समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

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Sunday, April 4, 2010

पंजाबी उपन्यास


''साउथाल'' इंग्लैंड में अवस्थित पंजाबी कथाकार हरजीत अटवाल का यह चौथा उपन्यास है। इससे पूर्व उनके तीन उपन्यास - 'वन वे', 'रेत', और 'सवारी' चर्चित हो चुके हैं। ''साउथाल'' इंग्लैंड में एक शहर का नाम है जहाँ अधिकतर भारत से गए सिक्ख और पंजाबी परिवार बसते हैं। यहाँ अवस्थित पंजाबी परिवारों के जीवन को बेहद बारीकी से रेखांकित करता हरजीत अटवाल का यह उपन्यास इसलिए दिलचस्प और महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हम उन भारतीय लोगों की पीड़ा से रू-ब-रू होते हैं जो काम-धंधे और अधिक धन कमाने की मंशा से अपना वतन छोड़ कर विदेशों में जा बसते हैं और वर्षों वहाँ रहने के बावजूद वहाँ की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।



साउथाल

हरजीत अटवाल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

॥एक॥

ट्रैफिक हेज़ एंड तक है। ऐसा ही होता है सदैव। फिर आज तो धूप भी कुछ ज्यादा ही है और ऊपर से शनिवार। ब्राडवे पर तो मेला लगा होगा। यहाँ से गुजरना वक्त खराब करने वाली बात है। जगमोहन भी जानता है कि एक घंटा तो आराम से खराब हो जाएगा। वह कार को घर के सामने खड़ा कर पैदल चलकर ही ब्राडवे तक जा सकता है। कुछ देर चलना ही तो पड़ेगा, पर चलने में वह बहुत आलसी है। वैसे भी उसका स्वभाव है कि एक बार बैठ गया तो बैठ गया, फिर उठना उसके लिए कठिन हो जाता है। हाँ, जोगिंग वह मीलों तक कर लेगा। ब्राडवे की तरफ तो वह वैसे भी कभी-कभार ही आया करता है। आज वह इसलिए आ रहा है कि उसे स्काईलिंक वालों से टिकटें उठानी हैं। मनदीप कुछ दिनों के लिए इंडिया जा रही है। वे स्काईलिंक वालों से ही टिकटें लिया करते हैं क्योंकि वे वीज़ा भी लगवा देते हैं। नहीं तो वीज़ा लगवाने के लिए भारतीय हाई कमिश्नर के दफ्तर जाना पड़ता है जो कि केन्द्रीय लंदन में है। एक बार वह और मनदीप गए थे। वहाँ जाना भी किसी मुहिम पर जाने की तरह है। पूरा दिन लग जाता है। बसें, रेलें, टयूबें(अंडर ग्राउंड रेल) पकड़ते जाओ, कार पार्क करने के लिए तो जगह मिलेगी ही नहीं। वक्त भी खराब करो और साथ ही भारतीय ब्यूरोक्रेसी का सामना भी करो। भारतीय हाई कमीशन वाले आपके साथ ऐसा बर्ताव करते हैं मानो आपके ऊपर कोई अहसान कर रहे हों। आपके काम से अधिक उन्हें अपने दोस्तों के साथ फोन पर रात में टेलीविज़न पर देखे प्रोग्राम के बारे में या फिर पाउंड के रेट के बारे में बात करना अधिक ज़रूरी होता है। इस मुल्क में रहते हुए जो कान 'थैंक्यू', 'प्लीज़' या 'सॉरी' सुनने के अभ्यस्त हो जाते हैं उनके लिए 'अबे', 'ओए' या 'क्या कहा तूने' सुनना कठिन हो जाता है। आपकी ऐसे लोगों का सामना करने की सिरदर्दी कुछ ट्रैवल एजेंट थोड़ी-सी फीस से ही दूर कर देते हैं। स्काईलिंक वाले फोन करके बता देते हैं कि टिकट और वीज़ा लगा पासपोर्ट तैयार हुए पड़े हैं। वह टिकट उठाने के लिए ही इस तरफ जा रहा है इसीलिए इस भीड़ में फंसा खड़ा है।
सुखी के क़त्ल के बाद तो वह इधर आता ही नहीं। उसे सुखी दिखाई देने लगती है। स्वीमिंग-पूल के फट्टे पर खड़ी सुखी। फट्टे को दो-तीन बार दबाते हुए पानी में छलांग लगाती सुखी। मछली की तरह फिसलती और फिर स्वीमिंग पूल के दूसरी ओर जा निकलती सुखी। सुखी के क़त्ल के समय पूरे साउथाल ने मुँह में उंगलियाँ डाल ली थीं। इस क़त्ल ने अजीब सा रोमांच पैदा कर दिया था पर किसी ने इस क़त्ल का बुरा नहीं मनाया था। सुखी के क़त्ल को पूरा साउथाल जैसे भी लेता हो, पर वह इसे बहुत गंभीरता से लेता है। उसके अन्दर बहुत कुछ टूट-फूट जाता है। उसकी हालत बीमारों जैसी हो जाती है। एक वर्ष हो चला है इस दुखांत को। अब जाकर वह कुछ संभला है पर यह घटना अभी भी ताज़ी है मानो कल ही घटित हुई हो। अभी भी मनदीप कहने लगती है-
''क्या लगती थी तुम्हारी वो ?... मामे की बेटी ?''
''तू तो पागलों जैसी बात करती है !''
''मैं नहीं, तुम पागलों जैसी बात करते हो, सारा साउथाल, सारी दुनिया थू-थू करती है उस पर, और तुम मुफ्त में ही सुध-बुध गंवाए बैठे हो।''
''मैं सारा शहर नहीं, मैं भीड़ नहीं।''
''मत हो, पर मूड ठीक रखो, तुम्हें पता है, हमें कितनी तकलीफ़ होती है। तुम्हारा खराब मूड पूरे घर का माहौल खराब कर देता है और लड़कों का भी व्यवहार बदल जाता है।''
अब तो वह ठीक है, फिर भी मनदीप नहीं चाहती कि वह ब्राडवे की तरफ जाए और लौट कर अजीब-सी बातें करने लग पड़े। वह जानती है कि जब वह किसी बात के विषय में सोचने लगता है तो सोचता ही चला जाता है। यदि स्काईलिंक के दफ्तर न जाना होता तो उधर जाने के लिए कभी न कहती।
ट्रैफिक आहिस्ता-आहिस्ता रेंगता है। रेडियो पर ट्रैफिक की ख़बरों में ब्राडवे के रॅश के बारे में बार-बार आगाह किया जा रहा है। वैसे भी लोगों को इस रॅश का पता है पर फिर भी आते हैं। यही सड़क आगे ईलिंग को जाती है और उससे आगे केन्द्रीय लंदन को, लेकिन इन गाड़ियों में ईलिंग या केन्द्रीय लंदन को जाने वाले लोग अधिक नहीं होंगे। शायद कोई भी न हो इन बसों के सिवाय। बहुत से लोग तो ईलिंग के लिए परिवर्तित रूट ले लेते हैं। इनमें से कुछ गाड़ियाँ स्थानीय लोगों की होंगी, कुछ इधर किसी काम से आए अथवा शॉपिंग के लिए आए लोगों की होंगी, बाकी तमाशबीन होंगे जो ब्राडवे का नज़ारा देखने के लिए ही आए होंगे। कई तो सिर्फ़ सलवार-सूट या साड़ी अथवा बिंदी वाली स्त्रियों को देखने के लिए आए हो सकते हैं। कुछ जगमोहन जैसे मज़बूरी में फंसे हुए भी। वह वक्त ग़ुजारने के लिए 'वास परवास' को स्टेयरिंग पर रख कर पढ़ने लगता है। 'वास परवास' साउथाल का प्रमुख साप्ताहिक परचा है। जगमोहन इसकी नीतियों से सहमत नहीं है, पर पढ़ता इसे ही है। इसमें स्थानीय और भारत से जुड़ी ख़बरे हुआ करती हैं।
ग्रैंड यूनीयन कैनाल का पुल आ जाता है। इस ऊँची जगह से आगे सड़क पर खड़ी कारों का नज़ारा और भी साफ़ दिखता है। रंग-बिरंगी कारें इकसार जुड़ी खड़ी हैं, खिलौनों की भाँति। जगमोहन मन ही मन सोचता है कि यह नज़ारा भी कौन-सा रोज़-रोज नसीब होता है। हँसता है।
धीरे-धीरे वह सरदार ज्वैलर्स के आगे आ जाता है। इसका मालिक बाहर खड़ा होकर ट्रैफिक देख रहा है बल्कि ताड़ रहा है मानो उसे कहीं जाना हो और ट्रैफिक को देख कर टाल रहा हो। वह सरदार उसका परिचित है। सरदार को गिला है कि ब्राडवे वाली ग्राहकों की भीड़ उस तक नहीं पहुँचती क्योंकि उसकी दुकान मुख्य बाज़ार से ज़रा बाहर की ओर पड़ जाती है। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते ग्राहकों की जेबें हल्की हो जाती हैं।
ट्रैफिक हचकोले खाता हुआ रेंग रहा है। कुछ हचकोलों के बाद स्काईलिंक का दफ्तर दिखाई देने लगता है। वह कार खड़ी करने के लिए जगह तलाशने लगता है। कहीं कुछ भी नहीं। दूर ट्रैफिक वार्डन की फौज़ी रंगी वर्दी दिखाई देने लगती है। ये ट्रैफिक वार्डन मानो जिद्द में आकर टिकट देते हों। मानो तनख्वाह के साथ-साथ इन्हें टिकट देने का भी कमीशन मिलता हो। साउथाल में ये ट्रैफिक वार्डन सबसे अधिक नफ़रत का पात्र बने हुए हैं। कई बार गर्म स्वभाव वाले टिकट मिल जाने पर इन्हें पीट भी देते हैं। वह बायीं तरफ वाली सड़क की ओर मुड़ जाता है। कार खड़ी करने के लिए यहाँ भी जगह नहीं है। स्काईलिंक के दफ्तर में उसका काम तो एक मिनट का ही है, पासपोर्ट और टिकट ही उठाने हैं। वह किसी के घर की ड्राइव-वे के सामने ही कार खड़ी कर दफ्तर की ओर दौड़ता है। हाँफता हुआ वापस लौटता है तो उस घर का व्यक्ति कार निकालने के लिए रुका खड़ा मिलता है। वह आँखें निकाल रहा है, जगमोहन उसे सॉरी-सॉरी कहे जा रहा है। उसे तसल्ली है कि मनदीप का पासपोर्ट और टिकट ले आया है। कार स्टार्ट करता पुन: ब्राडवे के ट्रैफिक के दरिया में शामिल हो जाता है। वह टिकट और पासपोर्ट पर लगे वीज़ा को चैक करता है कि सब ठीक तो है। अब उसे पहले जैसी उतावली नहीं है। उसे अच्छा लग रहा है कि मनदीप इंडिया जा रही है। दोनों बेटे उसके और करीब आएंगे। अंकल पाला सिंह कहता है कि इस मुल्क में पता नहीं किस समय क्या हो जाए। आँख के फेर में घर टूट जाते हैं। बाहर नौकरी करती औरत पता नहीं कब बरगला ली जाए, इसलिए बच्चों को जितना हो सके अपने संग जोड़कर रखो। किसी मित्र की कही एक अन्य बात उसे याद आने लगती है कि औरत अपने बच्चों को फौज़ बना कर पति के खिलाफ़ इस्तेमाल करती है। इसलिए बच्चों पर अपना इतना अनुकूल प्रभाव छोड़ो कि वे तुम्हारे खिलाफ़ न जाएं। यूँ तो उसका मनदीप के साथ रिश्ता किसी हद तक ठीक है, पर फिर भी एक धुकधुकी-सी हर वक्त उसके मन को लगी रहती है।
ब्राडवे पर अब इस्लामिक सेंटर खुल गया है। वह इसे पहलीबार देख रहा है। साथ ही, सिक्ख मिशनरी सेंटर है जो कि कुछ वर्ष पहले खुला था। आगे जा कर दायीं ओर प्रताप खैहरे का रेस्टोरेंट है जिस पर उसने अभी हाल ही में केसरी रंग करवाया है और सामने ही चौधरी मुश्ताक़ अली का हरे रंग वाला रेस्टोरेंट है। लोग कहते हैं कि यही हैं जो साउथाल में छोटे-छोटे लड़ाई-झगड़े करवा रहे हैं। इस समय तो कोई बड़ी समस्या नहीं है, पर बन सकती है। कई गंभीर सोच वाले लोग इसका हल खोजने की कोशिश भी कर रहे हैं, पर जुनूनी इनके हाथ मज़बूत कर रहे हैं।
ब्राडवे के फुट-वे पर कंधे छीलता रॅश है। कुछेक दुकानों के आगे लोग मेजों पर घड़ियाँ सजाए खड़े हैं और ग्राहक झुक झुककर कीमत और माल देख रहे हैं। लोगों के बैठने के लिए कुछ बेंच भी हैं जिनके ऊपर वाइनो-से दिखाई देते लोग हाथों में बियर के डिब्बे लिए बैठे हैं। मिठाई की दुकानों में निकाली जा रही जलेबियाँ खुशूब-सी बिखेर रही हैं। सेंटों से लथपथ स्त्रियों की सुगंध दूर-दूर तक जा रही है। उसे मेले जैसा यह माहौल अच्छा लगता है। सभी देसी चेहरे हैं। गोरा रंग देखने को भी नहीं मिलता। इसीलिए कई अंग्रेज मजाक करते हुए कहने लगते हैं कि साउथाल जाना हो तो पासपोर्ट की ज़रूरी है।
उसकी कार ग्रेवाल इम्पोरियम के सामने आ जाती है। इस शोरूम की अपनी शान है। यद्यपि ब्राडवे पर कपड़े की बहुत सारी दुकाने हैं, पर ग्रेवाल इम्पोरियम के सम्मुख वे कुछ नहीं। एक अन्य मशहूर डलहौज़ी साड़ी स्टोर है, पर उसका भी वह रौब नहीं है। ग्रेवाल इम्पोरियम की ओर ग्राहक खिंचा चला जाता है। इम्पोरियम के साथ ही मुड़ती सड़क पर रामगढ़िया गुरुद्वारा है जिसकी मान्यता आजकल बहुत बढ़ गई है। कोई नई टीम आई है पाठ और कीर्तन करने वालों की। औरतों के झुंड भागते ही जाते हैं। मनदीप के साथ काम करती एक औरत मनदीप को बताती है और मनदीप उसको। भारत की गरम राजनीति का या पंजाब के खराब हालात का इस गुरुद्वारे पर कोई असर नहीं पड़ता। शायद इसका कारण यह हो कि इसकी बागडोर रामगढ़िया बिरादरी के हाथ में है। अगर आपकी जाति तरखाण(बढ़ई)-मिस्त्री नहीं है तो आप इस गुरुद्वारे की कमेटी में शामिल नहीं हो सकते। कुछ भी हो, इस गुरुद्वारे में सब नरमदिल ही हैं जबकि साउथाल के कुछ अन्य गुरुद्वारों में तो आग बरसती है। वैसे अब हालात ठीक हैं, कुछ शांति है। मनदीप का माथा टेकने जाना उसको इतना डरावना नहीं लगता। कभी कभी मनदीप के मन में पैदा हुई श्रद्धा के कारण उसे भय महसूस होने लगता है कि उसकी सिगरेट पीने की आदत के कारण मनदीप घर में ही कोई बखेड़ा ही न खड़ा कर दे, पर अब तक सब ठीक है। कभी-कभार उसकी इस आदत पर मनदीप गिला करते हुए कहती है कि बच्चों पर भी इसका बुरा असर पड़ सकता है। जगमोहन अब बच्चों के सामने सिगरेट नहीं पीता। वह घर में सिगरेट बहुत कम पीता है, अगर तलब उठती है तो बाहर गार्डन में चला जाता है।
आगे राजा राज भोज है। उसके दिल में तार-सी फिर जाती है। सिर भारी-भारी होने लगता है। सुखी फट्टे को दबाती स्वीमिंग पूल में छलांग लगाती है और मछली बनकर दूसरे किनारे पर जा निकलती है। जहाँ हुसैन खड़ा है। हुसैन उसकी तरफ देखकर मुस्कराता है। सुखी पीछे की ओर तैरने लगती है। राजा राज भोज रेस्टोरेंट में सभी तरफ फट्टे लगे हुए हैं। हो सकता है कि पुलिस फिर से खोलने की इजाज़त न दी हो। संभव है सुखी के खून के छींटे अभी भी दीवारों पर हों। काश ! वह किसी तरह देख सकता इन छींटों को। उसे कुछ होने लगता है। उसका दिल करता है कि किसी तरह उड़ कर इस ट्रैफिक को पार कर ले और इस जगह से बहुत दूर चला जाए। वह सोचता है कि घर जाकर मनदीप को नहीं बताएगा कि यह रेस्टोरेंट देखते ही उसके अन्दर कुछ होने लगा था या नहीं, नहीं तो वह कहेगी कि सुखी अभी भी उसके अन्दर बैठी है।
फिर वह सोचने लगता है कि वह तो यूँ ही यह सब दिल को लगाये जाता है जबकि सारा शहर खुश घूमता है। वह गर्दन घुमा कर फट्टे लगे रेस्टोरेंट की तरफ पुन: देखता है, वहाँ कुछ भी नहीं है सिवाय पुराने पड़ चुके फट्टों या घसमैली दीवारों के। सुखी कहीं नहीं है। वह एक ख़बर है। ख़बरों का किसी से लम्बा नाता नहीं होता। फिर इस ख़बर को तो सालभर हो चला है। इतनी देर तो किसी ख़बर को अख़बार या टेलीविज़न वाले भी नहीं इस्तेमाल करते।
वह बत्ती से बायीं ओर मुड़ जाता है। लेडी माग्रेट रोड पर। मंदिर के करीब से गुजरता है। मंदिर का पुजारी मोहन लाल परसों शराब पीते हुए उसके साथ यूँ ही बहसता रहा था। मोहन लाल उससे इमीग्रेशन के बारे में सलाह लेता-लेता अपने इश्कों के विषय में बात करने लग पड़ता है। वह मोहन लाल के बारे में अधिक नहीं सोचता। कार दौड़ा लेता है। यहाँ ट्रैफिक बिलकुल नहीं है। वह जानता है कि मनदीप टिकट देखकर कितना खुश होगी। मनदीन के मम्मी-डैडी पहले ही गए हुए हैं। उन्होंने गाँव में जाकर पाठ रखवाना है इसलिए मनदीप जाने के लिए उतावली है।
मनदीप काम पर से लौट चुकी है। नवकिरण और नवजीवन बैठे कार्टून देख रहे हैं। दोनों ही जुड़वें लगते हैं जबकि किरण जीवन से एकसाल बड़ा है। जगमोहन बिना बोले मनदीप के हाथ में टिकट और पासपोर्ट पकड़ाते हुए दोनों बेटों के बीच में जा बैठता है और उन्हें अपने बदन के साथ कस लेता है। मनदीप कहती है-
''मूड ठीक नहीं लगता।''
''ब्राडवे के ट्रैफिक में फंसा दिया मुझको।''
''तुमसे किसने कहा था उधर से जाओ, घर आ जाते पहले और फिर स्काईलिंक चले जाते।''
''तू तो जानती है, घर आकर मुझसे नहीं निकला जाता।''
''जोगिंग करने जाते हो, उधर निकल जाते।''
''तुझे मालूम है आजकल वे दफ्तर जल्दी बन्द कर जाते हैं। और फिर इंडियन आँखों को जोगिंग अजीब लगती है, जोगिंग करने वाले को मैड कहते हैं।''
कहते हुए जगमोहन हँसता है। मनदीप उसकी तरफ ध्यान से देखती हुई सोचती है कि हँसी पूरी नहीं है, कहीं कुछ छूट गया है उसकी हँसी में। वह उसके करीब बैठते हुए पूछती है-
''जैग, क्या बात है ?... मुझे बताने वाली है।''
बात करती मनदीप उसके कंधे पर हाथ फेरती है। जगमोहन को उसका ऐसा करना अच्छा लगता है। उसके ऐसा करते ही वह बच्चा बन जाता है। वह कहता है-
''नहीं डार्लिंग, कोई बात नहीं।''
''तुम्हारी मर्जी।'' कहते हुए मनदीप उठ कर रसोई में चली जाती है। कुछ देर बाद जगमोहन ज़रा ऊँचे स्वर में कहने लगता है-
''राजा राज भोज अभी भी बन्द है।''
मनदीप लाउन्ज में आती हुई बोलती है-
''तो यह बात है।''
(जारी…)
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3 comments:

Anonymous said...

Hello Ji,

Aap ka anuvad ghar dekha, bahut achha laga. Aap world Famous Punjabi novelist shivcharn Jaggi Kussa ki koi rachna bhi chhapen. Kussaji ka email: jaggikussa65@gmail.com aur unki website: www.shivcharanjaggikussa.com hai. Un ki rachna log bahut pasand karenge. Yeh mera aap se vaahda hai.

Kind Regards,

Vikram Gill
sahit_punjab@hotmail.com

बलराम अग्रवाल said...

अच्छी शुरुआत। संबंधित इलाके का बारीक चित्रण। शब्द 'केन्द्रीय लन्दन' में केन्द्रीय को ज्यों का त्यों ही रखा जाता तो कैसा रहता? यह सिर्फ आपसी विचार-विमर्श है, राय नहीं। समझ में केन्द्रीय भी आ रहा है और लय को तोड़ता भी नहीं लग रहा है। उपन्यास ने अपने इस हिस्से से कहानी की शुरुआत कर दी है, यह अच्छी बात है। अन्यथा पता लगा कि बंदा अभी ब्राडवे की भीड़ में ही फँसा खड़ा है। आगे देखते हैं क्या होता है।

Sunita Sharma said...

दीप्ति जी
आपने अनुवादघर शुरू कर अच्छा किया मुझे मेल करने का शुक्रिया। समयाभाव के कारण आज ही पढ सकी हूं ।पंजाबी भाषा की कहानी हिन्दी में मिले अच्छा है मेरी एक गुजारिश है ब्लाग का बैकगांउड कलर यदि आप बदले तो अच्छा प्रभाव रहेगा ।

सुनीता शर्मा खत्री
स्वतंत्र पत्रकार
उत्तराखण्ड।
http://sunitakhatri.blogspot.com