समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

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Saturday, October 22, 2011

पंजाबी उपन्यास




''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़ कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।

साउथाल
हरजीत अटवाल
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥ सत्ताईस ॥

ईलिंग काउंसल के चुनाव आ रहे हैं। सभी पार्टियों ने अपनी पार्टी की ओर से काउंसलर खड़े करने हैं। पहले अपने-अपने उम्मीदवार नामज़द करने हैं। भारद्वाज सक्रिय हो जाता है। सोहनपाल उसके साथ है। जगमोहन और गुरचरन भी हैं। दिलजीत दूर रहता है, राजनीति से एक तरफ। सोहनपाल ने उसके लिए हिलसाइड वार्ड चुना है। यहाँ का काउंसलर प्रीतम फुल्ल अनपढ़-सा व्यक्ति है। लोगों में उसका बड़ा नाम नहीं है। कुछ हेराफेरी से पिछली बार नामज़दगी जीत गया था, वैसे योग्य नहीं है। उसके मुकाबले शाम भारद्वाज ज्यादा पढ़ा-लिखा है और स्पीकर भी बढ़िया है।
हर वार्ड के पार्टी मेंबर्स को उम्मीदवार नामजद करने हैं। वह तारीख़ आ जाती है। शाम भारद्वाज ने अपने बहुत सारे नये मेंबर जो कि इस वार्ड में रहते हैं, लेबर पार्टी में भर्ती किए हैं। मित्रों के साथ वैन गाड़ियाँ भरकर लेबर पार्टी के ऐक्टन वाले दफ्तर में पहुँच जाता हे। सेलेक्शन कमेटी के तीन व्यक्ति हैं। सबसे पहले तो चेयरमैन नये सदस्यों को पार्टी ज्वाइन करने के लिए उनका धन्यवाद करता है, स्वागत करता है और वह इतनी बड़ी उपस्थिति पर हैरान भी होता है। वह अर्जियों को देखते हुए बारी-बारी से संभावित उम्मीदवारों को स्टेज पर बुलाता है। हर व्यक्ति अपना परिचय देता है और बताता है कि वह काउंसलर क्यों बनना चाहता है। सभी अपनी-अपनी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए काउंसलर बनने की अपनी योग्यता के विषय में दावे करते हैं। फिर उपस्थित मेंबर उनसे भाँति-भाँति के प्रश्न पूछते हैं। कुल पांच लोगों की अर्जियां हैं- तीन एशियन और दो गोरों की। एशियनों में से सबसे अधिक प्रभावशाली भाषण मुख्तियार सिंह ग्रेवाल का है। वह कालेज में अध्यापक है। वह साउथाल में बच्चों की पढ़ाई और स्त्रियों के हकों पर ज़ोर देना चाहता है और साथ ही, वह साउथाल में घरों की बढ़ती संख्या से हो रही भीड़-भाड़ से भी चिंतित है। शाम भारद्वाज का भाषण आम मसलों के बारे में है जैसे कि साउथाल की गंदगी, बढ़ता ट्रैफिक और भाईचारे के अच्छे संबंध। इसी प्रकार प्रीतम फुल्ल रटी-रटाई बातें करता है। दोनों गोरे कुछ सही बाते करते हैं पर हाल में गोरों की संख्या कम है।
वोट पड़ते हैं। शाम भारद्वाज को इक्कीस, प्रीतम फुल्ल को उन्नीस, पीटर एंडरसन को सत्तरह, आर्थर मिलर को सोलह और ग्रेवाल को सात वोट पड़ती हैं। शाम भारद्वाज खुश है। वह अभी से ही स्वयं को काउंसलर बना समझ रहा है। लेबर पार्टी के उम्मीदवार ने साउथाल में से तो जीतना ही है। इस पार्टी का ही यहाँ पर ज़ोर है। अधिकांश एशियन लोगों के दिलों में यह बात घर किए बैठी है कि वे मज़दूर क्लास लोग हैं और लेबर पार्टी ही उनके लिए अच्छी है। इसलिए वे सभी लेबर पार्टी को ही वोट डालते हैं। शाम भारद्वाज को लगता है कि वह बस जीता ही जीता। वह अभी से सभी से बधाइयाँ ले रहा है। जगमोहन उसको दूर से हाथ हिलाकर बधाई देता है। प्रीतम फुल्ल अपने साथियों के साथ मुँह लटकाये खड़ा है। कुछेक लोग धीमे स्वर में कह रहे हैं कि यह तो सीधी हेराफेरी है। इस तरह अचानक मेंबरों की गाड़ियाँ भर कर ले आना, ये तो घटिया राजनीति है। प्रीतम फुल्ल को लगता नहीं था कि वह नामजदगी से यूँ हाथ धो बैठेगा।
जगमोहन सब उम्मीदवारों के भाषण ध्यान से परखता है। उसको सबसे बढ़िया बातें ग्रेवाल की लगती हैं। वह एक तरफ खड़ा होकर लोगों की ओर देख रहा है। जगमोहन उसके करीब जाकर उसे सम्बोधित होते हुए कहता है -
''मुझे आपकी बातें बहुत अच्छी लगीं, पर मुझे लगता है, आपने अपना होमवर्क पूरा नहीं किया। यही कारण है कि नॉमीनेशन नहीं मिली।''
ग्रेवाल हँसते हुए कहता है-
''नॉमीनेशन मिलना तो दूर की बात है, ये जो छह-सात वोट पड़े हैं, ये भी लोग धोखे में डाल गए हैं।'' कहकर वह ज़ोर से हँसता है।
जगमोहन कहता है, ''सेलेक्शन का यह तरीका ही गलत है।''
''सेलेक्शन का तरीका तो ठीक है, पर हम लोग हेराफेरी करने से नहीं हटते।''
ग्रेवाल के कहने पर जगमोहन कुछ झेंप-सा जाता है। उसको लगता है कि ग्रेवाल उसके बारे में ही कह रहा है कि वह शाम भारद्वाज की वोट बनकर आया हुआ है। ग्रेवाल पुन: कहता है-
''मैंने तो यह तुर्ज़बा ही किया है, वैसे मेरा फील्ड नहीं है यह।''
''आपका कौन-सा फील्ड है ?''
''मैं युनिवर्सिटी टीचर यूनियन में काम कर रहा हूँ। लोकल पॉलिटिक्स में इन्वोल्व होने के लिए ट्राई किया था, पर मेरे वश की बात नहीं।''
यहीं से जगमोहन का ग्रेवाल से परिचय होता है जो कि जान-पहचान की ओर बढ़ता है। एक दिन वे ईलिंग शॉपिंग सेंटर में मिलते हैं और फिर एक दिन ‘द-ग्लौस्टर’ में। विचारों का आदान-प्रदान होने लगता है। सम्बन्ध दोस्ती में बदलने लगते हैं। वे एक-दूसरे को अपना फोन नंबर देते हैं। ग्रेवाल अपने बारे में बताते हुए कहता है कि एक समय में उसे कविता लिखने का शौक रहा है। वह कामरेड इकबाल को भी भलीभांति जानता है। वह जगमोहन को साउथाल के लेखकों के विषय में कितना कुछ बताता है, परन्तु जगमोहन को इसमें अधिक दिलचस्पी नहीं है। वह 'वास-प्रवास' में से कभी कोई लेखादि पढ़ लेता है, नहीं तो पढ़ने में उसकी अधिक रुचि नहीं है। हाँ, अंग्रेजी की अख़बार वह लगातार पढ़ता है, चाहे कोई भी हाथ में आ जाए। 'द मैन' की मसालेदार ख़बरें तो वह वक्त ग़ुज़ारने के लिए पढ़ा करता है।
एक दिन अंग्रेजी की अख़बार 'द टाइम्ज़' में साउथाल की महिलाओं की संस्था 'सिस्टर्ज इन हैंड्ज़' के बारे में एक आलेख छपता है। ग्रेवाल पढ़ता और एकदम जगमोहन को फोन करता है। कहता है-
''आज का टाइम्ज़ देखा ?''
''नहीं तो।''
''देख फिर और पढ़, इन औरतों के बारे में किसी ने बड़ा लम्बा-चौड़ा आर्टिकल लिख मारा है।''
''अच्छा!''
जगमोहन टाइम्ज़ खरीदता है। ख़बर पढ़कर वह ग्रेवाल को फोन घुमाता है। कहता है -
''सर जी, यह तो किसी ने इनकी कुछ ज्यादा ही फेवर कर दी, वैसे ये इतने के लायक नहीं।''
''मेरा तो दिल कर रहा है कि टाइम्ज़ को लैटर लिखूँ और कहूँ कि किसी संस्था के बारे में लिखने से पहले उसके कामों के बारे में पूरी जांच तो कर लिया करो।''
''बात तो आपकी ठीक है सर जी, ये औरतें काम इतना नहीं करतीं। बस, ख़बरों में रहने के चक्कर में रहती हैं। ऐसे ही टाइम्ज़ का कोई रिपोर्टर फंसा लिया होगा।''
''वैसे तो अखबारवालों को भी सभी कम्युनिटीज़ को प्रतिनिधिता देनी होती है। एशियन स्त्रियों का अन्य कोई संगठन है भी तो नहीं।''
''सर जी, ये सब छोटे-से सर्किल में ही घूमती फिरती है, बस।''
जगमोहन ग्रेवाल को हमेशा 'सर जी' कहकर ही बुलाता है। सर जी मजाक में कहना आरंभ किया था कि इंडियन लोग अंकल के साथ भी जी लगा देते हैं और डैडी के साथ भी और इसी प्रकार सर के साथ भी। जगमोहन हमेशा कहता है कि इंडिया में लोगों को यह भी नहीं पता कि शब्द ‘सिस्टर’ सरनेम के साथ लगाया जाता है कि पहले नाम के साथ। उसने 'सर जी' कहना शुरू किया और अब भी 'सर जी' ही कहा करता है। यही पक्का हो गया है। ग्रेवाल हालांकि उससे अट्ठारह-बीस साल बड़ा है, परन्तु दोस्तों की तरह ही व्यवहार करता है। दोस्तों की भाँति ही खुली बातें कर लिया करता है। एक दिन जगमोहन उसके सम्मुख बैठकर सिगरेट पीने लगता है तो ग्रेवाल कहता है-
''ला यार, मुझे भी लगवा एक।''
जगमोहन को ज़रा-सी हैरानी होती है और पूछता है-
''सर जी, आप भी!''
''नहीं यार, मैं कहाँ। यह तो तुझे देखकर हुड़क-सी जाग पड़ी। कभी पिया करता था, अब मुश्किल से इस आदत से निजात पाई है।''
अब वे प्राय: मिला करते हैं। अधिकतर ग्रेवाल के घर ही बैठते हैं। ग्रेवाल अपने घर में अकेला रहता है। सिस्टर्ज इनहैंड्ज़ उनकी बात में प्राय: उपस्थित रहती हैं। ग्रेवाल जगमोहन से पूछता है -
''तू इस संस्था की ओर इतना फैसिनेटिड क्यूँ है ?''
इसका उत्तर जगमोहन के पास नहीं है। एक दिन उसके मन में कुछ ऐसा आता है कि वह ग्रीन रोड पर पंद्रह नंबर का दरवाजा जा खटखटाता है। उसके मन में है कि सिस्टर्ज इनहैंड्ज़ वाली स्त्रियाँ उतना कुछ नहीं कर रहीं, जितना करने की आवश्यकता है और जितना कुछ वे कर सकती हैं। उन्हें अपना कार्यक्षेत्र और फैलाना चाहिए। एक औरत दरवाज़ा खोलती है। वह कुछ डरी हुई-सी है। वह पूछती है -
''बताओ, मैं क्या कर सकती हूँ आपके लिए ?''
''मुझे कुलविंदर से मिलना है।''
''वह तो है नहीं।''
''वैसे होती तो यहीं है न ?''
''नहीं, अब वह यहाँ नहीं आया करती।''
''और प्रीती ?''
''प्रीती कौन ? मैं नहीं जानती।''
वह औरत न में सिर हिलाती है। जगमोहन तो वहाँ सिर्फ़ कुलविंदर को ही जानता है जो कि उसके पास सलाह लेने आई थी। फिर इधर-उधर ही मिली थी, एक-दो बार। प्रीती का नाम तो अचानक ही उसके मन में आ जाता है। प्रीती ने उसको बताया था कि वह भी इस संस्था से जुड़ी हुई है। प्रीती तो उससे बहुत दिनों से मिली ही नहीं है। उसको कभी-कभी उसकी याद भी आती है। एक बार भूपिंदर से भी उसके बारे में पूछा था। भूपिंदर ने बताया था कि प्रीती का पति उसको नाटकों में काम नहीं करने दे रहा। यह बात तो वह पहले से ही जानता है। अब इसका अर्थ है कि प्रीती का इस संस्था के साथ भी कोई सम्पर्क नहीं है। वह वहाँ से चल पड़ता है। कुछेक कदम ही चलता है तो पीछे से आवाज़ आती है-
''एक्सक्यूज़ मी।''
वह पलटकर देखता है। दरवाजे में एक अन्य औरत खड़ी है। वह पूछती है-
''कोई काम ?''
''नहीं, खास नहीं। कुलविंदर से ही मिलना था।''
''वह तो यहाँ से जा चुकी है। यदि कोई काम है, हमारे करने वाला तो बताओ।''
''नहीं, मैंने टाइम्ज़ में आपकी आर्गनाइजेशन के बारे में लेख पढ़ा है, उसके विषय में ही डिस्कस करना था कुछ।''
''आओ, मेरे साथ करो, मैं यहाँ की कन्वीनर हूँ।''
जगमोहन उसके पीछे-पीछे अन्दर चला जाता है। फ्रंट रूम में कुछ कुर्सियाँ पड़ी हैं। एक बड़ा-सा मेज लगा हुआ है। वह औरत उसको वहाँ बैठने का संकेत करती है और स्वयं भी बैठ जाती है। पूछती है-
''आपने ही वहाँ लीगल एडवाइज़ सेंटर खोल रखा है, लेडी मार्गेट रोड पर।''
''हाँ, पर बन्द करना पड़ा।''
''क्यों ?''
''कोई आता नहीं था।''
''हमने तो आप तक अप्रोच की थी, पर आपने ही मना कर दिया।''
''क्योंकि मैं तो इमीग्रेशन के केस ही करता था, दूसरे लॉ के बारे में मुझे कोई ज्यादा जानकारी नहीं।''
''बताओ, कौन सी बात करनी है?... बॉय द वे, मॉय नेम इज़ लक्ष्मी।''
''आय'एम जगमोहन।''
''आई नो ! बस बात बताओ।''
''मुझे तो यह कहना है कि जितनी आपकी कैपेसिटी है, आप लोग उतना काम नहीं कर रहे।''
''आपने आर्टिकल पढ़ा नहीं ? हमारी उपलब्धियों के बारे में नहीं पढ़ा आपने इस आर्टिकल में ?''
''देखो, इस आर्टिकल का क्या मकसद है या इसके माध्यम से इसका राइटर क्या कहना चाहता है, यह एक अलग सवाल है। मुझे तो यह कहना है कि आप स्त्रियों की मैरीड लाइफ़ की प्रॉब्लम्स को ही कवर कर रहे हो, जब कि स्त्रियों की और भी तकलीफ़ें हैं।''
''फॉर एक्ज़ाम्पिल ?''
''फॉर एक्ज़ाम्पिल... ये जबरदस्ती के विवाह, ये ऑनर किलिंग और इंडिया-पाकिस्तान में औरतों के संग कितनी ज्यादतियाँ हो रही हैं।''
''देखिए, हमारी कैपेसिटी बहुत लिमिटेड है, हमें मालूम हैं, औरतों की बहुत प्रॉब्लम्स हैं, पर इस वक्त बड़ा मसला औरत के ऊपर हो रही वायलेंस का है। भारतीयों में पंजाबी मर्द अपनी पत्नियों के साथ बहुत मारपीट करते रहे हैं, ये लोग शराब पीते हैं और शराब पीकर औरत पर हाथ उठाते हैं। दूसरा हम बुजुर्ग़ औरतों की प्रॉब्लम्स को भी डील करते हैं।''
''यह मैं जानता हूँ, मेरा कहना है कि इस एरिये का विस्तार करो, और काम करो।''
''हमारे पास ग्रांटों की कमी है, फिर भी हमने सुखी क़त्ल कांड में आवाज़ उठाई थी।''
''सिर्फ़ एक प्रदर्शन किया था।''
''और एक प्रदर्शन ही काम कर गया, क़ातिल को सज़ा हो गई। सच तो यह है कि एक प्रदर्शन भी बहुत मुश्किल से हो पाता है। सभी औरतें काम करती हैं और जुलूस में आने के लिए हसबैंड की अनुमति चाहिए। आप शायद हमारी प्रॉब्लम को इस एंगिल से नहीं समझ सकते। अब पिछले दिनों अपने एक पंजाबी व्यक्ति ने किसी से अपने घर को आग लगवा दी जिसमें उसकी तीन बेटियाँ और पत्नी जलकर मर गईं। उसने आग इसलिए लगवाई कि उसकी पत्नी बेटा पैदा करने के काबिल नहीं थी।”
''मुझे पता है इस कहानी के बारे में। मैंने 'वास-प्रवास' में पढ़ा था।''
''हम इस इशू को लेकर जुलूस निकालना चाहती हैं, पर औरतें इकट्ठी नहीं हो रहीं। औरतों को काम पर से लौटकर घर संभालना पड़ता है, बच्चे भी और पति के हुक्म भी सुनने होते हैं। सच बात तो जगमोहन जी यह है कि यह पत्नी शब्द गलत है, असली शब्द तो स्लेव है। जब हम कहते हैं कि वह औरत इस आदमी की पत्नी है, हमें कहना यह चाहिए कि वह औरत इस आदमी की गुलाम है।''
(जारी…)
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Saturday, September 17, 2011

आत्मकथा


एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा

धृतराष्ट्र
डॉ. एस. तरसेम
हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव

चैप्टर-23
बुध कि बुद्धू

इतिहास बताता है कि ईसवी से 563 साल पहले कपिलवस्तु के राजा सुधोदन के घर एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम सिद्धार्थ रखा गया। वैसे उसका पारिवारिक नाम गौतम था। होश संभालने पर उसने शहर में पहले एक रोगी और बाद मे एक वृद्ध को देखा। तीसरे फेरे में उसने एक अर्थी देखी।
राज कुमार ये सब दृश्य देखकर उदास रहने लगा और आख़िर एक रात अपनी सोई हुई पत्नी यशोधरा और फूल भर के बेटे राहुल को छोड़कर जीवन के सही अर्थों को समझने के लिए महलों में से निकल कर जंगल की तरफ चल पड़ा। तपस्या की, भूख से सूखकर पिंजर बन गया। आख़िर सहज जीवन का राह सिद्धार्थ ने खोज लिया और वह बुध बन गया।
कुछ इस तरह के ही ख़याल लेकर एक सुबह मैंने घर छोड़ दिया था। उन दिनों मैं सरकारी मिडल स्कूल, महिता में मुख्य अध्यापक था। सन् 1972 की बात है और दिन थे गर्मियों के। कुछ गिले-शिकवे पत्नी से थे। परन्तु असल में मैं परेशान अपनी आर्थिक मंदहाली के कारण था। तनख्वाह के अलावा अन्य कोई आमदनी नहीं थी। बेहद तंगी-तुर्शी के पश्चात भी तपा मंडी की 8 नंबर गली में बनाये मकान का कर्ज़ा नहीं उतर रहा था। लोहे और लक्कड़ वाले के पैसे ज्यों-के-त्यों खड़े थे। ईश्वर में विश्वास न होने के कारण मेरी उदासीनता मुझे घर छोड़कर बुद्ध की राह चलने के लिए मजबूर कर रही थी। जब करीब नौ बजे बस में चढ़ा तो यह पता नहीं था कि कहाँ जाना है ? बस, दिल में भूत सवार था कि भगवे वस्त्र पहन कर लोगों में समानता का प्रचार करना है। साधू-संतों की बात लोग मानते भी अधिक हैं और मेरे भगवे वस्त्रों को देखकर मेरी सिक्खी-सेवकी बढ़ जाएगी और मैं जल्दी ही जिस इलाके में भी रहूँगा, वहाँ का पथ-प्रदर्शक बन जाऊँगा और लोगों के विचारों को बदलकर रख दूँगा। परन्तु, क्रोध और जोश मनुष्य को सही सोचने नहीं देते। मेरी स्थिति भी कुछ इसी तरह की थी। क्रोध का मारा मैं घर से चला था और जोश में शेखचिल्ली की भाँति किले बनाये जा रहा था। इस जोश में पता नहीं कब मैं पटियाला पहुँच गया, फिर अम्बाला और फिर कालका। अभी चार बजे थे। मेरे लिए चार का समय छह के बराबर था। उस समय मेरी नज़र धूप-छांव से कुछ बेहतर थी। पर शाम होने पर मैं कहीं भी चलने-फिरने के योग्य नहीं रहता था। कालका में मुझे कोई उपयुक्त धर्मशाला नहीं मिली। आधा-पौना घंटा रिक्शा पर धक्के खाता वापस बस-अड्डे पर आ गया, जहाँ से मुझे सीधी चंडीगढ़ की बस मिल गई।
दिन छिप चुका था। बस से उतरते जिस रिक्शावाले ने भी बांह पकड़ी, उसी के संग चल दिया। पाँच रुपये लेकर वह मुझे एक गेस्ट हाउस में छोड़ गया। मेरे लिए वह इसलिए सस्ता था कि ऐसे कठिन समय में वह मुझे मात्र पाँच रुपये में ही ठिकाने पर पहुँचा गया था। शायद उसे फायदा यह हुआ होगा कि उसने गेस्ट हाउस के मालिक से भी पाँच-दस रुपये ले लिए होंगे। गेस्ट हाउस के कमरे में बैठकर मुझे सुख का साँस आया। लेकिन साथ ही चिंता और घबराहट की कोई लहर-सी अन्दर दौड़ जाती क्योंकि अब तक मेरे घर न पहुँचने के कारण सबको यह पता तो चल ही गया होगा कि मैं या तो घर से चला गया हूँ या किसी हादसे का शिकार हो गया हूँ। पत्नी सुदर्शना देवी तो यह सोच रही होगी कि मैं गुस्से के कारण चला गया हूँ पर अन्य रिश्तेदार और यार-दोस्त मेरे किसी हादसे में गंभीर रूप से घायल होने या मेरी मौत तक के कयास लगा रहे होंगे। इस सबकुछ के बावजूद मैंने घर वापस लौट जाने के विषय में उस रात बिलकुल ही नहीं सोचा था। सुबह से पानी तक नहीं पिया था। इसलिए पहले चाय और उसके तुरन्त बाद रोटी का आर्डर दे दिया। मैं सोच रहा था कि आदमी कितना अजीब है। मैंने बड़े स्वाद से चाय पी और फिर रोटी भी बहुत अच्छी लगी। मैंने शायद यह सोचा ही न हो कि आज की शाम मेरे घर में रोटी पकी होगी। क्रांति ज़रूर रो रहा होगा। बॉबी अभी गोद में ही था। उनके बारे में सोचकर भी दिमाग पर कोई बोझ न पड़ा। दिल जैसे पत्थर बन गया हो। उस समय तो यह बात मेरे दिमाग में नहीं आई थी पर आज सोचता हूँ कि आख़िर मनुष्य सिर्फ़ अपने और अपने अस्तित्व के लिए ही दौड़-भाग करता है। न माँ-बाप और न बच्चे, गुस्से और खतरे में उसे अपने लगते हैं और न पत्नी और प्रेमिका। दूसरा, मैं उस समय भी सोचता था और अब भी सोचता हूँ कि मनुष्य अपने आप को ही सही समझता है, दूसरा व्यक्ति उसे गलत लगता है। उस समय मैं अपने आप को बिलकुल ठीक समझता था। तब मुझे लगता था कि सुदर्शना देवी मेरी कुछ नहीं लगती। घर की खराब आर्थिक हालत के बावजूद वह मुझसे पैसों की आस रखती है। भाई, बँटवारा करवाने वाली सल्हीणे वाली बहन और जीजा जी के विषय में सोचकर मेरा मन नफ़रत से भर रहा था जिन्होंने न मेरे अंधेपन के बारे में सोचा और न मेरे बीवी-बच्चों के बारे में। दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया। घर से बाहर निकालने और बँटवारे की उस कुटिल नीति के विषय में सोचकर मुझे अपना कोई भी रिश्तेदार अपना नहीं लगता था।
शायद मैं नहाया नहीं था। सिर्फ़ मुँह-हाथ ही धोया था, पर नाश्ता ज़रूर किया था। जब पैसे पूछे, गेस्ट हाउस के मालिक ने सिर्फ़ सत्तर रुपये मांगे। रात की रिहाइश, चाय-पानी, खाना और सुबह का नाश्ता और रिक्शेवाले की कमीशन आदि के बारे में मैंने मन ही मन हिसाब लगाया। मुझे यह रकम कतई लूट नहीं लगी थी। लेकिन इस बात से अवश्य चिंतातुर था कि मेरे पास अब मात्र 125 रुपये ही रह गए थे। गेस्ट हाउस के मालिक ने एक मेहरबानी यह की कि रिक्शा पर बस-अड्डे जाने वाली सवारी के साथ मुझे बिठा दिया और उसने यह भी कह दिया कि बाबूजी से पैसे न लेना। शायद उसे मेरी कम निगाह के बारे में पता चल गया था। उपकार आख़िर उपकार होता है, छोटा हो या बड़ा। सयाना मनुष्य कभी उपकार भूलता नहीं है। गेस्ट हाउस से चलने के समय मैं सोच रहा था कि अब मैं जुआर (अब ज़िला- ऊना, हिमाचल प्रदेश में) या नादौण(अब ज़िला-हमीरपुर में) जाऊँगा। जुआर के जनता हाई स्कूल में मैं 1961-62 में करीब आठ महीने रहा था और 1966 में नादौण के सरकारी हॉयर सेकेंडरी स्कूल में सिर्फ़ साढ़े पाँच महीने। लेकिन यह इलाका मुझे घरवालों से लुक छिप कर रहने के लिए उपयुक्त ठिकाना लगा। वैसे भी, मैं इस इलाके से परिचित होने के कारण इधर ही अपना गुप्त ठिकाना बनाना चाहता था।
चंडीगढ़ के बस-अड्डे पर पहुँचते ही संयोग से मुझे ऊना की बस मिल गई। बस में बैठने के बाद मैं जैसे सारा गुस्सा-गिला भूल गया था। मेरे पर बस यही धुन सवार थी कि भगवे वस्त्र पहनकर मैं लोगों में मनुष्यता की समानता का प्रचार करूँगा। महात्मा बुद्ध के अष्ट मार्ग के कई नुक्ते मेरे दिमाग में आ रहे थे। पर बोध धर्म को मैं वर्तमान हालात के अनुसार ढालकर ही प्रचार करना चाहता था। बुद्ध से लेकर बीसवीं सदी के तीन चौथाई सफ़र तक पहुँचकर दुनिया बहुत बदल गई है। वैसे भी, माक्र्सवाद भगवे वस्त्र पहनने के बावजूद मेरे दिलो-दिमाग से बाहर जाने के लिए तैयार नहीं था। यह आर्थिक असमानता ही थी जिसके कारण मुझे घर छोड़ना पड़ा था। वैसे भी, इस प्रकार के भगवे वस्त्रों में आर्थिक, सामाजिक समानता के प्रचार करने वाले एक साधू आनन्द स्वामी का माडल मेरे सामने था। वर्ष 1970-71 में चार-पाँच बार वह संत मेरे घर में आया ही होगा।
दो घंटे से कुछ अधिक समय में बस ऊना पहुँच गई। मैं पहले कभी जुआर, कांगड़ा या नादौण जाने के लिए इस रूट से होकर नहीं गुजरा था। यूँ भी मैं बस में चुपचाप बैठा था। धूप चढ़ आने के कारण बस के करीब रेहड़ियों और लोगों के दिखाई देने तथा बस के अन्दर टोपियों वाले पहाड़ियों और पहाड़िनों की बोली के कारण मुझे इस वक्त कल घर में घटित हुई घटना का कसैलापन कुछ कम होता महसूस हुआ। ऊना में कुछ देर खड़ा रहने के बाद मुझे अम्ब की बस मिल गई, जिसे आगे जिस तरफ जाना था, उस इलाके की मुझे अधिक जानकारी नहीं थी। इसलिए मैं अम्ब में ही उतर गया। इसे एक संयोग ही समझो कि यहाँ खडूर साहिब से आई एक बूढ़ी औरत मिल गई, जिसे डेरा बाबा वडभाग सिंह जाने से पहले मैडी (यहीं डेरा वडभाग सिंह का गुरुद्वारा है) गाँव के साथ लगते बढ़ई के एक घर में जाना था। ये बढ़ई मैडी में लगने वाले मेले में हर साल अपना लकड़ी का सामान बेचने आया करते थे। उनकी इस जान-पहचान के कारण ही उस बूढ़ी स्त्री का उनसे संबंध परिवारवाला बन गया था। बुढ़िया का नाम था- नामो (शायद पूरा नाम हरनाम कौर हो) क्योंकि इस बढ़ई परिवार का एक लड़का जुआर में 1961-62 में मेरे पास पढ़ा था, इसलिए नामो के कहने पर मैंने उसके संग जाना स्वीकार कर लिया। वैसे भी, मेरे पास ठिकाने का कोई स्पष्ट नक्शा नहीं था और उदासीनता के कारण मुझे कोई भी कहीं भी ले जा सकता था। मैं नामो के संग चल पड़ा। उसे अम्ब से कुछ आगे जाकर उस गाँव का पैदल रास्ता मालूम था। हम दोनों का रिश्ता जैसे पल छिन में ही माँ-बेटे वाला बन गया हो। वह मुझे बेटा कहकर बुलाती थी और मैं उसे माँ कहकर। हालांकि दिन के समय मुझे चलने में कोई कठिनाई नहीं थी, पर ज्यों-ज्यों अंधेरा बढ़ता, त्यों-त्यों मेरे लिए चलना कठिन होने वाला था। इसलिए माँ को मैंने सारी बात पहले ही सच सच बता दी। पर सच सच वो बात बताई जो मेरी नज़र की कमज़ोरी से संबंध रखती थी। उसने मुझे भरोसा दिलाया कि दिन छिपने पर वह मेरी बांह पकड़कर मुझे ले जाएगी। मैं चिंता न करूँ। समझो, हम दोनों को एक-दूसरे का आसरा मिल गया था। वह एक अपने बुढ़ापे के कारण और दूसरा- औरत जात होने के कारण किसी सज्जन बच्चे का आसरा चाहती थी और मैं रात बिताने के लिए उसके संग चल दिया था। रात तो मैं अम्ब में भी काट सकता था। वहाँ मेरे ठहरने का प्रबंध भी आसानी से हो सकता था। पर पता नहीं, यह कैसी भटकन थी जो मुझे किसी पुख्ता फ़ैसले पर पहुँचने नहीं दे रही थी। जब हम सड़क पर चले जा रहे थे तो मैं आगे था और माँ पीछे। नहिरी से कुछ पहले कोई पहाड़ी राह था जो उस गाँव को जाता था, जहाँ हमको पहुँचना था।
दिन छिपने के कारण मैंने माँ की बांह पकड़ ली और इस तरह मैं अपने डर को छिपा कर माँ को हौसला देते हुए चले जा रहा था। अन्दर ही अन्दर अपने आप को कोस रहा था कि अगर इस तरह घर से जाना ही था तो किसी अच्छी सी जगह पहुँचता। किसी धार्मिक ठिकाने पर चला जाता जहाँ न रोटी की मुश्किल आती और न सवेर-शाम बाहर-अन्दर जाने की।
जब हम आगे बढ़ चले तो माँ ने अपनी औलाद की उपेक्षा का राग अलापना आरंभ कर दिया। मैं सोच रहा था कि इस माई के नैण-प्राण कायम हैं, चार पैसे भी पल्ले हैं, तभी अकेली चल पड़ी है। इस तरह मेरी बेबसी और मेरी अपनी माँ की मजबूरी जब इस माई के हालात के साथ मेरे अन्दर गुत्थम-गुत्था हो रही थी तो मेरे चलने की रफ्तार पहले से अवश्य ही कुछ कम हो गई थी। जब कुछ रोशनियाँ दिखाई देने लग पड़ीं तो मैंने अंदाजा लगाया कि जहाँ माँ को जाना है, वह ठिकाना अब नज़दीक ही है, और वह नज़दीक था भी। जब हम मिस्त्रियों की छन्न में दाख़िल हुए, सभी को जैसे चाव चढ़ गया हो। दोनों कमरों में रोशनी थी, एक कमरे में ग्लोब लैम्प जल रहा था और दूसरे कमरे में सरसों के तेल का दीया। बजाय इसके कि वे मेरे बारे में पूछ-पड़ताल करें, मैंने अपनी सफाई आप ही देना प्रारंभ कर दिया। सचमुच उनका वह लड़का मेरे से पढ़ा हुआ था जिसके बारे में मैंने राह में अंदाजा लगाया था। मैंने उन्हें बताया कि मुझे जाना तो जुआर था, पर माता को आप तक पहुँचाने के लिए मैं इधर आया हूँ। असल में, यह सारी मेरी अपनी घड़ी हुई कहानी थी जो उन्हें जंच गई।
चाय पीने का वहाँ उन दिनों अधिक रिवाज नहीं था। उनके यहाँ लवेरा (दूध देने वाला पशु) था। वे गरम दूध ले आए। मैंने सिर्फ़ आधे गिलास के करीब दूध पिया। रोटी बिलकुल नहीं खाई थी। मुझे डर था कि कहीं रात में रोटी खाने के कारण बाहर न जाना पड़े। उनके बार बार ज़ोर दिए जाने पर मैंने सिर्फ़ यही कहा कि मुझे भूख नहीं है। जबकि मैं चाहता तो रोटी खा सकता था। यह अलग बात है कि अन्दर ही अन्दर मैं घर के खराब हालात और अपनी कम निगाह के कारण बहुत दुखी था, बहुत ही उदास। उन्होंने गरम पानी से मेरे पैर धुला दिए थे। हाथ-मुँह भी धो लिया था और यह कहकर मैं लेट गया था कि मुझे सुबह कोई जुआर तक छोड़ आए, क्योंकि वहाँ से पहाड़ी रास्ते का मुझे पता नहीं था और वैसे भी, जुआर स्कूल की नौकरी के समय वाली मेरी दृष्टि से अब वाली दृष्टि बहुत कम हो गई थी। नींद पूरी नहीं आई थी। अधिकांश समय भविष्य के लिए कोई ठिकाना खोजने और अपनी किस्म का जीवन बिताने की उधेड़बुन में ही बीत गया। सवेर का उजाला कमरे में आने के साथ ही मैं उठकर बैठ गया। वह लड़का जिसका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ, वही मेरी खातिरदारी के लिए मेरे पास आया। अब वह पूरा आदमी बन चुका था। हम दोनों बाहर गए। जंगल-पानी के बाद जैसे मन को शान्ति मिल गई हो। वहीं बहते पानी में मैंने मुँह धो लिया था और आते ही मैंने कहा था कि वह मुझे जुआर तक छोड़ आए। उसने रस्मीतौर पर एक दो बार रहने के लिए कहा। रास्ते कितनी ही देर हम स्कूल की बातें करते रहे, उसके सहपाठियों की बातें, अन्य विद्यार्थियों की बातें और अध्यापकों की बातें।
माँ और उस परिवार के बुजुर्ग़ को दुआ-सलाम करने के पश्चात हम जुआर के लिए चल पड़े। उन्होंने मुझे राह के लिए एक छड़ी भी दी। शायद, बड़े मिस्त्री को मेरी मुश्किल का अंदाजा हो गया था। अम्ब से आते समय भी जब चढ़ाई-उतराई आती तो पैर फिसलने का डर रहता। मेरी गुरगाबी की ऐड़ी के कारण मैं फिसलने से कई बार बच गया था। जब मैं जुआर स्कूल में मास्टर हुआ करता था, उस समय भी मैं घर से स्कूल आने तक और किसी अन्य चढ़ाई-उतराई के लिए छड़ी रखा करता था। अब तो इस किस्म की छड़ी की मुझे और ज्यादा ज़रूरत थी। पिछले अनुभव के कारण मुझे जुआर पहुँचने तक कोई खास मुश्किल नहीं आई थी। लेकिन इस रास्ते में जो भी खाइयाँ आईं या चढ़ाई-उतराई आई, वे कल शाम वाली से कठिन होने के बावजूद आसान लगी थीं। कारण यह था कि दिन के उजाले के कारण मुझे चलने और किसी का चेहरा-मोहरा देखने में कोई अधिक कठिनाई नहीं आ रही थी।
ऊँचे चबूतरे वाला दुकानदार जो कपड़ा भी बेचता था और किरयाने का सामान भी, उसमें कोई तब्दीली नहीं आई थी। वहीं से मैंने छह मीटर भगवा वस्त्र लिया और एक लुंगी भी। कपड़े की दुकान से खरीद-फरोख्त से पहले मैंने उस लड़के का धन्यवाद करके उसे लौटा दिया था। मैं नहीं चाहता था कि किसी को भी मेरी भविष्य की योजना का कुछ पता चले। साथ वाली नाई की दुकान से मैंने सिर के बाल कटवाये। मशीन या उस्तरा नहीं फिरवाया था। कैंची से बाल इतने छोटे करवा लिए थे कि देखने में मैं कोई संत-महात्मा लगूँ। शेव भी करवाई और मूंछें भी बिलकुल साफ़ करवा दीं। सिर मुंडवाने का मेरा यह पहला अवसर था और मूंछे साफ़ करवाने का दूसरा। हाँ, सच कपड़े वाली दुकान से एक बनियान भी ले ली थी।
अब मैं एक एक पैसा खींच खींच कर इस्तेमाल करने के बारे में सोच रहा था, क्योंकि मेरे पास सिर्फ़ 80 रुपये ही रह गए थे। लेकिन जल्द ही 'हीर दमोदर' की एक तुक मुझे याद आ गई - 'पल्ले रिज़क ना बन्हदे पंछी ते दरवेश...'। बस, इस सोच से ही मानो मैं सारी चिंता से मुक्त हो गया था। बस मेरे जाने-पहचाने रास्तों और अड्डों से गुजरती हुई आख़िर नदौण पहुँच गई और वहाँ उतर कर मैं बाज़ार के रास्ते होता हुआ उस चौंक में पहुँच गया, जहाँ से एक रास्ता मेरे आर्य समाजी परिवार के विद्यार्थियों के घर को जाता था और दूसरा रास्ता नदौण वाली मेरी उस माँ के घर को जाता था, जिसका नदौण में स्कूल की नौकरी के समय मैं किरायेदार रहा था। फिर, माँ का घर आ गया। वहाँ एक मिनट रुका, पर सिर्फ 15 फ़ुट की दूरी से ही मैं सीधा ब्यास दरिया के लकड़ी के पुल की तरफ हो गया। एक तो गरमी का मौसम था, दूसरा मैं सुबह से नहाया नहीं था, तीसरे मैंने भगवे वस्त्र पहन कर अपना जीवन-मार्ग बदलना था, जिस कारण लकड़ी का पुल पार करने के बाद मैं बायें हाथ ब्यास दरिया के किनारे-किनारे चला गया। यहीं किसी वक्त नदौण में नौकरी के समय मैं सवेरे-सवेरे नहाने के लिए आया करता था। किनारे और इसके करीब पानी की गहराई के बारे में मुझे अच्छा अंदाजा था। मैंने जूती उतारी, पैंट-शर्ट और बनियान उतार कर दरिया के किनारे बूटों पर रख दी। लुंगी के नीचे भगवे वस्त्र का बड़ा टुकड़ा रखा और छोटे टुकड़े को कमर में बांध लिया। कच्छा उतार कर लुंगी के नीचे रख दिया। ऑंखों पर पानी के छींटें मारे, फिर सिर पर हथेलियों का चुल्लू बनाकर पानी डाला, कुल्ला किया और पानी में उतर गया। पानी में उतरते समय मेरे अन्दर के विचार परस्पर टकरा रहे थे - बुद्ध बनकर प्रकाश बांटने के विचार या अपनी जीवन-लीला समाप्त करने के। संयोग ही कुछ ऐसा बना कि जीवन लीला की समाप्ति से पहले ही दो और नौजवान वहाँ नहाने के लिए आ गए। उन्होंने मुझको ऐसी बातों में लगाया कि मैंने नहा कर कच्छा पहन लिया, गीले भगवे वस्त्र को अच्छी तरह निचोड़ा और फिर हवा में फटक कर उसी से बदन को अच्छी तरह पोंछा। दूसरे भगवे वस्त्र का टुकड़ा मैंने गर्दन से नीचे तक इस तरह लपेट लिया जैसे आनन्द स्वामी पहना करता था। गीला कपड़ा भगवे वस्त्र के ऊपर रख लिया और पैंट-शर्ट और पुरानी बनियान को तहा कर लुंगी में लपेट लिया।
ज्वालामुखी वाली सड़क का मुझे पता था। दायें हाथ में छड़ी और बायीं बगल में लुंगी लेकर मैं उस सड़क की ओर हो लिया। जब मैं नदौण स्कूल में काम करता था, उस समय शौक-शौक में ही दो बार मैं पैदल चलकर ज्वालामुखी गया था। राह में डंगर चराते लड़के और गागरों में पानी ढोतीं स्त्रियाँ मिलीं। मन कभी बेचैन हो जाता और कभी फिर सामान्य हो जाता। किसी द्वारे जाकर अलख जगाने का ढंग अभी मुझे नहीं आता था। पर जब इस राह पर चल ही पड़ा था तो यह ढंग सीखना भी ज़रूरी था। कुछ समय के उपरांत सेवक अपने आप राशन-पानी डेरे में पहुँचा देंगे, पर हाल की घड़ी तो मांगकर खाना पड़ेगा। वारिस के किस्से में बाल नाथ की जोग लेने के समय दी गई शिक्षा की एक एक पंक्ति दिमाग में बिजली की भाँति कौंध गई। काम, क्रोध, मोह, लोभ, अंहकार से मुक्त होने के संबंध में सभी धर्मों में साझी शिक्षा मन में बसा रहा था। बुद्ध का अष्ठ मार्ग और बुध्द और जैन दोनों धर्मों के अहिंसा संबंधी सिध्दांत मेरी जीवनधारा के अंग बनने थे। लेकिन इनसे भी कुछ नया यदि मैंने न किया तो मेरे नये मार्ग का क्या अर्थ होगा ? सामाजिक-आर्थिक समानता मेरे प्रचार के मुख्य सूत्र होंगे। पर मैं किसी अदृश्य शक्ति और देवी-देवताओं की आराधना के बारे में अपने शिष्यों को बिलकुल उपदेश नहीं दूँगा। इस ताने-बाने में उलझा पता नहीं कब मैं सड़क के साथ एक बउली के पास पहुँच गया। वहाँ कुछ लड़के शरारतें कर रहे थे। मुझे आता देखकर वे एकदम चुप हो गए और बउली से कुछ दूर चले गए। मैंने दो चुल्लू पानी पिया और फिर उसी सीधी काली सड़क पर चलने लगा।
एक तो कुछ भूख लग आई थी और दूसरे किसी द्वारे जाकर मांगने का अभी पहला सबक सीखना था। इसलिए सड़क के दोनों तरफ दृष्टि दौड़ता कि कोई छन्न या टप्परू नज़र पड़ जाए। पहाड़ों में स्लेटों या खपरैल से बने घरों को छन्न या टप्परू कहते हैं और इनके विषय में मुझे पहाड़ों पर तीन अलग अलग स्कूलों में नौकरी करते समय पता चला था। शायद, ज्वालामुखी की राह तो अभी तीन किलोमीटर रहती थी। सड़क के दायीं तरफ एक अच्छी खासी छन्न नज़र आई। मैं कुछ झिझकते हुए उधर हो चला। दर पर खड़ा देखकर एक पच्चीस-तीस साल की युवती आई। 'जल, देवी!' मेरे इन दो शब्दों को पवित्र आदेश समझकर वह अन्दर गई। मैं पैरों के बल वहाँ बैठ गया। कुछ समय पश्चात ही वह दूध की पतली सी लस्सी बना लाई। लौटे के साथ साथ उसके हाथ में एक गिलास भी था। जब उसने मुझे गिलास भर का पकड़ाया, सचमुच वह मुझे देवी का रूप ही लगी। फिर, दूसरा गिलास और फिर बस। खड़े होकर आशीर्वाद देने के लहजे में कहा, ''सुखी रहो देवी !'' अन्दर से जो दो आवाज़ें मुझे सुनाई दीं, वह थीं - ''कौन था ?'' ''महात्मा था कोई ।'' देवी के शब्दों ने मेरे अन्दर जैसे महात्मा के आधे गुण भर दिए हों। दिन छिपने से कुछ पहले ही मैं ज्वालामुखी पहुँच गया। धर्मशाला का मुझे पता था। मैं माता के मंदिर में जाने की बजाय पहले धर्मशाला में पहुँचा। मैनेजर ने महात्मा समझ कर मेरे लिए अपने आप ही एक कमरा खोल दिया। जब वह मेरा नाम, पता पूछने लगा, मैंने अपना नाम प्रेमा नंद बताया और ठिकाने के संबंध में इतना ही कहा कि दरवेशों का कोई ठिकाना नहीं होता। मैनेजर जैसे मुझसे बहुत प्रभावित हो गया हो। थकावट के कारण मंदिर जाने की मेरे अन्दर शक्ति ही नहीं थी। बिछी हुई दरी पर लेटने के बाद मानो मैं निढाल-सा हो गया था, बहुत उदास और बहुत ही निराश।
महात्मा अभी मैं बना नहीं था। वैसे महात्मा का अभिनय करना कुछ-कुछ सीख गया था। दिल में अभी भी एक धुकधुक थी कि मुझे खोजने में मेरे परिवार या रिश्तेदारों को अधिक समय नहीं लगेगा। इसका सीधा कारण मेरी ऑंखों की कम रोशनी था। यदि ऐसा न होता तो शायद यह सब कुछ भी न घटित होता। लेकिन अब जब सब कुछ घटित हो चुका था, यह सोचना व्यर्थ था।
दिन छिप गया था और धर्मशाला का एक सेवक मुझे बाथरूम के बारे में सब कुछ बता गया था। पर उसको क्या मालूम था कि मैं रात में अकेला कहीं भी जाने योग्य नहीं हूँ। कुछ यात्रियों के आने से धर्मशाला में अच्छा रौनक मेला तो हो गया था, पर मेरा मन अशान्त था और दुविधा का शिकार भी। घर से निकले को तो यह तीसरा दिन ही हुआ था। लेकिन इतनी जल्दी दुविधा का शिकार हो जाऊँगा, यह मैंने सोचा नहीं था। ज़िन्दगी में कभी भी कोई किया गया फ़ैसला मैंने पूरी तरह नहीं बदला था। यह तो बड़ा अहम मसला था, महात्मा बुद्ध बनकर दुनिया को सामाजिक-आर्थिक अन्याय से मुक्त करवाने का मसला। परन्तु इतनी जल्दी मेरी फूंक निकल जाएगी, यह सोच सोचकर मैं बहुत शर्मिन्दा हो रहा था।
पता नहीं कौन था, शायद लाटों वाली माता के द्वार पर माथा टेकने वाला कोई भगत हो, मेरे चरण स्पर्श कर रहा था और मैंने भी 'जय हो' कहकर उसकी श्रद्धाभक्ति को नमस्कार कर दिया। वह रोटी रखकर चला गया, फिर और रोटी पूछने के लिए आया। मैंने न में सिर हिला दिया। मेरे लिए तो ये दो रोटियाँ ही बहुत थीं। मन भर भर आ रहा था। उस भगत के बाद दो और सज्जन भी आए। मेरे ठौर-ठिकाने के बारे में भी पूछा। मैंने केवल यही कहा, ''दरवेशों का कोई घर-दर नहीं होता।'' शायद, मेरे इस जवाब ने ही उन्हें संतुष्ट कर दिया हो। लेकिन एक बात साफ़ थी कि इन यात्रियों में से कोई बरनाला इलाके का नहीं था। यह उनकी बातचीत से पता चलता था। सवेरे जब उठा, कोई भगत चाय पूछने आ गया। मैंने इन्कार में सिर हिलाया और साथ ही यह भी कहा, ''स्नान के बाद।'' शायद मेरे ऐसा कहने पर उसके अन्दर मेरे प्रति सत्कार और बढ़ गया हो, क्योंकि जंगल-पानी और नहाने के बाद वह चाय के साथ पत्तल पर दो पूरियाँ भी रख लाया था। पूरियों पर आलुओं की सूखी सब्जी थी। भगत गिलास लेने आया, मैं 'जय हो, जय हो' कहकर अपने महात्मा होने के प्रभाव को जैसे और पक्का कर रहा था। शायद अब यह सब कुछ मेरी ड्रामेबाजी से बढ़कर कुछ नहीं था, क्योंकि मैंने तो रात में ही घर वापस लौटने का फ़ैसला कर लिया था।
माता के मंदिर के बिलकुल करीब एक हलवाई से 21 रुपये का प्रसाद तैयार करवाया, जिसे हिंदुओं की धार्मिक भाषा में 'कड़ाही करवाना' कहते हैं। उसने पत्तल पर गरम गरम प्रसाद डाल कर मुझे दे दिया। मैं बायें हाथ में पत्तल और दायें हाथ में छड़ी लेकर मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ गया और सीधा ज्वालामुखी के मुख्य मंदिर में दाख़िल हो गया, जहाँ लाटें जलती हैं। हिंदू इन लाटों को माता की करामात कहते हैं पर साइंस में विश्वास रखने वाले और नास्तिक इन लाटों के जलने को मंदिर के नीचे किसी गैस के जख़ीरे का होना बताते हैं। परन्तु इस समय जब कि मैं एक कुराही ही था, मुझे इन लाटों के जलने के संबंध में कोई भी वैज्ञानिक टिप्पणी करने का अधिकार नहीं था। उस समय तो मैं यह सोचता था कि शायद दोनों बेटों के पिछले नवरात्रों में केश उतारने के समय मेरा मंदिर में प्रवेश न करना ही इसका कारण बना है, जिस कारण मैं लाटां वाली के आगे नतमस्तक होने आया हूँ। शायद मेरे भगवे वस्त्र देख कर मंदिर में प्रवेश करते समय मंदिर के किसी भी पंडे या भोजकी ने मुझसे कुछ नहीं पूछा, वरन मुझे देखकर वह सत्कार की मुद्रा में आ गए। डोना पकड़ा, माता के चरणों में भोग लगाने के पश्चात डोने में कुछ और भोग डालकर मुझे पकड़ा दिया और साथ ही मुझे चरण-वंदना भी की। मंदिर से बाहर आते ही डोने को एक बकरा पड़ गया। शायद कोई भगत यह बकरा मंदिर में चढ़ाकर गया हो। इस घटना ने भी मुझे न तो निराश किया और न ही मुझे क्रोध आया।
अब जबकि मेरा सारा गुस्सा ही पूरी तरह काफूर हो चुका था, मैं सीधा बस-स्टैंड की तरफ़ चल दिया। होशियारपुर बस-अड्डे पर आकर किसी ओट में खड़ा हो गया। नई बनियान पहनी और पैंट-शर्ट भी। भगवे वस्त्र और मैली बनियान, लुंगी में लपेट कर मैं लुधियाना वाली बस में बैठ गया। लेकिन तपा जाने के लिए मेरा अभी भी मन नहीं कर रहा था। आख़िर, लुधियाना से रेल द्वारा मैंने अपनी बहन और अपने सबसे अधिक हमदर्द गूजर लाल जीजा जी के पास जाने का फ़ैसला कर लिया। स्टेशन से तांगा लिया और मालेरकोटला के पटेल मुहल्ले के पास जा उतरा। चन्द्रकांता बहन मेरी जैसे प्रतीक्षा ही कर रही हो। उसके लिए मानो चाँद बादलों में से निकल आया हो। शायद जीजा जी ने कुछेक पलों में ही तपा और अन्य रिश्तेदारों को फोन कर दिया। भाई और मेरी पत्नी दोनों बच्चों को लेकर दिन छिपे बहन के घर पहुँच गए। मुझे यूँ लगता था जैसे मैं अभी इन सबके लिए पराया होऊँ और ये सब मेरे लिए। बॉबी को गोद में लेकर मैं खूब रोया था। कुछ दिन मैं मालेरकोटला में ही रहा, सुदर्शना देवी भी और बच्चे भी। भाई वापस तपा मंडी लौट गया था। शायद जीजा जी और भाई ने सबको सख्त हिदायत कर रखी थी कि मालेरकोटला कोई न जाए। मुझे यह बात अच्छी लग रही थी क्योंकि मैं किसी के सामने किसी दया, किसी हमदर्दी और किसी मजाक का पात्र नहीं बनना चाहता था। मुझे बच्चों की भाँति प्यार से रखा जा रहा था। दोनों बच्चे रात में मेरे संग ही सोते थे। सुदर्शना देवी की सेवा बिलकुल वैसी ही थी, जैसी विवाह के बाद के दिनों की। तब तक मैं तपा नहीं गया था जब तक सिर के बाल पूरी तरह नहीं उग आए थे। जीजा जी के रोज़ रात को दिए गए उपदेश से मेरे अन्दर गृहस्थ जीवन और समाज सेवा की एक नई जलधारा संगम बनकर बहने लगी थी। बहुत कुछ समझा-बुझा कर जीजा जी हमें गाड़ी चढ़ा गए थे। बुध्द या नानक की उदासी जैसा मेरे पास कोई आधार ही नहीं था। बुध्द कहाँ बनता ? समझो, बुध्दू लौटकर वापस आ गया था।
यह मेरे सरकारी मिडल स्कूल, महिता में नौकरी के समय का वाकया है, जिसे मैं अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी मूर्खता समझता हूँ।
(जारी…)