समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

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Tuesday, January 12, 2010

आत्मकथा



एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा

धृतराष्ट्र
डॉ. एस. तरसेम
हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव
चैप्टर-3
मालवा ज्ञानी कालेज

अगर आने वाली आफ़त का पहले पता चल जाए तो आदमी कुछ न कुछ बंदोबस्त ज़रूर कर लेता है। कुछ ऐसा ही प्रबंध आर्य स्कूल छोड़ने से पहले मेरे भाई और मैंने कर लिया था। स्कूल छोड़ा नहीं था, छुड़वाया गया था। पिता-पुत्र, पति-पत्नी या दो भाई एक ही स्कूल में नहीं रह सकते। कच्चे धागे में बंधी यह तलवार मेरे सिर पर लटक रही थी। इससे पहले कि यह तलवार मुझ पर आ गिरे, मैंने अपने भाई के सामने ज्ञानी की कक्षाएं पढ़ाने की तजवीज़ रखी। उसे मेरी बात जंच गई, क्योंकि इससे पहले मैं स्वयं ज्ञानी करने के तुरन्त बाद से तीन लड़कियों को ज्ञानी करवा चुका था। तीनों पहली बार में ही पास हो गई थीं, पर मेरे भाई को जो चिंता थी, वह अपनी जगह ठीक थी। देखने में मैं अभी लड़का ही लगता था, पूरा आदमी नहीं लगता था। बड़ा दुर्बल-सा शरीर और ऊपर से नज़र वाली ऐनक से मेरी कोई प्रभावशाली शख्सियत नहीं बनती थी। अगर ज्ञानी की यह अकैडमी सिर्फ़ तपा मंडी में खोलता तो अधिक से अधिक तीन विद्यार्थी मिलते। इसलिए सोच-विचार कर अकैडमी बरनाला और तपा दोनों स्थानों पर खोलने का फ़ैसला किया। अकैडमी का नाम रखा- 'मालवा ज्ञानी कालेज'। गुरबचन सिंह तांघी की अकैडमी का भी यही नाम था। उसकी सलाह से ही यह नाम रखा गया था। तांघी इसलिए खुश था कि उसकी अकैडमी का नाम बरनाला तक प्रचलित हो जाएगा। हम दोनों भाइयों को तसल्ली यह थी कि शायद इस नाम से विद्यार्थियों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा क्योंकि मालवा ज्ञानी कालेज, रामपुराफूल की प्रसिद्धि तपा तक तो थी ही, थोड़ी-बहुत बरनाला तक भी थी।
भाई की अकैडमी 'गोयल मॉडर्न कालेज' के बोर्ड पर पेंटर से 'मालवा ज्ञानी कालेज' लिखवा लिया था और बोर्ड पर अगली पंक्ति थी- रामपुराफूल, तपा, बरनाला। इस बोर्ड को हमने उसी स्थान पर लटका दिया था, जहाँ यह पहले लगा हुआ था। पढ़ाने का प्रबंध चौबारे में किया गया। हमारे घर के दोनों ओर सीढ़ियाँ थीं। लड़कियाँ गली वाले रास्ते से आ सकती थीं और लड़के बाज़ार की तरफ से। इसी तरह का एक बोर्ड बरनाला के हंढिआया बाज़ार के एक कोने वाले चौबारे के बाहर टांग दिया। दो चौबारे थे। एक में पढ़ाने के लिए बेंच लगा दिए गए और दूसरे में सोने और चाय-पानी बनाने का प्रबंध कर लिया गया। दोनों चौबारे 20 रुपये महीने पर मिल गए थे और थे भी सरकारी हाई स्कूल के बिलकुल करीब। यदि दुकानदारों की भाषा में कहना हो, बड़े मौके पर थी यह दुकान।
इश्तिहार छपवाए। दीवारों पर भी लगवाए और हाथों-हाथ भी बांटे। प्रोग्राम यह बना कि सवेरे की ज्ञानी की क्लास 8 से 10 बजे तक तपा में पढ़ानी थी। ग्यारह बजे वाली गाड़ी से बरनाला जाकर पहले ‘बुद्धिमान’ और फिर ‘ज्ञानी’ की क्लास पढ़ाने का निश्चय किया। यह स्कीम सफल भी हुई। 1960 के फरवरी महीने से काम आरंभ किया। चार महीनों के प्रति विद्यार्थी 60 रुपये लेने थे। तपा में ‘ज्ञानी’ के लिए सिर्फ़ दो लड़कियाँ ही आईं। बरनाला में ‘ज्ञानी’ के दो लड़के और दो लड़कियों ने दाख़िला लिया। ‘बुद्धिमान’ में एक लड़का और लड़की दाख़िल हुए। मेरे लिए यह कोई खराब शुरूआत नहीं थी। भाटिया की तानाशाही के बीच भी तो मुझे 60 रुपये ही मिलते थे। तपा और बरनाला दोनों के विद्यार्थियों से चार महीनों की तनख्वाह से अधिक मिल जाने थे। इस तरह समझो कि बरनाला के चौबारों का किराया और गाड़ी के पास के खर्च को भी आमदनी में से निकाल कर मैं कोई घाटे में नहीं था। रात में बरनाला रहना ज़रूरी हो गया। कारण यह था कि मुझे स्वयं भी बी.ए. अंग्रेजी की परीक्षा देनी थी। मेरे जैसा ही एक बेरोजगार वहाँ एक चौबारा लेकर अंग्रेजी की टयूशनें पढ़ाता था। उसकी टयूशन फीस 20 रुपये महीना थी। मैंने उसके पास दो महीने लगाए। वह अपना अता-पता किसी को नहीं बताता था। मेरे साथ पढ़ते लड़के कहा करते कि इसकी घरवाली से बिगड़ी हुई है इसलिए घर से भाग कर इसने यहाँ अकैडमी खोल रखी है। पर मेरे साथ उसका संबंध आम विद्यार्थियों जैसा नहीं था। क्लास खत्म होने के बाद भी वह मुझे रोक लेता और कई बार अपनी बातें करके अपना मन हल्का करता। मैंने भी उसे अपनी मुश्किल बता दी थी। इसलिए उसने मुझे कॉपी पर लिखने या किताब पढ़ने के लिए कहना बन्द कर दिया था। हमारे बीच एक बहुत ही चंट लड़का था। पढ़ता वह शहर के एस.डी. कालेज में था और था भी बहुत शरारती और पूरा ड्रामेबाज। वह प्राय: प्रोफेसर साहब से मेरे न पढ़ने या लिखने के बारे में कोई न कोई सवाल करता ही रहता। कुछ तो प्रोफेसर साहब के टालने के कारण और कुछ बाद में उसकी पोल खुल जाने के कारण वह मुझसे मुँह चुराने लग पड़ा था।
प्रोफेसर साहब का चौबारा मेरे चौबारे से सौ गज की दूरी पर था। बाज़ार की रोशनी के कारण मुझे आने-जाने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। वैसे भी मैं अपने छोटे से थैले में किताब के साथ टार्च भी रखता था।
अंग्रेजी की इस टयूशन का मुझे और तो बहुत लाभ न हुआ, पर इतना फायदा अवश्य हुआ कि इस बहाने गाईड की अपेक्षा कुछ भिन्न तथ्य हार्डी, बर्नाड शॉह और शेक्सपियर के बारे में अवश्य पता चले। कुछ अंग्रेजी के उच्चारण में भी सुधार हुआ। सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि मास्टर जय किशन भी वहाँ पढ़ने आया करता था और वह मेरा मित्र बन गया। उसका धैर्य कमाल का था। भावुक बिलकुल नहीं होता था। पीछे से ज़िन्दगी की एक ही विचारधारा से बंधे होने के कारण हमें टीचर्स यूनियन में काम करने का अवसर मिला। पंजाब के आतंकवाद की आँधी में मेरे इस मित्र को बरनाला गोली कांड ने निगल लिया। लेकिन अभी भी अपने आप को भावुकता से मुक्त करने के लिए मैं जय किशन को याद कर लेता हूँ।
आस न होने पर भी आस रखने का ढंग मुझे बरनाला में बिताए इन चार महीनों ने ही सिखाया। यहाँ बिताईं रातों का संबंध न मेरे पढ़ने से है, न सोने से। टयूशन पढ़ कर आने के बाद मैं लेट जाता। नींद बहुत कम आती थी। भविष्य बहुत धुंधला नज़र आता। कभी सोचता कि मेरा भविष्य कोई है ही नहीं। आँखों बग़ैर कैसा भविष्य ? यह सोच कर गहरी सोच में डूब जाता। माँ का कहना था कि भाई को ऐसी बात न बताऊँ जिससे उसका मन दुखी हो। इसलिए मैं अपने अन्दर की बात अन्दर ही मथता रहता। साल भर बाद नज़र टेस्ट करवाने पर पता चला कि एक आँख का एक नंबर और दूसरी आँख का पौना नंबर बढ़ गया है। मैंने शीशे बदलवा लिए, पर भाई को यह बात नहीं बताई। यह बात तो भाई को स्वयं ही उस वक्त पता चली जब उसने मेरी ऐनक उठा कर खुद देखी और इस बारे में मुझसे पूछा। मुझे सच्चाई बतानी पड़ी।
बरनाला और तपा में खोले गए ये ज्ञानी कालेज, ज्ञानी कालेज कहाँ के थे, यूँ ही टक्करें मारने वाली बात थी। तपा में जो दो लड़कियाँ पढ़ती थीं, उन्हें पढ़ाने में कोई दिक्कत नहीं थी। मैं बोलता रहता, वे लिखती रहतीं। पहले पेपर की कविताओं के अर्थ, जैसे करवाए, उन्होंने सुन लिए। पर बरनाले का एक लड़का जिसे लड़का कहने की बजाय आदमी कहना चाहिए, वह देखने में तो बड़ा सरदार लगता, पर दिमाग और अक्ल के स्तर पर बिलकुल खाली था। अक्ल तो उसके पास से भी नहीं गुजरी थी। उसकी बहन भी साथ ही पढ़ती थी। उसे मेरी लिखवाई और समझाई गई बात तो समझ में आ जाती, पर सरदार साहब को सौ बार समझाने के बावजूद कुछ पल्ले न पड़ता। उसकी अक्ल की कमी का आखिर परिणाम यह निकला कि उसने मेरे पास आना ही छोड़ दिया।
सरदार साहब का नाम तो मुझे याद नहीं, इसलिए मैं उसे सरदार साहब ही लिख रहा हूँ लेकिन उसके पढ़ाई छोड़ने की कहानी ज़रूर बताना चाहता हूँ।
मैंने आधे से अधिक पाँचवा परचा करवा दिया। आधा सिलेबस करवाने के बाद टेस्ट लेने का प्रोग्राम बना लिया। सब विद्यार्थी मेरे द्वारा टेस्ट लिए जाने की तजवीज़ से सहमत थे और सरदार जी भी। ज्ञानी का पाँचवा परचा पंजाबी भाषा और साहित्य के इतिहास से संबंधित था। मैंने पहले पंजाबी भाषा के निकास और विकास, पंजाबी की उप-भाषाएं, गुरुमुखी लिपि का विकास और पंजाबी के लिए इसकी प्रासंगिकता के कारणों से संबंधित नोट्स लिखवाए हुए थे। लिखवाए ही नहीं, समझाए हुए भी थे। लिपी और भाषा का अन्तर, लिखवाए हुए नोट्स से बिलकुल स्पष्ट था। टेस्ट में मैंने पंजाबी भाषा के निकास और विकास पर सवाल पूछा था। यही टेस्ट मैंने तपा में पढ़ने वाली लड़कियों का भी लिया था। सब विद्यार्थियों ने सवाल का जवाब लगभग ठीक लिखा था। यह बात अलग थी कि किसी ने उत्तर संक्षेप में दिया था और किसी ने विस्तार से। पर था सभी का ठीक। सरदार साहब ने गुरुमुखी लिपि का निकास और विकास लिख दिया। उसके इस जवाब पर मैंने काटा फेर दिया। जब मैंने पेपर वापस किए तो सरदार साहब भड़क उठे। एक तो उसके नंबर सबसे कम थे और दूसरा उसके चार पन्नों पर लाल काटे थे, जो शायद उसके लिए असहय था। उसके सहपाठी रामेश्वर दास जो उस समय एस.डी. कालेज में लैबॉट्री सहायक का काम करता था, उसने उसे बहुत ही नम्रता से समझाने की कोशिश की, पर उसका चढ़ा हुआ पारा नीचे नहीं उतर रहा था। अपनी बहन के कहने पर भी वह न समझा और क्लास से उठ कर चला गया।
अगले दिन उसके अफ़सर पिता मेरे पास आए। वे दाढ़ी में फिक्सो लगाते थे और मूंछों को तगड़ा मरोड़ा दिया करते थे, पर दाढ़ी को रंगते नहीं थे। उनकी शराफत और मुहब्बत का मैं कायल था। उनके मेरे भाई से भी ताल्लुक थे, पर अपने बेटे के विरुद्ध कोई बात सुनना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। मेरे समझाने पर उन्हें बात तो समझ में आ गई, पर वे चाहते थे कि मैं उनके घर आकर काका जी को क्लास में आने में लिए मनाऊँ। मेरा मन इस बात के लिए नहीं मानता था। वैसे मैं अन्दर ही अन्दर डर रहा था कि मेरे ऐसा करने पर मुझे यह नुकसान होगा कि दोनों बहन-भाई की टयूशन नहीं आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ था। टयूशन देने के समय लड़की ने अन्तिम महीने को छोड़ कर अपने भाई की भी पूरी फीस दे दी थी।
एक और समस्या से भी दो-चार होना पड़ा। समस्या यह थी कि एक लड़की जो पढ़ने में बहुत होशियार थी, पर किसी डॉक्टर के साहिबजादे से उसके संबंध होने के कारण मेरे लिए सिरदर्द बन गई थी। जब क्लास खत्म होती, सब विद्यार्थी चले जाते, पर वह लड़की वहीं बैठी रहती। सारे विद्यार्थियों के चले जाने के बाद डॉक्टर का साहिबजादा आता और आकर बेंच पर बैठ जाता। देखने में वह मेरे से कहीं तगड़ा लगता था। मेरी समझ में यह भी आ गया था कि वह किस लिए यहाँ आता है। तीसरे दिन उन दोनों ने स्वयं ही मुझे सारी बात बता दी। लड़के ने खुले रूप में यह कह दिया कि मैं एक घंटे के लिए रोज़ उन्हें दूसरा चौबारा दे दिया करूँ जहाँ मेरा बिस्तरा लगा था। उन्होंने मुझे दो लालच भी दिए। पहले पैसे का और दूसरा लड़की की ओर से अगले दिन क्लास लगने से पूर्व अपने आप को मेरे आगे पेश करने का। 19 वर्ष में प्रवेश करने वाले मेरे जैसे लड़के लिए बाद वाला लालच बड़ा था। मन में कुछ मैल आई, लेकिन बाद में बुद्धि ने मन को नियंत्रित कर लिया। अगले दिन मैंने दोनों को कोरा-सा जवाब दे दिया। पुलिस की धमकी सुन कर लड़के ने चौबारे की तरफ मुँह नहीं किया। लड़की ने भी आना बन्द कर दिया। ज्ञानी का दाखिला फार्म भरा होने के कारण वह कभी कभार आती और गाईड में से महत्वपूर्ण सवालों पर निशान लगवा कर चली जाती। मेरी भी इच्छा यह होती कि लड़की जल्द से जल्द चली जाए।
‘बुद्धिमान’ के सिर्फ़ दो विद्यार्थी थे। एक लड़का और एक लड़की। लड़का एस.डी. कालेज में जे.एल.ए. था। शायद वह ज्ञानी के विद्यार्थी रामेश्वर दास की सलाह पर ही ‘बुद्धिमान’ करने लगा था। ‘बुद्धिमान’ को आम लोग बुद्धिमानी कहते थे। इसका स्तर मैट्रिक की पंजाबी जैसा था, पर पेपर छह थे। इस स्तर की हिंदी की क्लास को रतन और संस्कृत की क्लास को ‘प्राज्ञ’ कहते थे। लड़के का नाम शायद राकेश था- सुन्दर, सुशील, दर्शनीय नौजवान। देखने में वह मुझसे कद-काठी में अगर दुगना नहीं तो ड्योढ़ा ज़रूर था। लड़की का नाम शायद दयावंती था। वह भी यूँ लगती थी मानो ईश्वर ने फुर्सत में बैठ कर उसे बनाया हो। वस्त्र पहनने, केश बनाने और चुटिया करने से वह फैशनप्रस्त लगती थी। पहले मुझे शक हुआ कि इस राकेश से दयावंती का कोई चक्कर न हो, पर धीरे-धीरे मेरा शक निर्मूल साबित हो गया। राकेश तो हद दर्जे का सज्जन था। जितनी कद्र और सेवा वह मेरी करता, उससे पुराने ज़माने के गुरू-शिष्य के रिश्ते का भ्रम भी पड़ सकता था। लेकिन लड़की बड़ी चंचल थी। मुझसे पढ़ने वाले सभी विद्यार्थियों ने तो एक बार कहने पर फीस लाकर दे दी थी, पर वह कई बार कहने के बावजूद फीस नहीं लाई। क्लास लगने से पहले ही आ जाती। आकर कभी वह अपने बालों की बात करती, कभी कपड़ों की। एक दिन अपने नृत्य की बात छेड़ बैठी। मुझे दाल में कुछ काला लगा। बहुत सोच विचार कर राकेश से बात साझी की। उस देवता पुरुष ने मुझे तसल्ली दी और स्वयं भी क्लास लगने से पहले आने लग पड़ा। फीस हालांकि लड़की ने आधी ही दी थी, पर पढ़ पूरा सैशन गई थी। मैं उसके कामचक्र से बच गया था। शायद मैं इस चक्कर में आ जाता अगर सामने भाई का डर और माँ की शिक्षा न होती।
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बी.ए. अंग्रेजी के लिए मैंने एस.डी. कालेज, बरनाला सेंटर भरा था। तैयारी भी अच्छी थी। उन दिनों बी.ए. अंग्रेजी के तीन पेपर हुआ करते थे- ए, बी और सी। पहले दो पेपर इंग्लिश लिटरेचर के थे- एक मोटा अंग्रेजी काव्य संग्रह क्लासिकल पोयट्री से लेकर मॉडर्न पोयट्री तक था। इस पुस्तक का नाम 'लिविंग लायर' था। दो नाटक थे- शेक्सपियर का 'द टैंपैस्ट(तूफान)' और बर्नाड शॉ का 'द ऐपल कार्ट'। एक हार्डी का नावल 'फार फ्रोम दी मैंडिंग क्राउड'। एक कहानी संग्रह और एक निबंध संग्रह भी लिटरेचर का हिस्सा थे। इनमें से आलोचनात्मक प्रश्न भी आते और रचना के सार अंश से जुड़े प्रश्न भी। तीसरे पेपर में चार या पाँच लेखों में से एक करना होता। एक पैरा की प्रैसी आती, दस नंबर का पंजाबी से अंग्रेजी ट्रांसलेशन करना होता और दस नंबर का अप्लाईड व्याकरण। तीनों पेपर 150 नंबर के थे, यानी हरेक पेपर 50-50 नंबर का। गाईड मैंने प्रो. के. एल. कपूर का खरीदी हुई थी। आम विद्यार्थी तो इस गाईड को देखकर डर जाते, पर मुझे इतना भारी ग्रंथ कोई पराया नहीं लगता था, क्योंकि ‘ज्ञानी’ का गाईड इससे भी मोटा था। मुझे बी.ए. में 45 प्रतिशत नंबर लेने वाली बात कोई विशेष नहीं लगती थी क्योंकि ‘ज्ञानी’ में भी तब पास होने के लए 45 प्रतिशत नंबर लेना आवश्यक होता था।
परीक्षा देने के लिए कोई हीनभावना नहीं थी, पर फ्लू का क्या करता। पेपर से दो दिन पहले इस बीमारी ने आ घेरा था। दवा दारू भी कोई कारगर साबित नहीं हुई थी। उन दिनों में सदर बाज़ार के सबसे प्रसिद्ध डॉक्टर हंस राज का एक डिस्पेंसर मेरे पास पढ़ा करता था। दवाई की उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी और सेवा की राकेश ने। मेरे खाने-पीने के लिए सब कुछ राकेश के घर से आता। तपा रोज़ जाने का सिलसिला बन्द कर दिया। मैंने अपनी बीमारी के बारे में कोई सन्देशा तपे में नहीं भेजा। भाई और माँ ने समझा कि पढ़ाई के कारण नहीं आया। राकेश मुझे स्वयं सेंटर में ले कर गया। हालत मेरी बहुत खराब थी। बुखार तो था ही, नाक और आँखों से बहते पानी के कारण कुछ लिखा ही नहीं जा रहा था। ऊपर से पाँच-पाँच, छह-छह छींकों ने पागल कर दिया।
सुपरवाइज़र कोई भला आदमी था। उसका नाम-पता मुझे कुछ भी याद नहीं। उसने राकेश को बुलाया होगा, तभी तो वह मुझे हॉफ़ टाइम से पहले आकर ले गया था। शायद परचा आरंभ हुए को अभी आधा घंटा ही हुआ था। बी पेपर वाले दिन भी मेरी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ था। मैंने परीक्षा छोड़ देने का निर्णय किया, पर पता नहीं क्यों पेपर देने चला गया। यह पेपर मेरा ठीक हो गया था, दरम्याना-सा। पर 50 प्रतिशत नंबर इस पेपर में भी आने की उम्मीद नहीं थी। पहले दो परचों में हालत बच्चों की भाषा में दो गोल अंडो वाली थी। पास होने के लिए कम से कम 68 नंबर चाहिए थे। इसलिए पास होने के स्थान पर फेल होने का काला टीका मेरे माथे पर लगना निश्चित था।
अगले दिन ‘ज्ञानी’ और ‘बुद्धिमान’ की कक्षाओं की दो दिन की छुट्टियाँ करके मैं घर चला गया। फ्लू ने मुँह-माथे को जिस तरह का बना दिया था, माँ देख कर घबरा उठी। मैंने बीमारी के बारे में भी बताया और बी.ए. की परीक्षा के बारे में भी। सारा परिवार मेरी परीक्षा की बात भूल गया। माँ और भाई को मेरे शरीर की हालत देख कर जो चिंता लगी, वह बिलकुल वैसी ही थी, जैसी मैट्रिक की परीक्षा से पहले मुझे मालेरकोटले बहन के पास गए को फ्लू हो जाने पर हुई थी। फल, मुरब्बा, दाखें और दूध- भाई ने किसी चीज़ की कमी नहीं रखी थी।
दो दिन पश्चात् मैंने पहले की तरह बरनाला जाना आरंभ कर दिया। बस, मई का महीना ही वहाँ और लगाना था। जून में ‘ज्ञानी’ की परीक्षा हो जानी थी। जुलाई में भाई ने बी.एड करने के लिए मोगा चले जाना था। यशपाल भाटिया की यह मजबूरी थी या सयानापन, उसने भाई के बी.एड में दाखिले के बाद मुझे आर्य स्कूल में रखने का भरोसा दिला दिया था। इसलिए मैं बरनाला से बोरिया-बिस्तर उठा कर तपा में आ गया। समझो, मालवा ज्ञानी कालेज, बरनाला का भोग पड़ गया।
पहले मेरे बी.ए. का परिणाम आया। उन दिनों में परीक्षाफल 'द ट्रिब्यून' अख़बार में छपा करता था- नंबर सहित। सवेरे सात बजे वाली गाड़ी से अख़बार आ जाते थे। स्टेशन बिलकुल हमारे घर के सामने था। नतीजे वाले दिनों में हम अखबार हॉकर से स्टेशन पर ही ले लेते थे। बी.ए. का नतीजा अखबार में छपा। बी.ए. की परीक्षा देने वाले दो और लड़के भी वहाँ खड़े थे। एक की बहन ने परीक्षा दी हुई थी। मुझे तो अपने नतीजे का पता ही था। वे दोनों लड़के और तीसरी लड़की, ये भी फेल हो गए थे। दोनों लड़के कालेज में पढ़े थे और लड़की ने मेरी तरह सिर्फ़ अंग्रेजी के परचे दिए थे। मुझे कोई मलाल नहीं था, कोई निराशा नहीं थी। जो बात पहले ही मालूम हो, उसके लिए आदमी पहले ही तैयार हो जाता है। कुछ ऐसी ही हालत मेरी थी। परांठे पक रहे थे। मैंने हमेशा की तरह थाली आगे कर दी। दही के साथ परांठा खाना शुरू कर दिया। खाते-खाते माँ को बता भी दिया कि तेरा पुत्त फेल हो गया है। माँ को यकीन न हुआ। उसका मन यह बात मानने को तैयार ही नहीं था कि मैं फेल हो सकता हूँ। भाई के बताने पर माँ को यकीन हुआ।
अगले महीने ‘बुद्धिमान’ का नतीजा निकला, दोनों विद्यार्थी पास हो गए थे। ‘ज्ञानी’ में भी सरदार साहब को छोड़कर सब पास हो गए थे। एक लड़की के तो नंबर भी बहुत अच्छे आए थे। बरनाला में ज्ञानी कालेज खोलने का और कोई लाभ हुआ या नहीं, पर दो प्यारे मित्र अवश्य बन गए - राकेश और जय किशन। कुछ वर्ष बाद राकेश के आग में झुलस कर मरने की खबर मिली। मेरे लिए दु:ख की यह घड़ी अपने दु:ख जैसी ही थी। मैं दु:ख साझा करने के लिए उसके घर तक गया। रस्मी-सी बातचीत के बाद लौट आया। बड़ा हैरान था कि जिस राकेश के निधन पर मैं इस तरह छटपटा रहा हूँ, वैसे उसके घर वाले क्यों नहीं। राकेश की मौत का अहसास मेरे लिए इस तरह भी था मानो मेरा बरनाले वाला कोई किला ढह गया हो। जय किशन की मौत तो उससे भी घातक थी क्योंकि वह भोला पंछी आतंकवादियों की बिना किसी हिट लिस्ट के उनकी गोली का शिकार हो गया था।
(जारी…)
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9 comments:

Krishna Kumar Mishra said...

सुन्दर प्रयास, धन्यवाद

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

बलराम अग्रवाल said...

आत्मकथा की भाषा अच्छी रवानगी लिए हुए है। डॉ तरसेम को इस बात के लिए बधाई कि उन्होंने बहुत बारीकी से हालात को महसूस किया है और बयान किया है; लेकिन कुछ मुहावरे ऐसे भी प्रयुक्त हुए हैं जो नेत्रहीनों की दुनिया के नहीं लगते, जैसे कि 'कुछ तो प्रोफेसर साहब के टालने के कारण और कुछ बाद में उसकी पोल खुल जाने के कारण वह मुझसे मुँह चुराने लग
पड़ा था।' हो सकता है कि मैं बात को अधूरी ही पकड़ पा रहा हूँ, फिर भी इस बात का ध्यान शायद रखा जाना चाहिए।

निर्मला कपिला said...

कहाने बहुत सुन्दर्5 और यथार्थ क्3ए करीब लगती है।पंजाब के रिती रिवाज़ों का भी अच्छा वर्णन मिलता है।पंजाबी साहित्य को राष्ट्र भाशा की धारा से जोडने के लिये ये अच्छा प्रयास है सुभाश जी को बधाई।

Anonymous said...

Sir,
Anuvad-Ghar saraahniya v zaroori udhayam hain. hindi se punjabi mein
anuvaad ke liye bhi aapko setu banaana chahiye,
meri shubhkamnaein,
piyush
todaiya@gmail.com

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपकी बातें मन को छू गयीं, और ज्यादा क्या कहूं?
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थोड़ा अनैतिक ही सही, पर इसके सिवा चारा भी क्या है?
खाने पीने के शौकीन हों, तो यहाँ ट्राई जरूर मारें।

सुरेश यादव said...

डा.तरसेम की आत्मकथा का नीरव जी ने सुन्दर अनुवाद किया है. अनुवाद घर के माद्ध्यम से एक महत्वपूर्ण आत्म कथा मिली अनुज जी आप को बधाई. 9818032913

संगीता पुरी said...

अच्‍छा लगा आपका ब्‍लॉग .. इस ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

Sanjeet Tripathi said...

kafi kishtein padhi.. latest se yaha tak ki...balram jee se sehmat