ़र तक पहुँचकर दुनिया बहुत बदल गई है। वैसे भी, माक्र्सवाद भगवे वस्त्र पहनने के बावजूद मेरे दिलो-दिमाग से बाहर जाने के लिए तैयार नहीं था। यह आर्थिक असमानता ही थी जिसके कारण मुझे घर छोड़ना पड़ा था। वैसे भी, इस प्रकार के भगवे वस्त्रों में आर्थिक, सामाजिक समानता के प्रचार करने वाले एक साधू आनन्द स्वामी का माडल मेरे सामने था। वर्ष 1970-71 में चार-पाँच बार वह संत मेरे घर में आया ही होगा।&lt;br /&gt;दो घंटे से कुछ अधिक समय में बस ऊना पहुँच गई। मैं पहले कभी जुआर, कांगड़ा या नादौण जाने के लिए इस रूट से होकर नहीं गुजरा था। यूँ भी मैं बस में चुपचाप बैठा था। धूप चढ़ आने के कारण बस के करीब रेहड़ियों और लोगों के दिखाई देने तथा बस के अन्दर टोपियों वाले पहाड़ियों और पहाड़िनों की बोली के कारण मुझे इस वक्त कल घर में घटित हुई घटना का कसैलापन कुछ कम होता महसूस हुआ। ऊना में कुछ देर खड़ा रहने के बाद मुझे अम्ब की बस मिल गई, जिसे आगे जिस तरफ जाना था, उस इलाके की मुझे अधिक जानकारी नहीं थी। इसलिए मैं अम्ब में ही उतर गया। इसे एक संयोग ही समझो कि यहाँ खडूर साहिब से आई एक बूढ़ी औरत मिल गई, जिसे डेरा बाबा वडभाग सिंह जाने से पहले मैडी (यहीं डेरा वडभाग सिंह का गुरुद्वारा है) गाँव के साथ लगते बढ़ई के एक घर में जाना था। ये बढ़ई मैडी में लगने वाले मेले में हर साल अपना लकड़ी का सामान बेचने आया करते थे। उनकी इस जान-पहचान के कारण ही उस बूढ़ी स्त्री का उनसे संबंध परिवारवाला बन गया था। बुढ़िया का नाम था- नामो (शायद पूरा नाम हरनाम कौर हो) क्योंकि इस बढ़ई परिवार का एक लड़का जुआर में 1961-62 में मेरे पास पढ़ा था, इसलिए नामो के कहने पर मैंने उसके संग जाना स्वीकार कर लिया। वैसे भी, मेरे पास ठिकाने का कोई स्पष्ट नक्शा नहीं था और उदासीनता के कारण मुझे कोई भी कहीं भी ले जा सकता था। मैं नामो के संग चल पड़ा। उसे अम्ब से कुछ आगे जाकर उस गाँव का पैदल रास्ता मालूम था। हम दोनों का रिश्ता जैसे पल छिन में ही माँ-बेटे वाला बन गया हो। वह मुझे बेटा कहकर बुलाती थी और मैं उसे माँ कहकर। हालांकि दिन के समय मुझे चलने में कोई कठिनाई नहीं थी, पर ज्यों-ज्यों अंधेरा बढ़ता, त्यों-त्यों मेरे लिए चलना कठिन होने वाला था। इसलिए माँ को मैंने सारी बात पहले ही सच सच बता दी। पर सच सच वो बात बताई जो मेरी नज़र की कमज़ोरी से संबंध रखती थी। उसने मुझे भरोसा दिलाया कि दिन छिपने पर वह मेरी बांह पकड़कर मुझे ले जाएगी। मैं चिंता न करूँ। समझो, हम दोनों को एक-दूसरे का आसरा मिल गया था। वह एक अपने बुढ़ापे के कारण और दूसरा- औरत जात होने के कारण किसी सज्जन बच्चे का आसरा चाहती थी और मैं रात बिताने के लिए उसके संग चल दिया था। रात तो मैं अम्ब में भी काट सकता था। वहाँ मेरे ठहरने का प्रबंध भी आसानी से हो सकता था। पर पता नहीं, यह कैसी भटकन थी जो मुझे किसी पुख्ता फ़ैसले पर पहुँचने नहीं दे रही थी। जब हम सड़क पर चले जा रहे थे तो मैं आगे था और माँ पीछे। नहिरी से कुछ पहले कोई पहाड़ी राह था जो उस गाँव को जाता था, जहाँ हमको पहुँचना था।&lt;br /&gt;दिन छिपने के कारण मैंने माँ की बांह पकड़ ली और इस तरह मैं अपने डर को छिपा कर माँ को हौसला देते हुए चले जा रहा था। अन्दर ही अन्दर अपने आप को कोस रहा था कि अगर इस तरह घर से जाना ही था तो किसी अच्छी सी जगह पहुँचता। किसी धार्मिक ठिकाने पर चला जाता जहाँ न रोटी की मुश्किल आती और न सवेर-शाम बाहर-अन्दर जाने की।&lt;br /&gt;जब हम आगे बढ़ चले तो माँ ने अपनी औलाद की उपेक्षा का राग अलापना आरंभ कर दिया। मैं सोच रहा था कि इस माई के नैण-प्राण कायम हैं, चार पैसे भी पल्ले हैं, तभी अकेली चल पड़ी है। इस तरह मेरी बेबसी और मेरी अपनी माँ की मजबूरी जब इस माई के हालात के साथ मेरे अन्दर गुत्थम-गुत्था हो रही थी तो मेरे चलने की रफ्तार पहले से अवश्य ही कुछ कम हो गई थी। जब कुछ रोशनियाँ दिखाई देने लग पड़ीं तो मैंने अंदाजा लगाया कि जहाँ माँ को जाना है, वह ठिकाना अब नज़दीक ही है, और वह नज़दीक था भी। जब हम मिस्त्रियों की छन्न में दाख़िल हुए, सभी को जैसे चाव चढ़ गया हो। दोनों कमरों में रोशनी थी, एक कमरे में ग्लोब लैम्प जल रहा था और दूसरे कमरे में सरसों के तेल का दीया। बजाय इसके कि वे मेरे बारे में पूछ-पड़ताल करें, मैंने अपनी सफाई आप ही देना प्रारंभ कर दिया। सचमुच उनका वह लड़का मेरे से पढ़ा हुआ था जिसके बारे में मैंने राह में अंदाजा लगाया था। मैंने उन्हें बताया कि मुझे जाना तो जुआर था, पर माता को आप तक पहुँचाने के लिए मैं इधर आया हूँ। असल में, यह सारी मेरी अपनी घड़ी हुई कहानी थी जो उन्हें जंच गई।&lt;br /&gt;चाय पीने का वहाँ उन दिनों अधिक रिवाज नहीं था। उनके यहाँ लवेरा (दूध देने वाला पशु) था। वे गरम दूध ले आए। मैंने सिर्फ़ आधे गिलास के करीब दूध पिया। रोटी बिलकुल नहीं खाई थी। मुझे डर था कि कहीं रात में रोटी खाने के कारण बाहर न जाना पड़े। उनके बार बार ज़ोर दिए जाने पर मैंने सिर्फ़ यही कहा कि मुझे भूख नहीं है। जबकि मैं चाहता तो रोटी खा सकता था। यह अलग बात है कि अन्दर ही अन्दर मैं घर के खराब हालात और अपनी कम निगाह के कारण बहुत दुखी था, बहुत ही उदास। उन्होंने गरम पानी से मेरे पैर धुला दिए थे। हाथ-मुँह भी धो लिया था और यह कहकर मैं लेट गया था कि मुझे सुबह कोई जुआर तक छोड़ आए, क्योंकि वहाँ से पहाड़ी रास्ते का मुझे पता नहीं था और वैसे भी, जुआर स्कूल की नौकरी के समय वाली मेरी दृष्टि से अब वाली दृष्टि बहुत कम हो गई थी। नींद पूरी नहीं आई थी। अधिकांश समय भविष्य के लिए कोई ठिकाना खोजने और अपनी किस्म का जीवन बिताने की उधेड़बुन में ही बीत गया। सवेर का उजाला कमरे में आने के साथ ही मैं उठकर बैठ गया। वह लड़का जिसका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ, वही मेरी खातिरदारी के लिए मेरे पास आया। अब वह पूरा आदमी बन चुका था। हम दोनों बाहर गए। जंगल-पानी के बाद जैसे मन को शान्ति मिल गई हो। वहीं बहते पानी में मैंने मुँह धो लिया था और आते ही मैंने कहा था कि वह मुझे जुआर तक छोड़ आए। उसने रस्मीतौर पर एक दो बार रहने के लिए कहा। रास्ते कितनी ही देर हम स्कूल की बातें करते रहे, उसके सहपाठियों की बातें, अन्य विद्यार्थियों की बातें और अध्यापकों की बातें।&lt;br /&gt;माँ और उस परिवार के बुजुर्ग़ को दुआ-सलाम करने के पश्चात हम जुआर के लिए चल पड़े। उन्होंने मुझे राह के लिए एक छड़ी भी दी। शायद, बड़े मिस्त्री को मेरी मुश्किल का अंदाजा हो गया था। अम्ब से आते समय भी जब चढ़ाई-उतराई आती तो पैर फिसलने का डर रहता। मेरी गुरगाबी की ऐड़ी के कारण मैं फिसलने से कई बार बच गया था। जब मैं जुआर स्कूल में मास्टर हुआ करता था, उस समय भी मैं घर से स्कूल आने तक और किसी अन्य चढ़ाई-उतराई के लिए छड़ी रखा करता था। अब तो इस किस्म की छड़ी की मुझे और ज्यादा ज़रूरत थी। पिछले अनुभव के कारण मुझे जुआर पहुँचने तक कोई खास मुश्किल नहीं आई थी। लेकिन इस रास्ते में जो भी खाइयाँ आईं या चढ़ाई-उतराई आई, वे कल शाम वाली से कठिन होने के बावजूद आसान लगी थीं। कारण यह था कि दिन के उजाले के कारण मुझे चलने और किसी का चेहरा-मोहरा देखने में कोई अधिक कठिनाई नहीं आ रही थी।&lt;br /&gt;ऊँचे चबूतरे वाला दुकानदार जो कपड़ा भी बेचता था और किरयाने का सामान भी, उसमें कोई तब्दीली नहीं आई थी। वहीं से मैंने छह मीटर भगवा वस्त्र लिया और एक लुंगी भी। कपड़े की दुकान से खरीद-फरोख्त से पहले मैंने उस लड़के का धन्यवाद करके उसे लौटा दिया था। मैं नहीं चाहता था कि किसी को भी मेरी भविष्य की योजना का कुछ पता चले। साथ वाली नाई की दुकान से मैंने सिर के बाल कटवाये। मशीन या उस्तरा नहीं फिरवाया था। कैंची से बाल इतने छोटे करवा लिए थे कि देखने में मैं कोई संत-महात्मा लगूँ। शेव भी करवाई और मूंछें भी बिलकुल साफ़ करवा दीं। सिर मुंडवाने का मेरा यह पहला अवसर था और मूंछे साफ़ करवाने का दूसरा। हाँ, सच कपड़े वाली दुकान से एक बनियान भी ले ली थी।&lt;br /&gt;अब मैं एक एक पैसा खींच खींच कर इस्तेमाल करने के बारे में सोच रहा था, क्योंकि मेरे पास सिर्फ़ 80 रुपये ही रह गए थे। लेकिन जल्द ही 'हीर दमोदर' की एक तुक मुझे याद आ गई - 'पल्ले रिज़क ना बन्हदे पंछी ते दरवेश...'। बस, इस सोच से ही मानो मैं सारी चिंता से मुक्त हो गया था। बस मेरे जाने-पहचाने रास्तों और अड्डों से गुजरती हुई आख़िर नदौण पहुँच गई और वहाँ उतर कर मैं बाज़ार के रास्ते होता हुआ उस चौंक में पहुँच गया, जहाँ से एक रास्ता मेरे आर्य समाजी परिवार के विद्यार्थियों के घर को जाता था और दूसरा रास्ता नदौण वाली मेरी उस माँ के घर को जाता था, जिसका नदौण में स्कूल की नौकरी के समय मैं किरायेदार रहा था। फिर, माँ का घर आ गया। वहाँ एक मिनट रुका, पर सिर्फ 15 फ़ुट की दूरी से ही मैं सीधा ब्यास दरिया के लकड़ी के पुल की तरफ हो गया। एक तो गरमी का मौसम था, दूसरा मैं सुबह से नहाया नहीं था, तीसरे मैंने भगवे वस्त्र पहन कर अपना जीवन-मार्ग बदलना था, जिस कारण लकड़ी का पुल पार करने के बाद मैं बायें हाथ ब्यास दरिया के किनारे-किनारे चला गया। यहीं किसी वक्त नदौण में नौकरी के समय मैं सवेरे-सवेरे नहाने के लिए आया करता था। किनारे और इसके करीब पानी की गहराई के बारे में मुझे अच्छा अंदाजा था। मैंने जूती उतारी, पैंट-शर्ट और बनियान उतार कर दरिया के किनारे बूटों पर रख दी। लुंगी के नीचे भगवे वस्त्र का बड़ा टुकड़ा रखा और छोटे टुकड़े को कमर में बांध लिया। कच्छा उतार कर लुंगी के नीचे रख दिया। ऑंखों पर पानी के छींटें मारे, फिर सिर पर हथेलियों का चुल्लू बनाकर पानी डाला, कुल्ला किया और पानी में उतर गया। पानी में उतरते समय मेरे अन्दर के विचार परस्पर टकरा रहे थे - बुद्ध बनकर प्रकाश बांटने के विचार या अपनी जीवन-लीला समाप्त करने के। संयोग ही कुछ ऐसा बना कि जीवन लीला की समाप्ति से पहले ही दो और नौजवान वहाँ नहाने के लिए आ गए। उन्होंने मुझको ऐसी बातों में लगाया कि मैंने नहा कर कच्छा पहन लिया, गीले भगवे वस्त्र को अच्छी तरह निचोड़ा और फिर हवा में फटक कर उसी से बदन को अच्छी तरह पोंछा। दूसरे भगवे वस्त्र का टुकड़ा मैंने गर्दन से नीचे तक इस तरह लपेट लिया जैसे आनन्द स्वामी पहना करता था। गीला कपड़ा भगवे वस्त्र के ऊपर रख लिया और पैंट-शर्ट और पुरानी बनियान को तहा कर लुंगी में लपेट लिया।&lt;br /&gt;ज्वालामुखी वाली सड़क का मुझे पता था। दायें हाथ में छड़ी और बायीं बगल में लुंगी लेकर मैं उस सड़क की ओर हो लिया। जब मैं नदौण स्कूल में काम करता था, उस समय शौक-शौक में ही दो बार मैं पैदल चलकर ज्वालामुखी गया था। राह में डंगर चराते लड़के और गागरों में पानी ढोतीं स्त्रियाँ मिलीं। मन कभी बेचैन हो जाता और कभी फिर सामान्य हो जाता। किसी द्वारे जाकर अलख जगाने का ढंग अभी मुझे नहीं आता था। पर जब इस राह पर चल ही पड़ा था तो यह ढंग सीखना भी ज़रूरी था। कुछ समय के उपरांत सेवक अपने आप राशन-पानी डेरे में पहुँचा देंगे, पर हाल की घड़ी तो मांगकर खाना पड़ेगा। वारिस के किस्से में बाल नाथ की जोग लेने के समय दी गई शिक्षा की एक एक पंक्ति दिमाग में बिजली की भाँति कौंध गई। काम, क्रोध, मोह, लोभ, अंहकार से मुक्त होने के संबंध में सभी धर्मों में साझी शिक्षा मन में बसा रहा था। बुद्ध का अष्ठ मार्ग और बुध्द और जैन दोनों धर्मों के अहिंसा संबंधी सिध्दांत मेरी जीवनधारा के अंग बनने थे। लेकिन इनसे भी कुछ नया यदि मैंने न किया तो मेरे नये मार्ग का क्या अर्थ होगा ? सामाजिक-आर्थिक समानता मेरे प्रचार के मुख्य सूत्र होंगे। पर मैं किसी अदृश्य शक्ति और देवी-देवताओं की आराधना के बारे में अपने शिष्यों को बिलकुल उपदेश नहीं दूँगा। इस ताने-बाने में उलझा पता नहीं कब मैं सड़क के साथ एक बउली के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़के शरारतें कर रहे थे। मुझे आता देखकर वे एकदम चुप हो गए और बउली से कुछ दूर चले गए। मैंने दो चुल्लू पानी पिया और फिर उसी सीधी काली सड़क पर चलने लगा।&lt;br /&gt;एक तो कुछ भूख लग आई थी और दूसरे किसी द्वारे जाकर मांगने का अभी पहला सबक सीखना था। इसलिए सड़क के दोनों तरफ दृष्टि दौड़ता कि कोई छन्न या टप्परू नज़र पड़ जाए। पहाड़ों में स्लेटों या खपरैल से बने घरों को छन्न या टप्परू कहते हैं और इनके विषय में मुझे पहाड़ों पर तीन अलग अलग स्कूलों में नौकरी करते समय पता चला था। शायद, ज्वालामुखी की राह तो अभी तीन किलोमीटर रहती थी। सड़क के दायीं तरफ एक अच्छी खासी छन्न नज़र आई। मैं कुछ झिझकते हुए उधर हो चला। दर पर खड़ा देखकर एक पच्चीस-तीस साल की युवती आई। 'जल, देवी!' मेरे इन दो शब्दों को पवित्र आदेश समझकर वह अन्दर गई। मैं पैरों के बल वहाँ बैठ गया। कुछ समय पश्चात ही वह दूध की पतली सी लस्सी बना लाई। लौटे के साथ साथ उसके हाथ में एक गिलास भी था। जब उसने मुझे गिलास भर का पकड़ाया, सचमुच वह मुझे देवी का रूप ही लगी। फिर, दूसरा गिलास और फिर बस। खड़े होकर आशीर्वाद देने के लहजे में कहा, ''सुखी रहो देवी !'' अन्दर से जो दो आवाज़ें मुझे सुनाई दीं, वह थीं - ''कौन था ?'' ''महात्मा था कोई ।'' देवी के शब्दों ने मेरे अन्दर जैसे महात्मा के आधे गुण भर दिए हों। दिन छिपने से कुछ पहले ही मैं ज्वालामुखी पहुँच गया। धर्मशाला का मुझे पता था। मैं माता के मंदिर में जाने की बजाय पहले धर्मशाला में पहुँचा। मैनेजर ने महात्मा समझ कर मेरे लिए अपने आप ही एक कमरा खोल दिया। जब वह मेरा नाम, पता पूछने लगा, मैंने अपना नाम प्रेमा नंद बताया और ठिकाने के संबंध में इतना ही कहा कि दरवेशों का कोई ठिकाना नहीं होता। मैनेजर जैसे मुझसे बहुत प्रभावित हो गया हो। थकावट के कारण मंदिर जाने की मेरे अन्दर शक्ति ही नहीं थी। बिछी हुई दरी पर लेटने के बाद मानो मैं निढाल-सा हो गया था, बहुत उदास और बहुत ही निराश।&lt;br /&gt;महात्मा अभी मैं बना नहीं था। वैसे महात्मा का अभिनय करना कुछ-कुछ सीख गया था। दिल में अभी भी एक धुकधुक थी कि मुझे खोजने में मेरे परिवार या रिश्तेदारों को अधिक समय नहीं लगेगा। इसका सीधा कारण मेरी ऑंखों की कम रोशनी था। यदि ऐसा न होता तो शायद यह सब कुछ भी न घटित होता। लेकिन अब जब सब कुछ घटित हो चुका था, यह सोचना व्यर्थ था।&lt;br /&gt;दिन छिप गया था और धर्मशाला का एक सेवक मुझे बाथरूम के बारे में सब कुछ बता गया था। पर उसको क्या मालूम था कि मैं रात में अकेला कहीं भी जाने योग्य नहीं हूँ। कुछ यात्रियों के आने से धर्मशाला में अच्छा रौनक मेला तो हो गया था, पर मेरा मन अशान्त था और दुविधा का शिकार भी। घर से निकले को तो यह तीसरा दिन ही हुआ था। लेकिन इतनी जल्दी दुविधा का शिकार हो जाऊँगा, यह मैंने सोचा नहीं था। ज़िन्दगी में कभी भी कोई किया गया फ़ैसला मैंने पूरी तरह नहीं बदला था। यह तो बड़ा अहम मसला था, महात्मा बुद्ध बनकर दुनिया को सामाजिक-आर्थिक अन्याय से मुक्त करवाने का मसला। परन्तु इतनी जल्दी मेरी फूंक निकल जाएगी, यह सोच सोचकर मैं बहुत शर्मिन्दा हो रहा था।&lt;br /&gt;पता नहीं कौन था, शायद लाटों वाली माता के द्वार पर माथा टेकने वाला कोई भगत हो, मेरे चरण स्पर्श कर रहा था और मैंने भी 'जय हो' कहकर उसकी श्रद्धाभक्ति को नमस्कार कर दिया। वह रोटी रखकर चला गया, फिर और रोटी पूछने के लिए आया। मैंने न में सिर हिला दिया। मेरे लिए तो ये दो रोटियाँ ही बहुत थीं। मन भर भर आ रहा था। उस भगत के बाद दो और सज्जन भी आए। मेरे ठौर-ठिकाने के बारे में भी पूछा। मैंने केवल यही कहा, ''दरवेशों का कोई घर-दर नहीं होता।'' शायद, मेरे इस जवाब ने ही उन्हें संतुष्ट कर दिया हो। लेकिन एक बात साफ़ थी कि इन यात्रियों में से कोई बरनाला इलाके का नहीं था। यह उनकी बातचीत से पता चलता था। सवेरे जब उठा, कोई भगत चाय पूछने आ गया। मैंने इन्कार में सिर हिलाया और साथ ही यह भी कहा, ''स्नान के बाद।'' शायद मेरे ऐसा कहने पर उसके अन्दर मेरे प्रति सत्कार और बढ़ गया हो, क्योंकि जंगल-पानी और नहाने के बाद वह चाय के साथ पत्तल पर दो पूरियाँ भी रख लाया था। पूरियों पर आलुओं की सूखी सब्जी थी। भगत गिलास लेने आया, मैं 'जय हो, जय हो' कहकर अपने महात्मा होने के प्रभाव को जैसे और पक्का कर रहा था। शायद अब यह सब कुछ मेरी ड्रामेबाजी से बढ़कर कुछ नहीं था, क्योंकि मैंने तो रात में ही घर वापस लौटने का फ़ैसला कर लिया था।&lt;br /&gt;माता के मंदिर के बिलकुल करीब एक हलवाई से 21 रुपये का प्रसाद तैयार करवाया, जिसे हिंदुओं की धार्मिक भाषा में 'कड़ाही करवाना' कहते हैं। उसने पत्तल पर गरम गरम प्रसाद डाल कर मुझे दे दिया। मैं बायें हाथ में पत्तल और दायें हाथ में छड़ी लेकर मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ गया और सीधा ज्वालामुखी के मुख्य मंदिर में दाख़िल हो गया, जहाँ लाटें जलती हैं। हिंदू इन लाटों को माता की करामात कहते हैं पर साइंस में विश्वास रखने वाले और नास्तिक इन लाटों के जलने को मंदिर के नीचे किसी गैस के जख़ीरे का होना बताते हैं। परन्तु इस समय जब कि मैं एक कुराही ही था, मुझे इन लाटों के जलने के संबंध में कोई भी वैज्ञानिक टिप्पणी करने का अधिकार नहीं था। उस समय तो मैं यह सोचता था कि शायद दोनों बेटों के पिछले नवरात्रों में केश उतारने के समय मेरा मंदिर में प्रवेश न करना ही इसका कारण बना है, जिस कारण मैं लाटां वाली के आगे नतमस्तक होने आया हूँ। शायद मेरे भगवे वस्त्र देख कर मंदिर में प्रवेश करते समय मंदिर के किसी भी पंडे या भोजकी ने मुझसे कुछ नहीं पूछा, वरन मुझे देखकर वह सत्कार की मुद्रा में आ गए। डोना पकड़ा, माता के चरणों में भोग लगाने के पश्चात डोने में कुछ और भोग डालकर मुझे पकड़ा दिया और साथ ही मुझे चरण-वंदना भी की। मंदिर से बाहर आते ही डोने को एक बकरा पड़ गया। शायद कोई भगत यह बकरा मंदिर में चढ़ाकर गया हो। इस घटना ने भी मुझे न तो निराश किया और न ही मुझे क्रोध आया।&lt;br /&gt;अब जबकि मेरा सारा गुस्सा ही पूरी तरह काफूर हो चुका था, मैं सीधा बस-स्टैंड की तरफ़ चल दिया। होशियारपुर बस-अड्डे पर आकर किसी ओट में खड़ा हो गया। नई बनियान पहनी और पैंट-शर्ट भी। भगवे वस्त्र और मैली बनियान, लुंगी में लपेट कर मैं लुधियाना वाली बस में बैठ गया। लेकिन तपा जाने के लिए मेरा अभी भी मन नहीं कर रहा था। आख़िर, लुधियाना से रेल द्वारा मैंने अपनी बहन और अपने सबसे अधिक हमदर्द गूजर लाल जीजा जी के पास जाने का फ़ैसला कर लिया। स्टेशन से तांगा लिया और मालेरकोटला के पटेल मुहल्ले के पास जा उतरा। चन्द्रकांता बहन मेरी जैसे प्रतीक्षा ही कर रही हो। उसके लिए मानो चाँद बादलों में से निकल आया हो। शायद जीजा जी ने कुछेक पलों में ही तपा और अन्य रिश्तेदारों को फोन कर दिया। भाई और मेरी पत्नी दोनों बच्चों को लेकर दिन छिपे बहन के घर पहुँच गए। मुझे यूँ लगता था जैसे मैं अभी इन सबके लिए पराया होऊँ और ये सब मेरे लिए। बॉबी को गोद में लेकर मैं खूब रोया था। कुछ दिन मैं मालेरकोटला में ही रहा, सुदर्शना देवी भी और बच्चे भी। भाई वापस तपा मंडी लौट गया था। शायद जीजा जी और भाई ने सबको सख्त हिदायत कर रखी थी कि मालेरकोटला कोई न जाए। मुझे यह बात अच्छी लग रही थी क्योंकि मैं किसी के सामने किसी दया, किसी हमदर्दी और किसी मजाक का पात्र नहीं बनना चाहता था। मुझे बच्चों की भाँति प्यार से रखा जा रहा था। दोनों बच्चे रात में मेरे संग ही सोते थे। सुदर्शना देवी की सेवा बिलकुल वैसी ही थी, जैसी विवाह के बाद के दिनों की। तब तक मैं तपा नहीं गया था जब तक सिर के बाल पूरी तरह नहीं उग आए थे। जीजा जी के रोज़ रात को दिए गए उपदेश से मेरे अन्दर गृहस्थ जीवन और समाज सेवा की एक नई जलधारा संगम बनकर बहने लगी थी। बहुत कुछ समझा-बुझा कर जीजा जी हमें गाड़ी चढ़ा गए थे। बुध्द या नानक की उदासी जैसा मेरे पास कोई आधार ही नहीं था। बुध्द कहाँ बनता ? समझो, बुध्दू लौटकर वापस आ गया था।&lt;br /&gt;यह मेरे सरकारी मिडल स्कूल, महिता में नौकरी के समय का वाकया है, जिसे मैं अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी मूर्खता समझता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-2118872848719451741?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/2118872848719451741/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=2118872848719451741&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/2118872848719451741'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/2118872848719451741'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='आत्मकथा'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' 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/&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-82ChW8bliuM/Tlj2TC8_1MI/AAAAAAAAAOA/rZWs-r8Eiwk/s1600/Southall.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5645532939979576514" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 134px; CURSOR: hand; HEIGHT: 205px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-82ChW8bliuM/Tlj2TC8_1MI/AAAAAAAAAOA/rZWs-r8Eiwk/s320/Southall.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़ कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;साउथाल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;हरजीत अटवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;।। छब्बीस ॥&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;प्रदुमण सिंह देखता है कि बलबीर कुछ खीझा-खीझा-सा रहने लगा है। पिछले महीने उसका विवाह हुआ है। रिश्तेदारों ने लड़की ढूँढ़ी और यह कारज कर दिया। विवाह करने से उसके यहाँ स्थायी होने के अवसर बढ़ गए हैं। वैसे तो सभी कहते हैं कि इमीग्रेशन कानून एक डर्टी गेम है, पता नहीं यह किधर को चल पड़ेगा। वह सोचता है कि शायद उसने ही बलबीर को कुछ कह दिया हो। या फिर तनख्वाह बढ़ाने का कोई बहाना खोज रहा हो। कई कामगर अपना वेतन बढ़वाने के लिए अक्सर ऐसा ही करते हैं। कहने लगते हैं कि वे काम छोड़ रहे हैं। वह सोचने लगता है कि बलबीर बढ़िया ड्राइवर है। यदि अधिक करेगा तो हफ्ते के दस पौंड बढ़ा देगा। बजाय इसके कि नया ड्राइवर ढूँढ़ा जाए, फिर उसे ट्रेंड किया जाए, दस पौंड बढ़ाना आसान है। बलबीर पूरे काम को बाखूबी संभाल रहा है। एक दो दिन देखकर वह स्वयं ही बलबीर से पूछता है -&lt;br /&gt;''बेटा, ठीक हो ?''&lt;br /&gt;''हाँ, अंकल बिलकुल ठीक हूँ।''&lt;br /&gt;''फिर मुँह क्यों चारा खाती भैंस की तरह बना रखा है ?''&lt;br /&gt;''असल में बात यह है अंकल कि मैं अपना काम शुरू करना चाहता हूँ।''&lt;br /&gt;''अच्छा, किस चीज़ का ?''&lt;br /&gt;''यही, समोसों का। मेरी वाइफ़ भी तेज है, सास ने भी यह काम किया हुआ है। उनकी गैरज बहुत बड़ी है, खाली पड़ी है।''&lt;br /&gt;बात सुनकर प्रदुमण सिंह घबरा उठता है। घर में ही शरीक पैदा हो रहा है। उसी से सीखकर उसके बराबर ही खड़े होने की कोशिश कर रहा है। अपने समोसे बनाएगा, फिर उसकी दुकानों पर जाकर रखने का यत्न करेगा। दुकानदार को एक समोसे के पीछे तीन पैनियाँ कम करके अपनी तरफ कर सकता है। यह लड़का बेशक चुप-सा है पर अन्दर से तेज़ है। बलबीर चला जाता है, परन्तु प्रदुमण सिंह सोच में डूब जाता है कि क्या किया जाए। बलबीर को कैसे रोका जाए।&lt;br /&gt;अगले दिन वह चेहरे पर खुशी दिखलाता हुआ बलबीर से कहता है-&lt;br /&gt;''यह तो अच्छी बात है कि तू अपना काम शुरू करने के बारे में सोच रहा है।''&lt;br /&gt;''अच्छा ! अंकल मैं तो डर रहा था कि आप गुस्सा करोगे।''&lt;br /&gt;''गुस्सा कैसा भई, बेटे जवान होकर पिता के बराबर खड़ा हुआ ही करते हैं। बल्कि तुझे किसी हैल्प की ज़रूरत हो तो बताना।''&lt;br /&gt;''ठीक है अंकल।''&lt;br /&gt;''पर एक बात और है बलबीर।''&lt;br /&gt;''कौन सी ?''&lt;br /&gt;''तू अपना राउंड खड़ा कर ले। समोसे मैं तुझे कोस्ट प्राइज़ पर दिए जाऊँगा। तू यूँ ही भट्ठियों वगैरह पर खर्च करता फिरेगा।''&lt;br /&gt;''कितने का समोसा दोगे ?''&lt;br /&gt;''यह तो तुझे पूरी तरह कैलकुलेट करके बताऊँगा। आजकल हम दुकानदार को पैंतालीस पैंस का एक मसौसा देते हैं। हमें अंदाजन कोस्ट करीब पच्चीस पैंस करेगा और करीब दो पैनियाँ मैं कमाकर, तुझे अट्ठाइस पैस का देता रहूँगा, पर मुझे हिसाब करके देख लेने दे।''&lt;br /&gt;शाम को प्रदुमण सिंह हिसाब लगाकर देखता है कि एक समोसा कितने का पड़ता है। पहले तो यह सस्ता ही था, वह दुकानदारों को भी तीस पैंस का बेचता रहा था, पर अब पैंतालीस का देता है। अब समोसा पैकेट में बन्द और लेबल लगा होने के कारण खर्चा बढ़ चुका है। वह हिसाब लगाता है। समोसा अभी भी बीस पैनी के अन्दर अन्दर ही पड़ता है।&lt;br /&gt;अगले दिन उसकी बातचीत बलबीर से अट्ठाईस पैनी के हिसाब से पक्की हो जाती है। बलबीर को भी यह सौदा गलत नहीं प्रतीत होता। इतने दिन घूमकर अपना काम शुरू करने की राह में आती तकलीफ़ें उसने देख ही ली हैं। सबसे बड़ा चक्कर तो हैल्थ वालों का है। वे बहुत चैक करते हैं। अब यदि वह समोसे प्रदुमण सिंह से लेता रहे तो जिम्मेदारी भी उसी की होगी। बलबीर कहता है-&lt;br /&gt;''पर अंकल, अगर कल को तुम समोसे देने बन्द कर दो तो ?''&lt;br /&gt;''ऐसा कभी नहीं होगा, पर शर्त एक ही है कि हमारी दुकान या स्टोर आदि पर न जाना, नई जगह खोजना। तू तो जानता ही है कि लंदन तो समुद्र है, जितनी मर्ज़ी मछलियाँ पकड़े जाओ।''&lt;br /&gt;''ठीक है, फिर ड्राइवर का इंतज़ाम कर लो।''&lt;br /&gt;बलबीर खुश है। प्रदुमण सिंह भी खुश है। उसे पता है कि माल सप्लाई करना या सेल्समैंनशिप करना बहुत कठिन है। माल तैयार करने का क्या है, कोई भी कर करा सकता है। वह सोच रहा है कि बलबीर जितना भी काम बढ़ाएगा, उतना ही वह भी कमाएगा। यदि बलबीर जैसे एक दो व्यक्ति और उसके पास से माल लेकर आगे सप्लाई करने लग पड़े तो उसके वार-न्यारे ही हो जाएँ। काम बहुत बढ़ जाए। अब उसे नये ड्राइवर को तलाशने की चिन्ता है। वह हर मिलने वाले से पूछताछ करने लगता है यह बताते हुए कि उसको एक ड्राइवर की ज़रूरत है। बहुत बार तो लोग काम की खोज में उसकी फैक्टरी तक ही आ पहुँचते हैं, पर ड्राइवर मिलने बहुत कठिन हो जाते हैं। ड्राइवर की तलाश में वह संधू वकील से भी बात करता है। संधू आगे मीके को बताता है जिसने ड्राइविंग टैस्ट पास करके लाइसेंस ले लिया है। मीका एक दिन आकर ‘सतिश्री अकाल’ बुलाता है। कहता है -&lt;br /&gt;''मुझे शराबी वकील ने बताया कि तुम्हें ड्राइवर चाहिए।''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह मीका को पैरों से लेकर सिर तक निहारता है और पूछता है-&lt;br /&gt;''लाइसेंस है ?''&lt;br /&gt;''तो और क्या मैं मुँह दिखाने आया हूँ ?''&lt;br /&gt;''अपना ही है ?''&lt;br /&gt;''नहीं, बिन में से ढूँढ़ा था ?''&lt;br /&gt;कहकर मीका हँसने लगता है। प्रदुमण सिंह भी हँसता है। मीका जेब में से लाइसेंस निकाल कर दिखलाते हुए कहता है -&lt;br /&gt;''अंकल, तुम्हें मसखरी बहुत सूझती है।''&lt;br /&gt;''पूछ-पड़ताल तो करनी ही पड़ती है। लोग एक दूसरे का लाइसेंस ही इस्तेमाल किए जाते हैं। क्या नाम है तेरा ?''&lt;br /&gt;''मीका।''&lt;br /&gt;''मीका क्या ? पूरा क्या है ?''&lt;br /&gt;''मीके से ही काम चलाये चलो।''&lt;br /&gt;मीका हँसता हुआ कहता है। प्रदुमण सिंह लाइसेंस पर से उसका नाम और पता पढ़ने लगता है और फिर कहता है -&lt;br /&gt;''तीस पौंड दिहाड़ी के हिसाब से देंगे, जब तक काम सीखेगा, तब तक पच्चीस पौंड। पाँच दिन ड्राइवरी के और दो दिन अन्दर के काम के, अगर लगाने हुए तो।''&lt;br /&gt;''मैं तो सोचता था कि ईश्वर ने सात दिन क्यों बनाए हैं, बेशक दस बना देता। हमें कोई फ़र्क़ नहीं।''&lt;br /&gt;मीका बलबीर के साथ राउंड सीखने लग पड़ता है। बलबीर सिटी की तरफ निकलता है और गुरमीत दरिया पार करके वाटरलू के एरिये में समोसे देने जाता है। बलबीर मीके से कहता है -&lt;br /&gt;''दो हफ्ते लग जाएँगे, तुझे काम सीखते हुए।''&lt;br /&gt;''यारा, तेरी मैं दो दिन में तसल्ली करवा दूँगा।''&lt;br /&gt;''मेरी नहीं, अंकल की तसल्ली चाहिए।''&lt;br /&gt;''अंकल की तसल्ली भी करवा दूँगा। अगर ऐसे नहीं हुई तो हमें दूसरी तरह भी करवानी आती है।''&lt;br /&gt;मीका बात करते हुए कमीज़ के कॉलर खड़े कर लेता है। बलबीर थोड़ा-सा उसको जानता है कि वह गप्पी है। बलबीर कहता है -&lt;br /&gt;''मुझे लगता है, तेरा काम करने का इरादा नहीं।''&lt;br /&gt;''काम तो मुझे करना है, काम की तो ज़रूरत है। पर जहाँ कहीं भी काम करूँ, कोई न कोई पंगा पड़ जाता है साला।''&lt;br /&gt;''यहाँ भी पंगा डाल लेगा अगर जीभ पर काबू नहीं रखा तो।''&lt;br /&gt;''नहीं, यहाँ नहीं पड़ता। इस अंकल को मैं सोध कर रखूँगा। मुझे इसका सारा पता है, ये औरतों का शौकीन है और मैं इसको रणजीत कौर का पता दे दूँगा, नहीं तो किसी दूसरे तरीके से काणा कर लूँगा।''&lt;br /&gt;मीका उत्साहित होकर कहता है। उसने दो दिन में तो राउंड क्या सीखना है, दो हफ्ते में भी नहीं सीख सकता। बहाना करते हुए कहता है -&lt;br /&gt;''असल में बात यह है कि लंदन में गोरी औरतें बहुत खूबसूरत हैं, काली औरतें भी कम नहीं। गोरियों का आगा और कालियों का पीछा, बस यही देखने लग पड़ता हूँ, इसलिए राह याद नहीं हो पा रहा।''&lt;br /&gt;करते-कराते मीका तीन सप्ताह राउंड सीखने में लगा देता है। वैसे मीका काम से मुँह नहीं चुराता है। कुछेक बार तो प्रदुमण सिंह को उसका व्यवहार बहुत बुरा लगता है, उसका दिल करता है कि हटा दे, पर फिर उसके काम को देखकर सोचने लगता है कि उसको वश में कर ले तो उससे अधिक से अधिक काम ले सकता है। ऐसे आदमी प्रशंसा सुनकर ज़्यादा काम करते हैं और ऐसा ही होता है। वह मीके को थोड़ी-सी फूंक दे देता है और मीका काम के लिए उड़ा फिरता है।&lt;br /&gt;डिलीवरी के काम में मीका ठीक चल रहा है। फैक्टरी के अन्दर भी दो दिन लगा लेता है। अपने खुले मुँह के कारण कइयों को नाराज़ भी कर लेता है और सबका दिल भी लगाए रखता है। कोई औरत धीमे काम करती है तो कह देता है -&lt;br /&gt;''क्यों बीबी, दिहाड़ी पर कपास चुगने आई हुई हो जो धीरे-धीरे काम कर रही हो।''&lt;br /&gt;कोई पैरों के बल बैठी हो तो वह कह देता -&lt;br /&gt;''बीबी, जंगल के लिए टॉयलेट उधर है।''&lt;br /&gt;कई बार अपने खाने के लिए पकौड़े भी निकलवा लेता है। एक दिन कहीं से भांग खोज लाता है और पकौड़ों में डलवा कर अपने साथ-साथ औरतों को भी खिला देता है। कभी कोई पूछती है -&lt;br /&gt;''रे मीके, तेरा पूरा नाम क्या है ?''&lt;br /&gt;''क्यों बीबी ? मीके से काम नहीं चलता ?''&lt;br /&gt;''चलता तो है, पर फिर भी ?''&lt;br /&gt;''अभी मैं बिजी हूँ बीबी, अभी मीके से ही काम चलाई चल।''&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-60293525562894173?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/60293525562894173/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=60293525562894173&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/60293525562894173'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/60293525562894173'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/08/blog-post_27.html' title='पंजाबी उपन्यास'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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/&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ffff00;"&gt;धृतराष्ट्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;डॉ. एस. तरसेम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff99;"&gt;चैप्टर-22&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ठगी-दर-ठगी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चकबंदी होने के बाद गाँव शहणे वाली सारी ज़मीन मेरे बाबा की औलाद ने अपने अपने नाम करवा ली थी। 1953 में बाबा नरैणा मल्ल पूरा हो गया था। उसके बाद ज़मीन का कार-मुख्तयार मेरा चाचा कुलवंत राय था। मन करता तो वह रबी-ख़रीफ अनाज-दाना दे देता, मन करता तो न देता। जहाँ तक मुझे याद है, ख़रीफ की फ़सल का हिस्सा उसने हमें कभी नहीं दिया था। रबी की गेहूं हमें पहुँच जाती थी।&lt;br /&gt;मेरे ताया, पिता और चाचा आपस में चार भाई थे- चमन लाल, बाला राम, लेख राम(मेरे पिता) और चाचा कुलवंत राय। ताया बाला राम प्लेग की बीमारी में मर गया था। उसके दो पुत्र - हंस राज और अमर नाथ थे और एक बेटी थी- सत्या। मेरे ताया चमन लाल (जिसे हम सभी बाई कहा करते थे) और मेरे पिता ने हंसराज को पहले डी.एम. कालेज, मोगा से मैट्रिक करवाई। पढ़ने में वह बहुत होशियार था। माँ बताया करती थी कि फिर उसे लाहौर पढ़ने के लिए भेजा गया, जहाँ उसने बी.ए. के पश्चात एलएल.बी. की। लुधियाना में वकालत शुरू करवाई(उन दिनों शहिणा ज़िला लुधियाना में हुआ करता था और यह इलाका सीधा अंग्रेजों के कब्ज़े में था), पर वकालत न चली। हंसराज स्वभाव का बड़ा खुश्क था। वकालत में लियाकत के साथ साथ जीभ की मिठास भी चाहिए होती है और हाज़िर जवाबी भी। सो, वह बैंक में भर्ती हो गया। छोटा अमर नाथ मोगा वाली दुकान पर बैठ गया। यह दुकान मेरे पिता के चारों भाइयों की सांझी थी। इस दुकान पर चाचा कुलवंत और अमर नाथ बैठा करते थे। गाँव का सारा कारोबार मेरा पिता संभालता था। गाँव वाली बजाजी की दुकान पर बाई बैठता था।&lt;br /&gt;मोगा वाली दुकान पता नहीं कैसे फेल हुई ? माँ के बताये अनुसार चाचा कुलवंत और बाला राम के दोनों लड़कों ने दुकान में घाटा दिखा कर हमारे चाचा कुलवंत के नाम से बैंक के लॉकर में रखा सौ तोले सोना दबा लिया और यह कहकर सोना देने से इन्कार कर दिया कि वह तो घाटा पड़ने के कारण बेच दिया है। असल में, सोना बेचा नहीं था। इस सारी ठगी के पीछे साज़िश गढ़ने वाला हंस राज था। उसकी वकालत लुधियाना में नहीं चली थी। वकालत के दांवपेंच उसने घर में ठगी करने के लिए प्रयोग किए होंगे। मेरे पिता को चाचा कुलवंत राय पर गिला कम था, हंस राज और अमर नाथ पर अधिक। कुलवंत राय बाबा के दूसरे विवाह की औलाद था। इस दूसरे विवाह की औलाद में कुलवंत राय से छोटी बुआ गणेशी थी। हमारे घरों में उसका हुक्मरानों की तरह रौबदाब था। मेरा जहाँ तक अंदाजा है कि मेरे पिता अवश्य भोले पंछी होंगे। गणेशी बुआ पर उसको रब जैसा भरोसा था। यह बात माँ बताया करती थी। लेकिन मेरे अनुमान अनुसार सारी चालाकियों का केन्द्र मेरी बुआ गणेशी ही थी। उसके अपने घर में भी उसकी ही चलती थी और अपने पिता की औलाद पर भी वह अपना हुक्म चलाती थी। दुकान की ठगी में ऊपर-ऊपर से तो वह साझी और निरपेक्ष होने का नाटक खेल गई, पर भीतर से वह दूसरी ओर थी। कुलवंत उसका सगा भाई था। इसलिए बुआ का चाचा कुलवंत राय की ओर झुकाव होने के कारण मेरे पिता पल्ला झाड़कर गाँव आ गए थे। भाई के 1940 में मोगे से ही हंस राज वाले इंटर कालेज से मैट्रिक पास करने और दुकान फेल होने के कारण मेरे पिता के पास खाली हाथ गाँव लौटने के सिवाय अन्य कोई चारा नहीं था। गाँव वाली हवेली जिसमें मेरे माँ बाप रहते थे, वह मेरे पिता ने अलग होकर खुद बनवाई थी, क्योंकि मोगा का कारोबार साझा होने के बावजूद गाँव शहणे के घरों की तकसीम बहुत समय पहले ही हो चुकी थी। इसलिए शहणे वाली हवेली में मेरे ताया-चाचा का कोई दख़ल नहीं था। गाँव आकर मेरे पिता ने कारोबार तो चला लिया, पर उसके संग हुई ठगी का गम उसे अन्दर ही अन्दर खाये जाता था। चाचा कुलवंत और अमर नाथ के विरुद्ध मेरे पिता ने अदालत में दावा कर दिया। बारा नरैणा मल जिसे मैं हद दरजे का मूर्ख समझता हूँ, बिना किसी दलील के कुलवंत के हक में खड़ा था। संभव है कि दूसरे विवाह की औलाद होने के कारण बाबा कुलवंत से झेंपता हो। चाचा कुलवंत और अमर नाथ को मुकदमा हारने का पूरा डर था। इसलिए उन्होंने हमारे पुरोहित मदन लाल को भरोसा दिलाया कि यदि हम मुकदमा वापस ले लें तो वे सोना वापस कर देंगे। मेरा पिता उनकी बातों में आ गया जिसका परिणाम यह निकला कि मुकदमा वापस लेने के बाद चाचा और अमर नाथ दोनों सोना देने से साफ़ मुकर गए। इस बात की शर्मिन्दगी मेरे पिता को तो होनी ही थी, हमारे पुरोहित जी भी बड़े दुखी थे।&lt;br /&gt;तपा मंडी वाला दुकान-अहाता मेरे पिता के नाम था, वैसे था मेरे पिता और उसके तीनों भाइयों का साझा। यह दुकान-अहाता सरकारी बोली में मेरे पिता ने उस वक्त लिया था, जब बाबा की जायदाद का कोई बँटवारा नहीं हुआ था और बाबा की सारी औलाद की रोटी भी एक जगह पर पकती थी। दुकान-अहाता मेरे पिता के नाम होने का पुरोहित जी को पता था। इसलिए उसकी सलाह पर मेरे पिता ने गाँव वाली हवेली को ताला लगाया और तपा वाले दुकान-अहाते पर कब्ज़ा कर लिया। सोने की ठगी के बाद तपा वाले दुकान-अहाते पर कब्ज़ा करना समझो मेरे पिता द्वारा की गई ठगी थी।&lt;br /&gt;बाई चमन लाल को सारी सच्चाई का पता था। इसलिए वह हमारे पक्ष में रहा, बाबा की मौत के पहले भी और पीछे भी। पर जब चकबन्दी होने के बाद शहणे वाली हमारी सारी ज़मीन सरकारी काग़ज़ों में बँट गई तो चाचा कुलवंत के लिए यह बात असहय थी। एक तो इसलिए कि सोना तो खाया-पिया गया और सोने वाली ठगी को चाचा और अमरनाथ दोनों भूल चुके होंगे। दूसरे चाचा कुलवंत का ज़मीन की आमदन के बग़ैर अन्य कोई कारोबार ही नहीं था, जिस कारण तीसरी ठगी रचाने के लिए चाचा कुलवंत और अमर नाथ ने बुआ गणेशी की जा शरण ली। गाँव शहणे में हम पालीके कहलाते थे। पाली राम और घनैया मल दो भाई थे। घनैया मल के आगे दो बेटे थे- गंगा राम और नरैणा मल। हम नरैणा मल की औलाद हैं, पर खानदान का नाम पाली राम के बड़े होने के कारण उसके नाम पर ही चलता था। सोने और जायदाद के मामले में पाली राम की औलाद घनैया मल की औलाद से अधिक नहीं तो आठ-दस गुणा अधिक जायदाद की मालिक थी, सोना भी अधिक और ज़मीन भी।&lt;br /&gt;मेरी होश में मेरे बाबा नरैणा मल के पास जो ज़मीन थी, उसके चार टुकड़े थे। कुएं वाली चार एकड़ और घोड़ियों वाली दो एकड़ थी। कलेर वाली चार एकड़ से कुछ अधिक थी और नीलों वाली पुरानी बंजर चार एकड़ से थोड़ी सी कम। चकबन्दी में घोड़ियों वाली का मूल्य चौदह आने, कुएं वाली का दस आने, कलेर वाली का छह आने और नीलों वाली बंजर ज़मीन का दो आने पड़ा था। इन ज़मीनों के नामों की पृष्ठभूमि का मुझे कुछ भी पता नहीं। बस, कुएं वाली ज़मीन के बारे में सिर्फ़ यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसमें कुआँ होने के कारण उसका नाम कुएं वाली ज़मीन पड़ गया होगा। यह कुआँ भी बाई चमन लाल और मेरे पिता ने अपनी जवानी के समय बनवाया था। यह बात माँ बताया करती थी।&lt;br /&gt;यह सारी ज़मीन चौदह-पन्द्रह एकड़ बनती थी। इन चारों टुकड़ों में से चौथा-चौथा हिस्सा मेरे बाबा के चारों बेटों या उनकी औलाद के नाम चढ़ गया था। ऐसा होने से चाचा कुलवंत राय का बेचैन होना स्वाभाविक था। हंस राज और अमर नाथ पहले दिन से ही चाचा के साथ थे और बुआ गणेशी उनकी पीठ पर थी। इसलिए बुआ ने मेरे भाई को यह जतलाने की कोशिश की कि यह ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़े किसी काम नहीं आएँगे, साथ ही तपा वाला दुकान अहाता भी इस बहाने तुम्हारे हिस्से पड़ जाएगा। भाई मान गया। मैं उस समय नाबालिग था। मेरे न चाहते हुए भी मुझे गाँव ले गए। पता नहीं क्यों मुझे बुआ का यह फ़ैसला कतई नहीं जंचा था। लिखत में बाई चमन लाल और हम दोनों भाइयों को दो एकड़ घोड़ियों वाली ज़मीन और चाचा कुलवंत तथा ताया बाला राम की औलाद को कुएं वाली चार एकड़ ज़मीन दी गई। नीलों वाली बंजर भूमि चकबन्दी के विभाजन के अनुसार रख दी गई। कलेर वाली ज़मीन भी चाचा कुलवंत और बाला राम की औलाद के हिस्से डाल दी, क्योंकि यह ज़मीन मेरा बाबा नरैणा मल किसी वक्त चाचा के बेटे केवल कृष्ण के पास गिरवी रख गया था। असल में लिया-दिया कुछ नहीं था। चाचा कुलवंत ने डरा कर यह चार एकड़ से अधिक ज़मीन अपने लड़के के नाम गिरवी करवा ली थी। यह बात हमें बाबा ने उस समय बताई थी जब वह हमारे पास तपा में आकर रहने लग पड़ा था। बँटवारे की इस लिखत के कारण गिरवी वाला काग़ज़ फाड़ कर चाचा कुलवंत, हंस राज और अमर नाथ सुर्खरू हो गए थे। गाँव वाला वाड़ा जो पहले ही हमारे और हंस आदि के नाम था और चकबन्दी में भी वैसे ही चढ़ा दिया गया। तपा वाला दुकान अहाता और गाँव वाली हमारी हवेली हमारे हिस्से और बाकी गाँव वाली सारी रिहाइशी जगहें, जिसका जितना भी कब्ज़ा था, उन सबके हिस्से में डाल दी गईं।&lt;br /&gt;लिखत पर दस्तख़त के समय मेरा मन पूरी तरह बुझा हुआ था। सरकारी तौर पर बांटी गई ज़मीन और गाँव वाली हवेली और तपा वाला दुकान अहाता जो मेरे पिता के नाम ही था, उसका बँटवारा इन काग़ज़ों में डालना और पन्द्रह एकड़ ज़मीन में से सिर्फ़ दो एकड़ से भी कम ज़मीन स्वीकार कर लेना, भला कहाँ की समझदारी थी। यह भाई का डरपोक स्वभाव था या उसका सज्जन होना, या फिर उसे तपा वाले दुकान अहाते पर बाबा की औलाद में से किसी द्वारा दावा करने का डर था कि वह उस लिखत पर दस्तख़त करके मानो संतुष्ट हो गया हो। असल में, एक बार फिर हमारे संग ठगी हो गई थी। हमारे साथ नहीं, असल में यह ठगी मेरे साथ हुई थी। इस बात का अहसास मुझे तब हुआ जब गाँव वाली हवेली बेचकर तपा वाली गिरवी रखी दुकान छुड़वा ली गई थी और फिर 1971 में मेरे भाई ने मेरे साथ बँटवारा करते समय गाँव वाली जायदाद मेरे हिस्से में डाल दी और तपा वाला दुकान अहाता खुद रख लिया।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तबादला रद्द होने के बाद सरदूलगढ़ से पुन: महिता में 6 अगस्त 1971 को लौट आने के उपरांत वही ताया मथरा दास के मकान में किराये पर रहना और वही किरायेदारी वाली हीनभावना, ससुराल वालों के सामने शर्मिन्दगी, आँखों की रोशनी खत्म होते जाने की चिंता और वही नौकरी से निकाल दिये जाने का दैत्य समान भय। मैं इतना बेचैन रहने लग पड़ा था कि जीने को भी जी नहीं करता था। यह भी कोई ज़िन्दगी है ? आँखें जवाब देती जा रही हैं, भाई का रब जैसा आसरा ठोकर में बदल गया है। सब बहनें और बहनोइये बहरे-गूंगे बन गए हैं। सल्हीणे वाली बहन और बहनोई भाई की तरफ हैं। तपा मंडी में भाई के सब दोस्त-यार या तो भाई के हक में थे या चुप थे। जब इस सब कुछ का अनुभव मुझे होता, मैं काँप जाता।&lt;br /&gt;बँटवारे में मिली ज़मीन जो बेचनी आसान थी, नई लिखत के बाद उसको बेचना भी कठिन हो गया। घोड़ियों वाली ज़मीन में सरकारी काग़ज़ों के अनुसार जैसा कि मैंने पहले बताया है, हम दोनों भाइयों का आधा एकड़ था। अब इस ज़मीन में से नई लिखत के अनुसार एक एकड़ हम दोनों भाइयों का और एक एकड़ बाई चमन लाल का था। बाई चमन लाल की मृत्यु और उससे पहले उसके दोनों पुत्रों की मृत्यु के कारण सारी ज़मीन आगे बाई चमन लाल के पोते और पोतियों के नाम चढ़नी थी और पोते-पोतियों की संख्या थी दस। अब अगर तपा मंडी की गली नंबर 8 में मेरे हिस्से आए प्लाट में सिर ढकने के लिए मुझे दो कमरे बनाने थे तो मेरे लिए गाँव वाली ज़मीन का झंझट खत्म करना ज़रूरी था।&lt;br /&gt;गाँव वाली ज़मीन को बेचने की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि बाई चमन लाल के पोते-पोतियों को बरनाला से कैसे लाया जाए। दस लोगों के हिस्से में भला गाँव की इस ज़मीन के बँटवारे में से आना भी क्या था। वैसे भी चार पोतियों ने सिर्फ़ दस्तख़त ही करने थे, पैसे उनके भाइयों ने ले लेने थे। इसलिए उन्हें क्या दिलचस्पी हो सकती थी। हंस राज और अमर नाथ आर्थिक तौर पर भी मजबूत थे और दोनों भाइयों की बनती भी अच्छी थी। इसलिए उन्हें ज़मीन बेचने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वैसे भी, वे पहली मोगा वाली ठगी के कारण बुआ गणेशी के प्रभाव के तले थे और अपनी वाली ज़मीन का कर्ताधर्ता चाचा कुलवंत को बना रखा था। चाचा कुलवंत को तो ज़मीन बेचने में बिलकुल भी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसका तो रोटी भी गाँव की ज़मीन के सिर पर चलती थी।&lt;br /&gt;बुआ गणेशी की नई ठगी ने उसके सगे भाई कुलवंत की रोटी-पानी का पक्का प्रबंध कर दिया था, पर वह यह भूल गई थी कि वह अपने अंधे होते जा रहे भतीजे के साथ कितना बड़ा अन्याय कर रही है। ताया मथरा दास का किरायेदार होना और अपने घर के निर्माण के लिए कोई रास्ता न बनना, यह चिन्ता मुझे और मेरी पत्नी को भीतर तक खाये जाती। ऊपर से सितम यह कि मुझ पर कामरेडी का पूरा ठप्पा लग गया था और यदि मैं टीचर्स यूनियन या कर्मचारी फेडरेशन में न भी काम करता तो भी तपा मंडी के अकड़बाज लाला मेरे ही विरुद्ध रहते। इसलिए एक तो अपनी सोच के कारण और दूसरा तपा मंडी के कुछ धाकड़ ब्लैकिये लालाओं और आवारा कांग्रेसी लीडरों के कारण मेरा टीचर्स यूनियन और कर्मचारी फेडरेशन में काम करना ज़रूरी बन गया था। नक्सली आंदोलन के कारण भी मेरे नक्सली न होने के बावजूद मेरा स्वभाव नक्सलबाड़ियों जैसा था। इसलिए अफ़सर और मंडी के दो मुक्केबाज-से कांग्रेसी लीडर मेरे विरुद्ध थे और फ़र्जी नामों के तहत मेरे विरुद्ध मेरी आँखों की रोशनी कम होने की शिकायत करके मुझे सरकारी नौकरी से निकलवाने की कोशिश में थे। जैसा कि मैंने पहले बताया है कि शिकायतों का यह सिलसिला सरकारी मिडल स्कूल, महिता से ही आरंभ हो गया था। पर मैं इन शिकायतों की अधिक परवाह नहीं करता था। मेरी माँ, बहनों, रिश्तेदारों-संबंधियों और कुछ अन्य समझदार कहलाने वाले मेरे हितैषियों द्वारा शिकायतबाज़ों की मिन्नत-खुशामद करके दिन काटने वाली शिक्षा मुझे एक चक्रव्यूह जैसी लगती।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुआ गणेशी के चक्रव्यूह में से निकलने की कोई भी राह नहीं बन रही थी। शहणे वाली ज़मीन को बेचे बग़ैर भाई की ओर से दिए 8 नंबर गली वाले प्लाट में मकान बनाया भी नहीं जा सकता था। सरकारी कर्ज़ा लेने में कम से कम दो-तीन वर्ष लग जाने थे।&lt;br /&gt;एक दिन मेरे मन में जो योजना आई, वह ठगों को ठगने वाली योजना थी। इस योजना को मैं अपनी पत्नी को छोड़कर अन्य किसी से साझा नहीं कर सकता था। बुआ के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए बुआ के घर में दरार डालनी ज़रूरी थी। सोच विचार कर रात के समय इस दरार की सारी गाँठ मैंने अपनी पत्नी के सम्मुख खोल दी।&lt;br /&gt;''वो फिर असली काग़ज़ दे देंगे ?'' सुदर्शना देवी को मेरी बात में अधिक वजन नहीं लगता था।&lt;br /&gt;''साधू अगर पुत्र नहीं देगा, औरत तो नहीं रख लेगा।'' मुझे भी अपनी योजना की सफलता पर पूरा भरोसा था। वैसे भी, मैं ऐसा करने से डरता था जैसे कोई भलामानुष कोई ठगी करते समय डरा करता है। लेकिन, मैंने अपने मन को अन्दर ही अन्दर यह कहकर समझा लिया कि बुआ ने भी हमारे संग ठगी ही करवाई है। यदि मैं ठगी कर लूँगा तो फिर कौन सा विक्रमाजीत का सिंहासन डोल जाएगा। यह सब सोचते हुए मैं अगले दिन मोगे वाली बस में चढ़ गया।&lt;br /&gt;शीला बहन के बड़े बेटे विजय कुमार को बुआ गणेशी के घर जाने के लिए कहा और उसे आधी बात बताकर संग जाने के लिए मना लिया। जब बुआ के घर पहुँचे तो वहाँ बुआ का बेटा वेद प्रकाश घर में मिल गया। उसे जिस ढंग और आदर के साथ मैंने चरण स्पर्श किया, समझो वह फूल कर कुप्पा हो गया। नाक फुलाता हुआ कहने लगा, ''हाँ बता, तेरी निगाह का अब क्या हाल है ?''&lt;br /&gt;मुझे उस दिन उसके शब्दों में पहली बार अपनापन और हमदर्दी झलकी थी।&lt;br /&gt;''वीर जी, निगाह तो समझो ना के बराबर ही है, बस धूप-छांव का पता चलता है।'' मेरी आह निकल आई, मन भी भर आया। कुछ पल मैं कुछ न बोला।&lt;br /&gt;''दिल थोड़ा न कर तरसेम, विपदा तो राजा-रानियों पर भी पड़ती आई है। जिसने विपदा दी है, वह दूर भी करेगा।'' भाभी (वेद प्रकाश की पत्नी) मेज़ पर चाय रखते हुए बोली। यूँ लगता था जैसे वेद प्रकाश और अधिक पसीज गया हो। वह और अधिक हमदर्दी वाली बातें करने लग पड़ा। मैंने उसे अपने आने का कारण बताया। असली शहणे वाली लिखत बुआ के पास ही थी। मैं वो लिखत ही लेने गया था। वेद प्रकाश ने पाँच-सात मिनट के बाद अन्दर कहीं से असली लिखत लाकर मुझे पकड़ा दी और कहा-&lt;br /&gt;''ले, तेरा मेरा धर्म है, मैंने माँ से नहीं पूछा, इसकी नकल करवाकर विजय कुमार के हाथ लौटा देना।'' लिखत लेकर मुझे यूँ लगा मानो मैं कृष्ण की भूमिका निभाने में सफल हो गया होऊँ। कृष्ण ने तो कर्ण से तीर मांगने के बाद एक तीर उसकी इच्छानुसार उसके पास छोड़ दिया था, जिससे उसे अर्जुन को मारना था (महाभारत के अनुसार उस तीर से अर्जुन के स्थान पर युद्धभूमि में तबाही मचा रहे घटोत्कच को ही कर्ण निशाना बना सका और खाली हो गया)। लेकिन मैं तो एक भी तीर बुआ गणेशी के पास छोड़कर नहीं आया था, न असली और न नकली। समझो, शहणे में चाचा कुलवंत, हंसराज और अमर नाथ के साथ बुआ गणेशी की हाज़िरी में हुए समझौते का मुद्दा ही उनके पास नहीं रहने दिया था। यद्यपि नैतिक पक्ष से यह एक ठगी थी, पर हमारे साथ भी बुआ ने ठगी ही की थी, हमारे साथ नहीं बल्कि मेरे साथ।&lt;br /&gt;पत्नी सुदर्शना देवी के हाथ में वह लिखत देते हुए मैंने हँस कर कहा-&lt;br /&gt;''साधू से औरत तो ले आया, देखना अब शायद पुत्र भी हो जाए।'' पर सुदर्शना देवी बहुत डर रही थी। उसे भय था कि कहीं कुलवंत चाचा कोई चोट ही न मार दे या हंस राज जो कि उन दिनों युनाइटिड कमर्शियल बैंक, अमृतसर का एक उच्च अफ़सर था, अपने रसूख से किसी केस में ही न उलझा दे। लेकिन उलाहनों, शिकायतों के अलावा अन्य कुछ भी नहीं हुआ था।&lt;br /&gt;हाँ, चाचा कुलवंत और ताया के इन दोनों पुत्रों के संग हमारी बोलचाल समझो खत्म हो गई। लेकिन आठ-दस साल बाद चाचा कुलवंत के मोगा में आ जाने और उसके पुत्र केवल कृष्ण के स्वभाव में परिवर्तन आ जाने के कारण हमने फिर से आना-जाना आरंभ कर दिया।&lt;br /&gt;असली दस्तावेज़ हाथ लगने के साथ अब वह कुएं वाली और कलेर वाली ज़मीन बेचने योग्य बिलकुल नहीं रहे थे। जो इस समझौते के अनुसार सारी की सारी उनके हिस्से में डाल दी गई थी। पर एक जख्म आज भी मेरे अन्दर चसक रहा है कि की किसने और भुगतनी किसको पड़ीं। थी तो यह भी एक ठगी ही जो मुझे विवश होकर करनी पड़ी थी।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-6308214555839016985?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/6308214555839016985/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=6308214555839016985&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/6308214555839016985'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/6308214555839016985'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='आत्मकथा'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/-Db7hliVeoCY/TtI8khHGsbI/AAAAAAAAAPk/CNJPqwXDEQQ/s220/Photo006821.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-1sPcXYutOkc/TkeCVF4TZgI/AAAAAAAAANw/jc13cSBSTt0/s72-c/monson-photos-040711-82.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4235713353102640102.post-1958680503307035879</id><published>2011-07-23T12:52:00.001+05:30</published><updated>2011-07-25T12:59:43.148+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साउथाल(उपन्यास)- हरजीत अटवाल'/><title type='text'>पंजाबी उपन्यास</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-80rvx-3YzzQ/Ti0aUaycLnI/AAAAAAAAANg/1tgf-vU14uI/s1600/monson-photos-040711-82.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5633187647000948338" style="WIDTH: 146px; CURSOR: hand; HEIGHT: 123px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-80rvx-3YzzQ/Ti0aUaycLnI/AAAAAAAAANg/1tgf-vU14uI/s320/monson-photos-040711-82.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-fAzsdybVfsA/Ti0ad-uvAVI/AAAAAAAAANo/_O4x11rSSZ4/s1600/Southall.JPG"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5633187811267903826" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 147px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-fAzsdybVfsA/Ti0ad-uvAVI/AAAAAAAAANo/_O4x11rSSZ4/s320/Southall.JPG" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/a&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt; उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़ कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ffff00;"&gt;साउथाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;हरजीत अटवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ffcc33;"&gt;।। पच्चीस ॥&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह का काम बहुत अच्छा चल निकला है। अब दस-बारह मर्द-औरतें तो अन्दर ही काम करते हैं। दो ड्राइवर माल देने के लिए हैं। स्वयं वह ऊपर के कामों पर रहता है। कभी एप्रेन या ओवरआल पहनकर दाढ़ी पर जाली लगाकर खुद भी काम करने आ लगता है और कभी कार या वैन उठाकर शॉपिंग करने चला जाता है। यदि कोई ड्राइवर छुट्टी पर हो तो डिलीवरी खुद कर आता है। लड़कियों को छुट्टी हो तो वे फैक्टरी में आ जाती हैं। बलराम अब यूनिवर्सिटी जाता है। बड़ी बेटी सतिंदर ग्रीनफोर्ड हाई स्कूल में ए-लेवल करती है। छोटी पवनदीप जी.सी.एस.ई. कर रही है। राजविंदर अभी भी खाली ही है। घर के काम से उसको नफ़रत-सी है और कहीं दूसरी जगह काम खोजने की उसने कभी कोशिश ही नहीं की।&lt;br /&gt;कुछ वर्षों में ही प्रदुमण सिंह ने अपने पैर अच्छी तरह जमा लिए हैं। दो राउंड खड़े कर लिए हैं। हर रोज़ काम बढ़ाता चला जाता है। कई और लोग लंदन में समोसे डिलीवर करने लग पड़े हैं और वे माल प्रदुमण् सिंह से उठाते हैं। बड़े-बड़े रेस्ट्रोरेंट भी उससे समोसे लेने लग पड़े हैं। समोसों के साथ उसने पकौड़े भी बनाने शुरू कर दिए हैं। पकौड़ियों को ओनियन भाजी का नाम दे दिया है जो कि मशहूर हो गया है। साथ ही साथ, स्प्रिंग रोल और करी रोल भी बनाने लगा है। अब वह हर चीज़ को पैकेट में बन्द करने लग पड़ा है। हर पैकेट के ऊपर पूरा लेबल लगा होता है। उस पर बेचने की अन्तिम तिथि पड़ी होती है। लेबल पर उसकी कम्पनी का नाम 'हैव ए बाइट' होता है। उसका यह नाम अब स्थापित हो चुका है। लेबल बनाने के लिए उसने कम्प्यूटर खरीद लिया है। इसी तरह बिल भी अब वह कम्प्यूटर से ही निकालता है। समय के बदलाव के साथ उसने फैक्टरी में कम्प्यूटरों का प्रयोग करना आरंभ कर दिया है। कम्प्यूटर पर काम करने के लिए अस्थाई तौर पर एक लड़की रख लेता है, पर फिर वह स्वयं ही गुजारे लायक कम्प्यूटर चलाना सीख लेता है। कम्प्यूटर के काम के लिए बलराम या लड़कियाँ भी आ जाती हैं।&lt;br /&gt;बलबीर और गुरमीत, दो ड्राइवर हैं उसके पास। पाँच दिन समोसे डिलीवर करते हैं और दो दिन फैक्टरी में काम करवाते हैं। ये दोनों ही फौजी हैं। 'फौजी' शब्द गैर-कानूनी प्रवासियों के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा है। इन दोनों के केस उसने सुरमुख संधू से करवाये हुए हैं। उसकी कोशिश है कि केसों की कार्रवाई या इनकी स्टेज के बारे में इन दोनों को अधिक पता न चले। वह अहसान के तले दबे जी-जान से काम कर रहे हैं। केस चलते हो जाने से कानूनन वे ड्राइविंग टैस्ट पास करके वैन भी चला सकते हैं। उन्हें दौड़-दौड़कर काम करते देख प्रदुमण सिंह सोचने लगता है कि यदि उसका अपना बेटा राजविंदर किसी काम योग्य होता तो उसको कितनी मदद हो जाती।&lt;br /&gt;बलबीर और गुरमीत कितना भी ईमानदारी से काम करते हैं, पर प्रदुमण सिंह उन पर यकीन नहीं करता। डिलीवरी के काम में काफी सारी नगद रकम एकत्र करनी होती है। कुछ दुकानदार हफ्ते बाद बिल देते हैं और कुछ रोज़ की रोज़। हफ्ते बाद वाले बिल में हेराफेरी के मौके कम होते हैं, पर कैश डिलीवरी में ड्राइवर हेराफेरी कर सकते हैं। गुरमीत और बलबीर हेराफेरी करते हैं या नहीं, पर प्रदुमण सिंह को हर समय शक लगा रहता है। कई बार तो इतना शक करने लगता है कि उनकी जेबें टटोलने लग पड़ता है। यदि वे गुस्सा हो जाएँ तो फिर 'बेटा-बेटा' करता फिरता है। वह जानता है कि उनके बग़ैर उसका काम नहीं चलेगा। ड्राइवर भी उसके इस तरह आदी हो चुके हैं कि छोटी-मोटी बात का गुस्सा करना उन्होंने छोड़ दिया है, पर दांव लगे तो हेराफेरी करने से नहीं झिझकते। फिर बाद में शेखियाँ मारते हुए बताते हैं कि आज मैंने इतने निकाले और आज फलाने ने इतने। शाम को इकट्ठा होकर बोतल भी खरीदते हैं और हँसते हुए कहने लगते हैं कि मजे लेकर पियो, यह अंकल की शराब है। मतलब कि चोरी किए गए पौंडों की खरीदी हुई शराब। शाम को एक-दूजे को मज़ाक करते हुए पूछते हैं कि आज अंकल की पिला रहा है व्हिस्की या बरांडी।&lt;br /&gt;फैक्टरी में काम करती औरतों पर ज्ञान कौर पूरा रौब रखती है। ब्रेक बहुत कम देती है। किसी को एक मिनट के लिए भी फालतू नहीं बैठने देती। वैसे तो अब साउथॉल में 'गुड मोर्निंग रेडियो' शुरू हो चुका है जो कि सारा दिन चलता रहता है। परन्तु, बीच-बीच में वे टेप भी चला लेते हैं। यदि काम करने वाली औरतें काम में ढीली पड़ने लगें तो वह संगीत बन्द कर देती है जो कि सभी को तकलीफ़देह लगता है।&lt;br /&gt;कुलजीत प्रदुमण को अभी भी याद आती है। कुलजीत गई तो उसको नीरू फिर याद आने लगती है। वह कभी-कभी नीरू को फोन कर लिया करता है, पर उससे भारत नहीं जाया जाता। ज्ञान कौर इंडिया हो आई है। जितना समय कुलजीत उसके साथ घूमती रही है, वह जैसे हवा में उड़ता रहा हो। जवान लड़की को कार में बिठाकर साउथाल का चक्कर लगाना उसको अच्छा लगता है। कुलजीत को लेकर कई बार कारा से मिलने भी चला जाता। कुलजीत स्थायी हो जाने पर बदल जाती है। एक दिन वह उससे कहती है-&lt;br /&gt;''अंकल, अब मुझे अपनी ज़िन्दगी नये सिरे से शुरू करनी है, तुम मेरी क्या मदद कर सकते हो ?''&lt;br /&gt;''बता, मैं क्या करूँ ?''&lt;br /&gt;''मैंने एक फ्लैट देखा है, बहुत सस्ता बिक रहा है।''&lt;br /&gt;''कुलजीत कौर, मैं फ्लैट वाला बन्दा नहीं। मैं तुझे शुभकामनाएँ दे सकता हूँ।''&lt;br /&gt;''इतनी देर की दोस्ती और पेट घिसाई किस काम आई !''&lt;br /&gt;''यह मुहब्बत थी या सहूलियत, तू ही बता।''&lt;br /&gt;''तुम्हारी पूरी इज्ज़त इस पर खड़ी है।''&lt;br /&gt;एक मिनट के लिए प्रदुमण सिंह डोलता है और फिर कहता है-&lt;br /&gt;''इश्क में ब्लैकमेल नहीं किया करते।''&lt;br /&gt;''तुमने मुझे ब्लैकमेल किया इतने समय, मैंने तो सिर्फ़ मदद ही मांगी है। यदि आंटी को तुम्हारे बारे में पता चल जाए तो क्या हो !''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह थोड़ा-सा हँसता है और बोलता है-&lt;br /&gt;''कुलजीत कौर, मैंने तो सोचा था कि तू सयानी लड़की होगी, तू तो इतना भी नहीं सोच सकती कि मैं तुझे सरेआम लिए घूमता हूँ और उसको अभी तक पता ही नहीं होगा। अगर अभी भी समझदारी बरतनी है तो ये डराना-धमकाना छोड़ और मेरे साथ दोस्ती रख, किसी वक्त काम आऊँगा।''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह बात करते हुए सोचता है कि यह तो बहुत खतरनाक लड़की है। एक दिन वह ज्ञान कौर के कंधे पर बन्दूक रखकर चला देता है। कुलजीत को काम पर से हटा देता है।&lt;br /&gt;कुलजीत से वह अन्दर ही अन्दर प्यार करने लगता है। उससे टूटने पर कुछेक दिन उसका मन उदास रहता है, पर उसको तसल्ली भी है कि पीछा छूटा, किसी वक्त मुसीबत में भी डाल सकती थी। कुछ दिनों के बाद नई आई शिंदर कौर से दोस्ती गांठ लेता है, पर एक दूरी रखता है। और भी ज़रूरतमंद औरतों पर उसकी नज़र घूमती रहती है।&lt;br /&gt;वैसे तो प्रदुमण सिंह काफी खुश रहता है, पर बड़े बेटे की चिन्ता उसके मन में कंकड़ की भाँति चुभती रहती है हर समय। पढ़ाई में भी वह किसी किनारे नहीं लगा। काम करने का भी उसका कोई इरादा नहीं है। राजविंदर पूरा ड्राइवर है, पर कोई वैन कभी नहीं चलाता। कार को भी जब ज़रूरत हो तो ले जाता है। यदि प्रदुमण झिड़क देता है तो वह रूठकर घर से चला जाता है और एक दो दिन बाहर रह कर लौट आता है। अब उसको यह भी नहीं कि राजविंदर ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। वह सोचता है कि कौन सी सारी दुनिया डिग्रियाँ लिए घूमती है। कारा अनपढ़-सा ही है और इतना बड़ा इंश्योरेंस का काम चलाये फिरता है। इतना ज़रूर है कि पढ़ाई के बग़ैर आजकल काम कम ही मिलते हैं, पर राजविंदर तो घर का काम ही नहीं कर रहा, बाहर तो उसने क्या करना है। ज्ञान कौर भी राजविंदर को समझाने लगती है, पर वह नहीं समझता।&lt;br /&gt;एक दिन प्रदुमण सिंह कहने लगता है।&lt;br /&gt;''खाली बैठकर टाइम न खराब कर, फैक्टरी में आकर हमारी हैल्प कर, तुझे पूरी तनख्वाह देंगे।''&lt;br /&gt;''मैंने मम्मी को टैल किया था कि मुझे कुकिंग से एलर्जी है।''&lt;br /&gt;''ड्राइविंग कर ले।''&lt;br /&gt;''ड्राइविंग मुझे प्रैशर देती है।''&lt;br /&gt;''कोई और जॉब ढूँढ़ ले।''&lt;br /&gt;''मेरे लायक जॉब मिलेगी तभी करूँगा।''&lt;br /&gt;''तेरे लायक जॉब... तूने क्या अब बैंक मैनेजर लगना है।''&lt;br /&gt;''डैड, यू आलवेज़ अंडरएस्टीमेट मी।''&lt;br /&gt;''एस्टीमेट तो तेरा मैं ठीक कर रहा हूँ, तेरा घर में से कोई पैसा मिलना बन्द, डोल मनी पर ही गुजारा कर।''&lt;br /&gt;''पहले भी डैड, तू कभी कुछ नहीं देता। मॉम भी पूरा नहीं देती, दैट'स इट।''&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह ज्ञान कौर को भी समझाता है कि उसको जेब खर्च देना बन्द करे। ज्ञान कौर बेटे से कहने लगती है-&lt;br /&gt;''काका, काम करेगा तो अच्छी जगह ब्याहा जाएगा।''&lt;br /&gt;ज्ञान कौर को अब उसके विवाह की चिन्ता होने लगी है। वह अपने पति से कहती है-&lt;br /&gt;''मैं तो सोचती हूँ कि इसका विवाह कर दें। बेगानी लड़की अपने आप सीधा कर देगी इसे।''&lt;br /&gt;''पहले तो हम इसका बोझ उठाते हैं, फिर उस लड़की का भी उठाएँगे।''&lt;br /&gt;''क्या मालूम, ठीक ही हो जाए।''&lt;br /&gt;''थोड़ा बहुत तो लगे कि यह काम करना चाहता है। साला सवेरे निकल जाता है और आधी रात को लौटता है। अवारा घूमता रहता है।''&lt;br /&gt;''कहीं कोई गोरी-काली ही न ले आए।''&lt;br /&gt;ज्ञान कौर डरती हुई कहती है।&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह को भी इस बात की चिन्ता है कि यदि उसने गलत कदम उठा लिया कि कोई गर्ल फ्रेंड रख ली तो इसका असर लड़कियों पर भी पड़ सकता है और बलराम पर भी। फिर वह गम्भीरता से सोचता है तो देखता है कि इतना समय हो गया, उसको यूँ आते-जाते आज तक उसके साथ कोई लड़की नहीं देखी। उसे एकाएक ख़याल आता है कि कहीं वह गे ही न बन जाए। वह जानता है कि आजकल गे बनने की प्रवृत्ति बहुत फैल रही है। गे बनने की प्रवृत्ति के पीछे कारण यही हैं कि एक तो औरत की बहुलता और दूसरा औरत का न मिलना। कई बार बुरे साथ का भी असर हो जाता है। उसे लगता है कि राजविंदर सारा दिन लड़कों के संग रहता है और गे रुझान का लड़का ही उसको इस ओर लगा सकता है। यह सब सोचते हुए वह राजविंदर के बारे में और अधिक चिन्तित होने लगता है।&lt;br /&gt;उस दिन राजविंदर देर से घर लौटता है। प्रदुमण सिंह बैठा उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। नहीं तो इतनी देर तक वह जागा नहीं करता। सुबह जल्दी उठने के कारण अब तक सो जाया करता है। वह राज को अपने पास बुलाता है। बैठने के लिए कहता है और पूछता है-&lt;br /&gt;''ड्रिंक लेगा एक ?''&lt;br /&gt;''नहीं डैड, मैं तो सोना चाहता हूँ।''&lt;br /&gt;''बात सुन, तेरे पास गर्ल फ्रेंड क्यों नहीं कोई ?''&lt;br /&gt;''डैड, तेरे पास जो है, फिर मुझे क्या करनी है।'' राजविंदर कहता है।&lt;br /&gt;प्रदुमण सिंह डरता हुआ रसोई की तरफ देखने लगता है जहाँ ज्ञान कौर बर्तन मांज रही है। प्रदुमण सिंह फिर कहता है-&lt;br /&gt;''मैं चाहता हूँ कि तू कोई लड़की ढूँढ़ ले।''&lt;br /&gt;''डैड, लड़कियाँ पैसे से मिलती है और पैसे मेरे पास है नहीं।''&lt;br /&gt;''पैसों के लिए कोई काम कर, कोई जॉब तलाश कर।''&lt;br /&gt;''मैं तो बहुत ट्राई करता हूँ। अपने फ्रेंड के साथ एअरपोर्ट भी गया था, पर मिली नहीं।''&lt;br /&gt;''तू कारा के साथ इंश्योरेंस का काम क्यों नहीं सीखने लग जाता ?''&lt;br /&gt;''नो डैड, कारा अंकल टॉक फनी।''&lt;br /&gt;''काम भी खोज और गर्ल फ्रेंड भी खोज।''&lt;br /&gt;''गर्ल फ्रेंड तो मनी से मिलेगी।''&lt;br /&gt;''तुझे कौन कहता है, ये जो लड़के लड़कियों को संग लिए घूमते हैं उनके पास मनी ही होती है।''&lt;br /&gt;''और नहीं तो क्या। डैड लुक एट युअर सैल्फ... यू हैव मनी, दैट'स वाई वुमेन कमिंग टू यू।''&lt;br /&gt;''तुझे कौन बताता है यह बात ?''&lt;br /&gt;''मैं तो कितनी ही बार तुम्हारे साथ औरतें देखता हूँ।''&lt;br /&gt;''वह तो किसी को काम पर से घर छोड़ने जाना या लेने जाना होता है।''&lt;br /&gt;''आई नो, बट दा वे यू बीहेव, दे बीहेव, यू कैन टैल...।''&lt;br /&gt;''तू मेरी बात छोड़, अगली बार तेरे साथ कोई लड़की होनी चाहिए। मैं बहुत वरीड हूँ तेरे लिए।''&lt;br /&gt;''किस बात की वरी है डैड ?''&lt;br /&gt;''कि तू गे न हो जाए।''&lt;br /&gt;''डोंट टॉक रबिश डैड !''&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffcc00;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-1958680503307035879?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/1958680503307035879/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=1958680503307035879&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/1958680503307035879'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/1958680503307035879'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/07/blog-post_23.html' title='पंजाबी उपन्यास'/><author><name>दीप्ति नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/17105871709165087330</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='14' height='32' 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मैं गाँव चला गया। सोम नाथ ने बड़ा आदर-मान किया। मुझे लगा कि मेरा सगा भाई हरबंस लाल नहीं, सोम नाथ है। जब मैंने उसको बँटवारे की सारी कहानी सुनाई और अपने आने का मकसद बताया तो वह कहने लगा-&lt;br /&gt;''देख छोटे भाई, हमने मकान किराये पर कभी किसी को दिया नहीं। बाद में अगला खाली नहीं करता। पड़े हुए मुकदमें लड़ते रहो और फिर फैसले भी तो किरायेदारों के हक में होते हैं। अब तू आया है, तुझे मना नहीं। बाई का कोई बेटा-बेटी तपा वाले हट्ट-हाते में रहा कि चाचा लेख राम का पुत। तू बड़ी खुशी से वहाँ रह सकता है। किराया कुछ नहीं, पर तरसेम शायद तुझे मेरी बात अच्छी न लगे, हरबंस लाल बहुत समझदार आदमी है। उसकी अक्ल को क्या हो गया? उसने कोई अच्छी बात नहीं की। औरतें तो बीस मिल जाया करती हैं, भाई को भाई नहीं मिला करते। और फिर तुम तो राम-लक्ष्मण की जोड़ी हो। बाई जी तुम्हें सोभा और तुलसी कहा करते थे। हरबंस लाल सोभा हुआ और तू तुलसी। सोभा स्वभाव का सज्जन था और तुलसी तीखा। बाई जी हरबंस लाल को तो बहुत ही शरीफ समझते थे और तुझे ज़रा तीखा।'' सोम नाथ की बात सुनते-सुनते मेरा रोना फूट पड़ा था। बहुत नियंत्रण करने पर भी रोना बन्द नहीं हो रहा था।&lt;br /&gt;सोम नाथ ने मेरी पीठ पर हाथ फेरना शुरू किया। ताई चाय लेकर आ गई। सोम नाथ ने सिर्फ़ एक-डेढ़ वाक्य में ही मेरा सारा दुख ताई के आगे रख दिया था और ताई ने भी मुझे दिलासा देते हुए मकान मुझे देने के लिए हामी भर दी। मेरे बार-बार कहने पर तीस रुपये महीना किराया तय हो गया था। घर की चाभी लेकर मैं दिन छिपने से पहले लौट आया था। रात में सामान उठाने और ताया मथरा दास के घर की साफ़-सफाई करने को लेकर सुदर्शना से सलाह-मशवरा करता रहा। मैं बड़ी हीन भावना का शिकार था। एक तरफ तो मेरी नज़र चले जाने का खतरा सिर पर तलवार की भाँति लटक रहा था और दूसरी तरफ घर से बेघर होने की शर्मिन्दगी के कारण मैं अपनी पत्नी के आगे आँखें उठाने योग्य नहीं रहा था। भाई को ताया मथरा दास का घर किराये पर मिलने की ख़बर दे दी थी। उसे यह सुनकर बहुत तसल्ली हुई होगी और भाभी को बहुत खुशी, पर माँ की आँखों में से बहती गंगा के कारण मेरा अपना भी रोना निकल गया था। जब सब नीचे सो गए, माँ दबे पाँव ऊपर चढ़ आई थी। तब माँ की चारपाई ड्योढ़ी में हुआ करती थी। इसलिए माँ के ऊपर हमारे पास आने के बारे में शायद किसी को भी पता चलने की गुंजाइश नहीं थी। माँ चौबारे में सिर्फ़ इसलिए आई थी ताकि वह बता सके कि वह लाचार है। ख़ास तौर पर माँ सुदर्शना को तसल्ली देना चाहती थी और माँ के पास प्रभु पर भरोसा रखने के सिवाय सुदर्शना को समझाने के लिए अन्य कोई दलील नहीं थी। अगले दिन स्कूल से लौटने के बाद सामान उठाने का मन बनाकर मैं एक रेहड़ी वाले को बुला लाया था। घर में सामान उठाने में मदद करने वाला भी कोई नहीं था। क्रांति को माँ के पास बिठा कर हम दोनों पति-पत्नी ने चौबारे पर से सामान नीचे उतारा। रेहड़ी वाले ने भी कुछ मदद की। ड्योढ़ी में पड़ी लकड़ी वगैरह भी रेहड़ी में लाद ली। दिन छिपने के बावजूद अड़ोस-पड़ोस को हमारे घर छोड़ने के बारे में पता चल गया था। हम अपने ही घर में से ऐसे जा रहे थे जैसे कोई किरायेदार किराये के मकान में से किसी दूसरे किराये के मकान में जा रहा हो। पत्नी सुबह ही मेरे स्कूल चले जाने पर ताया मथरा दास के मकान की सफाई और झाड़-पोंछ कर आई थी। वहाँ हमें ड्योढ़ी और साथ में सटा गली नंबर 7 में खुलने वाला एक कमरा, रसोई और आँगन मिला था। सभी कमरों और दुकानों पर ताया मथरा दास के परिवार की ओर से लगाये गए तालों को हमने हाथ लगाकर भी नहीं देखा था। हमें डर था कि कहीं हमारे कारण दुकानों और शेष कमरों में पड़े सामान का कोई नुकसान न हो जाए। इसलिए हम दोहरे अहाते के बाकी कमरों की ओर झांकने से भी डरते थे।&lt;br /&gt;शेष बचा सामान जब मैं सामान बाल्टी में रख रहा था, मुझे किसी ने नहीं बुलाया था। मैंने भी माँ को छोड़कर किसी से बात नहीं की थी। शायद, मकान मालिक भी किसी किरायेदार से संग ऐसा बर्ताव न करता हो, जैसा मेरे संग हो रहा था। जब अपने भाई के दोस्त श्रीमान हरी चन्द की दुकान के सामने से निकल रहा था तो मेरी रूलाई फूट पड़ी, आँसू टप-टप बहने लगे। मैं रुक गया। मन हुआ कि श्रीमान को सब कुछ बताकर जाऊँ, पर फिर पता नहीं क्यों चल पड़ा। शायद मैंने सोचा होगा कि श्रीमान मेरे भाई का दोस्त है, वह उसका पक्ष लेगा। मेरा यह सोचना ठीक ही था। बाद में जब मेरे भाई के दोस्तों- प्रकाश चंद वकील, मास्टर चरन दास और हरबंस लाल शर्मा को यह बात पता चली तो उनके मुँह से भी मेरे पक्ष में एक भी बात नहीं निकली थी। यह अलग बात है कि वे भाई के पक्ष में भी नहीं बोले थे। बोल कर वे भाई से बिगाड़ना नहीं चाहते थे, पर सच छिप नहीं सका था। मेरे भाई के मंडी में रसूख, उसकी शराफ़त और सज्जनता पर छोटा-मोटा प्रश्नचिह्न अवश्य लगा होगा, इस बात का पता मुझे उस समय लगा जब कई वर्ष बीतने के बाद मास्टर चरन दास के छोटे बेटे सुरिंदर ने भरे बाज़ार में मेरे संग हुई बेइंसाफी के बारे में सारी पोल खोल दी।&lt;br /&gt;जीजा जी और बहन जाने से पहले हमारे पास मथरा दास वाले घर में मिलने के लिए आए। उन दिनों मेरी पत्नी गर्भवती थी। बेबी होने वाला था। बहन यह कहकर मेरी पत्नी को दिलासा दे रही थी- ''देख, तेरे पानी भरे हड्ड हैं। मन पर न लगाना कोई बात। मेरे बोल याद रखना। रख रख कर भूलोगी, किसी चीज़ की कमी नहीं रहेगी।'' पर मुझे बहन की ऐसी मीठी-मीठी बातें यूँ ही गोंगलू (शलगम) पर से मिट्टी झाड़ने वाली झूठी तसल्लियाँ प्रतीत हो रही थी और थी भी बस झूठी तसल्लियाँ ही।&lt;br /&gt;..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तो भाई ने घर से बेघर किया था और दूसरा अकाली सरकार ने तो बिलकुल ही काला पानी भेजने वाली बात कर दी। मास्टरों पर अकाली सरकार बड़ी ख़फ़ा थी। उसने एक आम आदेश द्वारा सबक सिखाने के लिए मास्टरों के तबादले उनके घरों से कम से कम पचास किलोमीटर दूर करने के हिटलरी फरमान जारी कर दिए। प्राइमरी, भाषा, ड्राइंग और पी.टी.आई. अध्यापकों की बदली ज़िले के अन्दर-अन्दर ही हो सकती थी, पर मास्टरों, लेक्चररों और हैड मास्टरों का स्टेट काडर होने के कारण बदली ज़िले से बाहर करने के हुक्म जारी किए गए। जो टीचर्स यूनियन में काम करने वाले छोटे-बेड़े नेता थे, उनके ऊपर अकाली सरकार की ख़ास-नज़रें इनायत हुई, क्योंकि उन्हें सबक सिखाने के साथ ही तो अकाली मंत्रियों और विधायकों के कलेजे में ठंड पड़ सकती थी। सरकार के पास बहाना यह था कि अध्यापक घर के करीब होने के कारण स्कूलों में कम जाते हैं और अपने घरेलू कामधंधों में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। सो, अकालियों की इस सौगात में से मेरे हिस्से जो स्टेशन आया, वह था सरदूलगढ़। इससे आगे पंजाब का और कोई स्टेशन था ही नहीं। अगला गाँव हरियाणा में आता था। बदली के आदेश मई माह में आ गए थे। सरदूलगढ़ उन दिनों ज़िला बठिंडा में था और ज़िले का शिक्षा अधिकारी था- गुरबचन सिंह दीवाना, जिसका उल्लेख मैं पहले जनता हाई स्कूल, जुआर की कहानी सुनाते समय कर चुका हूँ।&lt;br /&gt;अकालियों का यह नादिरशाही हुक्म टलने वाला नहीं था, पर हमें दीवाना साहिब से यह आस थी कि वह कोई नज़दीक का स्टेशन देने में मेरी मदद करेंगे। माँ मेरे रोकने के बावजूद संग चल पड़ी। हम दफ्तर के बजाय दीवाना साहिब की कोठी पर गए। दीवाना साहिब दफ्तर जा चुके थे। दीवाना साहिब ने मेरी माँ का अभिवादन किया और मेरे गले पड़ गए कि मैं माँ को संग लेकर क्यों लाया हूँ। लेकिन बदली न कर सकने संबंधी उसने अपनी मज़बूरी भी स्पष्ट कर दी और हम उल्टे पाँव वापस लौट &lt;!--[if gte mso 9]&gt;&lt;xml&gt;  &lt;w:worddocument&gt;   &lt;w:view&gt;Normal&lt;/w:View&gt;   &lt;w:zoom&gt;0&lt;/w:Zoom&gt;   &lt;w:punctuationkerning/&gt;   &lt;w:validateagainstschemas/&gt;   &lt;w:saveifxmlinvalid&gt;false&lt;/w:SaveIfXMLInvalid&gt;   &lt;w:ignoremixedcontent&gt;false&lt;/w:IgnoreMixedContent&gt;   &lt;w:alwaysshowplaceholdertext&gt;false&lt;/w:AlwaysShowPlaceholderText&gt;   &lt;w:compatibility&gt;    &lt;w:breakwrappedtables/&gt;    &lt;w:snaptogridincell/&gt;    &lt;w:wraptextwithpunct/&gt;    &lt;w:useasianbreakrules/&gt;    &lt;w:dontgrowautofit/&gt;   &lt;/w:Compatibility&gt;   &lt;w:browserlevel&gt;MicrosoftInternetExplorer4&lt;/w:BrowserLevel&gt;  &lt;/w:WordDocument&gt; 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थी कि गर्भवती पत्नी को कौन संभालेगा ? बड़े प्रेम से बरनाला जाकर अभी बात आरंभ ही की थी कि मेरा धर्म पिता जिस को मैं दरवेश जट्ट-बनिया कहा करता था, हुक्के की नली एक तरफ करता हुआ बोला-&lt;br /&gt;''भला इसमें भी कोई सोचने वाली बात है। जब तुम कहोगे, कोई लड़का जाकर दर्शना को ले आएगा। साऊ, कहाँ तपा, कहाँ बरनाला और कहाँ सरदूलगढ़ ? लड़की को क्या परेशान करना है ? बस, करांची मल्ल का जी लगना चाहिए।'' मेरे धर्मपिता करता राम मेरे बेटे क्रांति को लाड में करांची कहा करते थे। उनकी बात सुनकर मेरा कम से कम आधा बोझ उतर गया था।&lt;br /&gt;अब प्रश्न था कि ताया मथरा दास के घर में पड़े सामान का क्या किया जाए ? कम से कम तीन चार महीने सुदर्शना को बरनाला में लग जाने थे। बन्द पड़े घर का किराया और फिर सरदूलगढ़ जा कर किराये पर मकान लेने के दोहरे खर्च ने मुझे चिंतित कर दिया।&lt;br /&gt;मेरे दु:ख-सुख में सलाह देने वाला पत्नी के अलावा अन्य कोई नहीं था। माँ की बेबसी को मैं भलीभाँति समझता था। इसलिए उससे बात करने का कोई लाभ नहीं था। घर खाली करने के लिए गाँव सहिणे में सोम नाथ के पास जाने और सामान को कहीं दूसरी जगह रखने की समस्या मेरे सिर पर तलवार की भाँति लटक रही थी।&lt;br /&gt;साथ लगता घर मामा परसा राम का था। पत्नी के कहने पर मामा परसा राम के पोते और बड़ी पोती ने हमारा सामान अपनी ड्योढ़ी वाली टांट में रख लेने के लिए हामी भर दी थी। मैं झिझकता हुआ सोम नाथ के पास गाँव पहुँच गया। जिस तरह का हमदर्दी भरा व्यवहार सोम नाथ ने मेरे संग किया, उसका मैं आज भी देनदार हूँ।&lt;br /&gt;''तरसेम छोटे भाई, मैंने उस दिन भी तुझे कहा था और अब भी तुझे कहता हूँ कि भई बाई की औलाद वहाँ रह गई कि चाचा लेख राम की। किराये के लिए तू यूँ ही जिद्द करने लगा तो मैंने हाँ कर दी। ले, मैं तुझे बताऊँ। ये अपने पड़ोस में जसवीर सिंह है न, वह भी तुम्हारे मास्टरों का चौधरी कहलाता है। वह कहता था कि तबादले तो रद्द हो जाएँगे, महीने दो महीने में। ले, अगर तू फिर लौटकर तपा आ गया न, तो जब मर्जी घर में आ जाना। अगर सामान वहीं रखना है तो भी कोई बात नहीं।'' सोम नाथ की बात ने जैसे मेरे ज़ख्मों पर मरहम लगा दी हो। मैंने तीन महीने का किराया 30 रुपये के हिसाब से काँपते हाथों से पकड़ाया और उसने 'ना-ना' करते हुए किराया पकड़ लिया।&lt;br /&gt;हम बरनाला वाली बस चढ़ गए। शायद मेरे सालों में से बड़ा साला सोहन लाल ही लेने आया हुआ था। मैं हंडिआये क्रॉसिंग पर उतर गया, जहाँ से मानसा होते हुए सरदूलगढ़ जाने वाली बस लेनी थी।&lt;br /&gt;एक तो पत्नी और बेटे क्रांति को लेकर उपजी उदासी, दूसरे सरकार की धक्केशाही के कारण हुई बदली और तीसरी अपनी शारीरिक कमजोरी। हंडिआये से जाते हुए इस तरह महसूस हो रहा था मानो काले पानी को जा रहा होऊँ। एक संशय भी था कि 12 बजे से पहले सरदूलगढ़ पहुँच जाऊँ, ऐसा न होने पर हैड मास्टर लेट पहुँचने के कारण दोपहर बाद की हाज़िरी रिपोर्ट लेगा, पर बाद में ख़याल आया कि इससे मेरे को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। मुझे हाज़िर होने के लिए सात दिन का समय मिला है और अभी एक दिन और बाकी है।&lt;br /&gt;बस सरदूलगढ़ 12 बजे से पहले पहुँच गई थी। वहाँ पहुँचकर एक अजीब-सी तसल्ली का अहसास हुआ। कारण यह था कि मेरे साथ हाई स्कूल, धौला में काम करने वाला मास्टर कृष्ण कुमार भी यहीं स्थानांतरित होकर आ चुका था, पर असली तसल्ली इस बात की थी कि विश्वामित्र शास्त्री इस स्कूल में लम्बे समय से संस्कृत अध्यापक के तौर पर काम कर रहा था।&lt;br /&gt;विश्वामित्र शास्त्री और मैं तपा मंडी के आर्य हाई स्कूल में एक साथ काम करते रहे थे। उसकी पत्नी कृष्णा एक लिहाज से मेरी बहन लगती थी। विवाह से पहले वह हमारे साथ वाले घर में अपने ताया के पास रहती थी। उसके ताया के दोनों पुत्रों के साथ मेरे सगे भाइयों जैसे संबंध थे। इसलिए शास्त्री जी के संग छुट्टी के बाद उनके घर जाना मुझे कोई पराया नहीं लगा था, बल्कि ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे तपती धूप में कोई ठंडी हवा का झौंका मेरे तन-मन को छू रहा हो।&lt;br /&gt;कृष्णा सगी बहनों की तरह मिली और बच्चे तो जैसे खुश हो उठे। दोनों बच्चे मेरे पास आ जाते और कभी बाहर चले जाते।&lt;br /&gt;बैग में कुछ कपड़े और अन्य छोटा-मोटा सामान इसलिए ले गया था कि कहीं रात काटनी न पड़ जाए, पर यहाँ आकर रात तो क्या, मेरा ठहरना ज़रूरी हो गया। शास्त्री जी और कृष्णा की यह तजवीज़ थी कि मैं उनके पास ही रहूँ, लेकिन उनकी गृहस्थी में मेरी उपस्थिति मुझे खुद को ही चुभती थी।&lt;br /&gt;अगले चक्कर में मैं अपने कपड़े और बिस्तर ट्रंक में ठूंस कर ले गया। अब रैन बसेरा का कोई संशय नहीं था। बस अड्डे के साथ ही स्कूल था। दसवीं कक्षा के दो विद्यार्थी ज्ञान चंद और राज कुमार पहले दिन से ही मेरे श्रद्धालू बन गए थे। सो, वे अड्डे पर पहले ही आए खड़े थे। छुट्टी के बाद वे मेरा ट्रंक शास्त्री जी के घर ले गए। उनका घर भी शास्त्री जी के घर के करीब ही था। इस तरह इन दोनों लड़कों का मुझे बड़ा सहारा हो गया।&lt;br /&gt;शास्त्री जी और लड़कों की मदद से मुझे एक छोटा-सा चौबारा किराये पर मिल गया। मेरे खाने-पीने का प्रबंध राज और ज्ञान ने मिलकर कर दिया था। दोपहर का भोजन राज के घर से आता और शाम का ज्ञान के घर से। वैसे शास्त्री जी भी रोटी के लिए ज़ोर डालते रहते, पर मैं उन पर बोझ नहीं बनना चाहता था। राज और ज्ञान की रोटी मैंने इसलिए मान ली थी क्योंकि मुझे स्वयं बनानी नहीं आती थी और ढाबे की रोटी मिर्चों के कारण मुझे रास नहीं आती थी। वैसे भी शाम को ढाबे पर जाकर रोटी खाने और घर वापस आने का काम मुझे कठिन लगता था। दिन छिपने के बाद तो मैं घर से बाहर निकलता ही नहीं था। मैं यह पता नहीं लगने देना चाहता था कि मेरी दृष्टि बहुत कम है और रात में मुझे बिलकुल ही नहीं दिखता। मेरा यह पर्दा किसी हद तक स्कूल में और अड़ोस-पड़ोस में भी बना रहा। हो सकता है कि किसी को अंदाजा हो गया हो, पर मैंने तुरन्त पता नहीं लगने दिया था।&lt;br /&gt;छुट्टी के बाद ज्ञान और राज अक्सर मेरे पास पढ़ने आ जाते। ज्ञान परिवार की बातें भी कर जाता। उन्हें पढ़ाने से मुझे एक लाभ यह होता कि दसवीं की अंग्रेजी के अगले दिन पढ़ाने वाले पाठ का मुझे पूरा ज्ञान हो जाता।&lt;br /&gt;कक्षा में मैं खुद अंग्रेजी की किताब नहीं पढ़ता था। किसी होशियार विद्यार्थी को पढ़ने के लिए कहता। मैं कठिन शब्दों के अर्थ बताता रहता और वाक्य पूरा होने पर पूर्व वाक्य का अर्थ बताता। कक्षा में लड़कियाँ भी थीं और लड़के भी, जिस वजह से मुझे अधिक सचेत होकर पढ़ाना पढ़ता था। मेरी अपनी कमज़ोरी के बावजूद मैं किसी को बिना मतलब के बोलने या हँसने नहीं देता था। जिस दिन अंग्रेजी की किताब न पढ़ानी होती, उस दिन पंजाबी से अंग्रेजी ट्रांसलेशन करवाता। टेंस (Tense½ संबंधी मेरा ज्ञान अधिकांश अध्यापकों से अधिक था। यही नहीं, इस ज्ञान को बच्चों तक पहुँचाने के लिए मेरा तरीका भी बहुत रोचक था। इस प्रकार दसवीं कक्षा पर मेरा दबदबा पूरी तरह बन गया था। एक अन्य कक्षा को अंग्रेजी भी मैं पढ़ाता था। वहाँ भी मेरे पढ़ाने का ढंग दसवीं कक्षा वाला ही था। सामाजिक शिक्षा पढ़ाने के लिए मुझे किसी किताब को पढ़ने की आवश्यकता नहीं थी। भूगोल पढ़ाते समय मैं भारत का नक्शा बोर्ड पर बना कर हर बात स्पष्ट करता। महाद्वीपों के नक्शे दीवार पर लटका कर इस तरह समझाता कि विद्यार्थी दंग रह जाते। नक्शों के माध्यम से भूगोल पढ़ाने का अभ्यास मुझे पहले धौला, रूड़के कलां और फिर मिडल स्कूल, महिता में हो गया था।&lt;br /&gt;सवेरे बाहर-अन्दर जाने के लिए शास्त्री जी मेरे संग होते या ज्ञान और राज में से कोई एक होता। कभी कभार दोनों ही संग जाते। सवेरे के समय हम घग्गर दरिया के आसपास पहुँच जाते। मुझे सरदूलगढ़ आकर पता चला कि यहाँ घग्गर को नाली कहते हैं। इसका नाम नाली ही ठीक लगता था। यह बहुत बड़ा दरिया नहीं लगता था। इसके रेतीले किनारों पर से पैर फिसल-फिसल जाता। मैंने शतराणा में नौकरी के दौरान खनौरी के पास से घग्गर को देखा था जो घर्र-घर्र करके बहता, उफनता और संगीत-सा पैदा करता था। यहाँ इस नाली में पानी किसी रजबहे-खाल से भी कम था।&lt;br /&gt;शनिवार-रविवार को भी मैं सरदूलगढ़ ही रहता। हर शनिवार अगर बरनाला आने के बारे में भी सोचता तो भी मन न मानता। रोज़ रोज़ ससुराल वालों के यहाँ जाना अच्छा न लगता। 'बहन के घर भाई कुत्ता, ससुरे घर जंवाई कुत्ता।' यह कहावत मुझे बरनाला जाने से रोके रखती। तपा जाने को भी जी न करता।&lt;br /&gt;15 मई 1971 को मैं सरकारी हाई स्कूल, सरदूलगढ़ उपस्थित हुआ था। बीच में एक बार बरनाला का चक्कर लगा गया था। निराशा और उदासी के आगे मेरी बेबसी का आलम यह था कि मेरे अन्दर से ही आवाज़ें उठतीं। वे आवाज़ें मेरी नहीं थीं, मेरी पत्नी की थीं। भला दूसरा जनेपा भी कोई मायके में किया करता है ? घर में से भी अपना हक नहीं ले सके ? इस प्रकार हीनभावना का मारा मैं एक रात काटकर सरदूलगढ़ वापस आ गया था। मुझे अपनी ससुराल के बच्चे-बच्चे से भी मानो शर्म आती हो। वहाँ एक दिन भी काटना सूली पर टंगे पलों जैसा था।&lt;br /&gt;अध्यापक मुझे गोयल साहिब या तरसेम जी कहकर बुलाते। इसके पीछे शास्त्री जी की पहलकदमी थी। मेरे परिवार और मेरी योग्यता के जो पुल शास्त्री जी ने बांधे, उसके कारण मैं मुख्य अध्यापक से लेकर विद्यार्थियों तक कुछ ही दिनों में आदर-सम्मान का पात्र बन गया था।&lt;br /&gt;हालांकि स्कूल और चौबारे में मैं पढ़ाने में व्यस्त रहता, पर पत्नी के जनेपे के बारे में सोच कर घबरा जाता। ससुराल वालों के विषय में सोच कर तो मैं अपने आप को बिलकुल हल्का समझने लग पड़ता।&lt;br /&gt;इस बार की गरमी की छुट्टियाँ मेरे लिए दोज़ख़ के समान थीं। न सरदूलगढ़ रहने को मन करता था, न बरनाला में। ससुराल वालों के यहाँ रहने से बढ़कर शर्मिन्दगी की बात मेरे लिए और क्या हो सकती थी। माँ के पास जाकर रहूँ ? मेरा अंतर्मन बोला। माँ बेचारी जूठे बर्तन मांजकर रोटी खाने वाली एक बेबस, विधवा औरत से अधिक कुछ नहीं थी। बहन के घर जाकर रहना और भी कठिन लग रहा था। पहले कई बार सल्हीणे बड़ी बहन शीला के पास गरमी की छुट्टियों में कई कई हफ्ते बिता आता था, पर अब तो उसे मेरे से कोई गरज़ नहीं रही थी। जब मैं उसके पास गरमी की छुट्टियों में रहने जाता, तब तो विजय या कैलाश तपा में पढ़ते थे और या फिर छोटी लड़की राजी मेरे पास धौला में पढ़ती थी। उस समय बहन को शायद कोई झेंप ही नहीं, शायद कुछ प्यार भी हो। परन्तु, अब झेंप और प्यार का असली रूप बाहर आ चुका था। घर के बँटवारे के समय जो कुछ वह करके गई थी, उस कारण सल्हीणे जाने के लिए ज़ख्मी रूह भी नहीं मानती थी।&lt;br /&gt;एक बात और थी। मर्यादा भी कभी मेरी राह रोक लेती और मुझे तपा में भाई के पास जाकर रहने का हुक्म देती। अन्दर का व्यक्ति कहता- वो तुझे निकाल तो नहीं देगा। दर दर धक्के खाने से तो अच्छा है, भाई के पास जा। वहाँ माँ बैठी है। तपा में यार-दोस्त हैं। बरनाला भी साथ है ही और साथ ही रामपुरा फूल है। लोक लाज और मर्यादा का ख़याल तथा ऊपर से पत्नी की भरे मन से दी गई सहमति के कारण मैंने सब संकोच-शर्म उतार कर अपना बैग भाई के घर में टिका दिया। वह घर जिसे छह महीने पहले मैं अपना घर कहा करता था। अब वह मेरा घर नहीं था, भाई का घर था। मैं अपने हाथों यह दुकान-अहाता उसके हिस्से में लिखकर दे चुका था। पर 17 जून तक मैं वहाँ इस तरह रहा जैसे किसी जेल में होऊँ। कभी अपने मित्र रामेश्वर दास के पास चला जाता, कभी शाम लाल मुझे दूर तक सैर पर ले जाता। रामेश्वर दास से दिल की कुछ बातें साझी कर लेता। एक बार बहन तारा के पास रामपुरा फूल और एक बार मालेरकोटला बहन कांता के पास भी चक्कर लगा आया था। दोनों बहनें तसल्ली देतीं। मदन लाल जी तो कम ही बात करते थे। हाँ, मालेरकोटला वाले जीजा गुज्जर लाल जी मेरे साथ जी भर कर बातें करते, बड़ी नसीहतें देते। मुझे दिल से प्यार करते, लेकिन वे बेचारे भी तंगदस्ती का शिकार थे। ईश्वर में उनका अटल भरोसा था। मुझे भी वह ईश्वर पर भरोसा रखने के लिए कहते।&lt;br /&gt;18 जून 1971 को जब मुझे मेरे दूसरे बेटे के जन्म की सूचना मिली तो इस तरह लगा जैसे तपती धरती पर बादल बरस गया हो। मेरी भतीजी सरोज ने उसका नाम बॉबी रख दिया। मैं लीचियों की पेटी ले आया। घर में सबसे खुश मेरी माँ थी और फिर बच्चे, भाई भी खुश था। मैं अगले रोज़ बरनाला चला गया। सभी खुश थे। पत्नी के चेहरे पर पहले वाली उदासी नहीं थी। लेकिन उसे मेरा तपा में भाई के घर में रहना अच्छा नहीं लगा था।&lt;br /&gt;एक हफ्ते के बाद पंजीरी की जगह एक पीपी देसी घी और पाँच सौ रुपये देकर मैं समझता था कि मैंने अपना फ़र्ज़ पूरा कर लिया था। पंजीरी कैसे बनाता और कहाँ से बनवाता ? इस समस्या का इससे बढ़िया कोई हल नहीं था। माँ ने ऐसा ही करने के लिए कहा था। भाई और भाभी से पूछने की अब मैंने आवश्यकता नहीं समझी। सरदूलगढ़ विश्वामित्र शास्त्री जी को यह खुशख़बरी चिट्ठी से दे दी थी और साथ ही, बॉबी के जन्म का समय भी लिख दिया था। इसके अतिरिक्त, शास्त्री जी से एक विनती की थी कि वह मकान मालिक हंस राज के साथ साथ ज्ञान और राज को भी बॉबी के जन्म की खुशख़बरी दे दें। वापस सरदूलगढ़ जाने से पहले एक गृहस्थ के तौर पर यह सब कुछ करना ज़रूरी था।&lt;br /&gt;छुट्टियों के पश्चात गाड़ी पहले वाली रफ्तार से चल पड़ी थी। लेकिन साथ ही बदली के हुक्म के रद्द होने की उम्मीद बनी रहने के कारण कभी कभार अकाली सरकार को जी भरकर कोसता और कभी गरम गरम पुलिसिया गालियाँ बकता। गालियाँ निकालने में मुझसे आगे 'फफड़े भाईके' से स्थानांतरित होकर आया एक शास्त्री था और दूसरा था, आहिस्ता-आहिस्ता गालियाँ बकने वाला एक बूढ़ा सूदखोर बनिया अध्यापक।&lt;br /&gt;जब तबादले रद्द होने के आदेश आए, सब एक दूसरे को बधाई देने, चार्ज देने में एक दूसरे से उतावले थे और रिलीविंग चिट लेकर भागने को तैयार। परन्तु, मैंने ऐसा कोई उतावलापन नहीं दिखलाया था। फिर भी, मेरे कार्यमुक्त होने का काग़ज़ तैयार हो गया था। बहन कृष्णा के परिवार को मिलना, हंसराज का किराया चुकाना और गलबहियों में लेकर ज्ञान और राज से विदाई लेना, ये कुछ ऐसे भावुक पल थे जो अपने घर लौटते समय भी आँखों में आँसू ले आए। जब घर से चले थे तो यूँ लगता था मानो काला पानी जा रहे हों, पर जब वापस लौट रहा था तो यूँ लगता था जैसे सरदूलगढ़ अपना ही घर है। बस, अकाली सरकार के दाँत खट्टे करने के विषय में सोच कर ही आनन्द आ रहा था। 6 अगस्त को मुझे महिता स्कूल में लौटने पर विजेता वाला अहसास होने के साथ-साथ पुन: घर को बांधने की चिंता सिर्फ़ उस वक्त दूर हुई, जब भाई सोम नाथ ने पहले शब्द में ही तपा वाले अपने दुकान-अहाते की कुंजी देकर कहा कि मैं बेफिक्र होकर वहाँ रहूँ। लेकिन साथ ही यह भी कहा कि आठ नंबर गली वाले प्लाट में दो कमरे खड़े करने की कोई कोशिश भी करूँ। यह उसकी समझदारी थी और मुझे उसके द्वारा ऐसा कहने पर कोई गिला नहीं था। मामा परस राम की ड्योढ़ी वाली टांट पर से सामान उतार कर ताया मथरा दास के घर पहले की तरह उसे टिकाने के बाद राहत की साँस ली। दर्शना, बॉबी और क्रांति के आने से पहले माँ इधर आ गई थी, पर माँ को ताया मथरा दास के घर में हमारा रहना शर्मिन्दगी वाली बात लगती थी। इसलिए वह मेरी पत्नी सुदर्शना के संग बात करते समय बड़ी हीन भावना की शिकार लगती थी।&lt;br /&gt;''मेरे पुत्त, मेरे वश की बात नहीं रही। तुझे मैंने कितनी मुश्किलों से लिया था, पर क्या पता था कि तुझे शरीकों(दुश्मनों) के घर भटकना पड़ेगा।''&lt;br /&gt;माँ ने एक आह भरी और फिर बोली-&lt;br /&gt;''माँएँ तरसें पुत्तों को और पुत्त तरसें टुक्कों (टुकड़ों) को।''&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;(जारी…)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;00 &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4235713353102640102-2938387173175915213?l=anuvadghar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://anuvadghar.blogspot.com/feeds/2938387173175915213/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=4235713353102640102&amp;postID=2938387173175915213&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/2938387173175915213'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4235713353102640102/posts/default/2938387173175915213'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://anuvadghar.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='आत्मकथा'/><author><name>दीप्ति 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